अपने आकार के कारण हुआ डायनासोर का खात्मा:-
पेरिस। वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगा ही लिया कि आखिर विशाल जीव डायनासोर का खात्मा हुआ। उनका दावा है कि इस दैत्याकार जीव का आकार ही उसके अस्तित्व के लिये खतरा बन गया। अपने नये अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कहा है कि अपने आकार के कारण ही इस जीव का खात्मा हुआ। उन्होंने बताया कि अंडे से पैदा हुये नन्हें डायनासॉर का वजन 10 किलोग्राम हुआ करता था जिसे बाद में 30 से 50 टन होना पड़ता था। ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक मर्कस क्लॉस ने बताया कि नन्हें डायनासॉर को अन्य वयस्क स्तनधारियों के आकार से लोहा लेना पड़ता था। क्लॉस ने बताया कि वहीं स्तनधारियों के नवजात आकार में बड़े होते थे जिन्हें अन्य बड़े पशुओं से खतरा नहीं होता था। इसका मतलब यह हुआ कि पर्यावरण में मध्यम और बडे़ आकार वाले जानवरों के लिये तो जगह रही पर छोटे डायनासॉर के लिये मुश्किल हो गई। इस अध्ययन को ब्रिटिश रॉयल सासोइटी के जर्नल बायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित किया गया है। क्लॉस ने बताया कि जलवायु में छोटी प्रजातियों के लिये बहुत स्थान है पर वह बड़े आकार के पशुओं के नवजात अधिक जगह लेते हैं। यही कारण है कि जब किसी भी जीव के नन्हें को स्थान नहीं मिलेगा तो वह प्रजाति आगे नहीं बढ़ सकती। वैज्ञानिकों ने इस बात का खंडन किया है कि कोई तारा धरती से टकाराया था और फिर उसके असर से डायनासॉर गायब हो गये
उल्का से नहीं हुआ डायनासोर का विनाश:-
वाशिंगटन। करीब 6.5 करोड़ वर्ष पहले गिरे एक उल्का पिंड जिससे विशाल गड्ढे का निर्माण हुआ, शायद डायनासोर सहित दुनिया की 65 प्रतिशत प्रजातियों के विनाश का वास्तविक कारण नहीं है। एक नए अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। मेक्सिको के उत्तरी युकातान में वर्ष 1978 में खोजे गए इस गर्त का व्यास करीब 180 किलोमीटर है और इसके पूरी दुनिया पर काफी अधिक प्रभाव पड़ा। इस उल्का के गिरने से डायनासोरों के साथ अनगिनत प्रजातियां नष्ट हो गईं। बहरहाल काफी अधिक संख्या में वैज्ञानिक इस सिद्धांत से असहमत हैं। न्यूजर्सी के प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के गर्ट केलर और स्विट्जरलैंड के लुसाने विश्वविद्यालय के थियरी एडाटे के नेतृत्व में हुए नए शोध के अनुसार मेक्सिको में गर्त का निर्माण अधिक से अधिक 300,000 वर्ष पहले हुआ। ज्वालामुखी से हुआ डायनासोर का विनाश केलर का सुझाव है कि भारत में दक्कन के पर्वतहीय इलाके में होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट संभवत: डायनासोरों के विनाश के लिए जिम्मेदार हैं। ज्वालामुखियों से निकली गैसों और धूल ने सूर्य के प्रकाश का रास्ता रोक दिया और ग्रीनहाउस जैसा प्रभाव पैदा किया। शोध के परिणाम सोमवार को प्रकाशित जियोलाजिकल सोसायटी के जर्नल में दिए गए हैं। इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
डायनासोर से भी पहले रहता था महाजंतु :-
लंदन। जीवाश्म वैज्ञानिकों ने एक ऐसे रेंगने वाले हिंसक हमलावर प्रकृति के प्राणी के जीवाश्म खोज निकाले हैं जिसके बारे में समझा जाता है कि वह डायनासोर के निवास से करीब 26 करोड़ 50 लाख साल पहले धरती पर घूमता था। दक्षिणी ब्राजील के रियो ग्रांदे दू सोल में एक खेत से इस विशाल प्राणी की खोपड़ी खोदकर निकाली गयी है। वैज्ञानिकों ने गूगल मानचित्र पर एक धब्बे को देखकर वहां जाकर जांच करने का फैसला किया और उसके बाद यह चीज सामने आयी। वैज्ञानिकों का मानना है कि कुत्ते के आकार का यह जानवर डायनासोर के धरती पर आने से पहले धरती पर रहता था और रेंगने वाले ऐसे प्राणियों के परिवार से ताल्लुक रखता था जिसका बाद में धरती से सफाया हो गया। डेली मेल में प्रकाशित खबर के अनुसार इस जीव का नाम पम्पाहोनस रखा गया है जो दिखने में डायनासोर जैसा था लेकिन डायनासोरों के धरती पर आने से पहले इसका खात्मा हो गया। पहले समझा जाता था कि इस परिवार के जंतु केवल रूस , कजाखस्तान , चीन और दक्षिण अफ्रीका में ही रहते थे लेकिन ताजा खोज से पता चलता है कि ये धरती के विभिन्न हिस्सों में फैले हुए थे।
अनुमान से 90 लाख साल पूर्व मौजूद थे डायनासोर! :-
लंदन। धरती का सबसे विशालयकाय जीव डायनासोर यूं तो जीव विज्ञानियों और इतिहासकारों के लिए रहस्यमय प्रजाति बना हुआ है लेकिन पहले की अवधारणा के विपरीत अब एक नये शोध में कहा गया कि डायनासोर की प्रजाति पृथ्वी पर पहले लगाए गए अनुमान से 90 लाख साल पहले मौजूद थी। पोलैंड में मिले डायनासोर के पैरों के निशान पर किए गए शोध में कहा गया है कि भूगर्भिक युग में भी यह जीव मौजूद था, भले ही इनके आकार छोटे थे। पत्रिका 'रॉयल सोसायटी बी' ने शोधकर्ताओं के हवाले से बताया है कि डायनासोर के पैरो के मिले निशान से ऐसा प्रतीत होता है कि 25 करोड़ वर्ष पहले यह पृथ्वी पर रहा होगा। रिपोर्ट के मुताबिक पोलैंड में मिले जीवाश्म डायनासोर के सबसे पुराने जीवाश्मों में से एक है। समाचर पत्र 'डेलीमेल' ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शुरूआत में डायनासोर एक छोटे किस्म का और चार पैरों वाला जीव रहा होगा लेकिन अगले 50 लाख वर्षो के दौरान यह खुद को बदलते चले गए। इनके आकार के साथ-साथ इनके खान-पान सहित अन्य चीजों में में भी तब्दीली आती चली गई।







