fb likes

Sunday, 6 December 2015

जाने अचार्य चाणक्य ;चाणक्यनीती "3

     1)धन बिहिन पुरुष को वेश्या
        , शक्तिहीन राजा को प्रजा ,
            जिस पेड़ का फल झर गया हो ,
    ये पेड़ को पक्षी त्याग देता है ,
     और भोजन करने के बाद अथिति उस घर को त्याग देता है ।

      2 )संसारिक तप से जलते हुए आदमियो के तीन विश्राम स्थल है ,
            पुत्र ,स्त्री ,और सज्जनो का संग ।

   3)अकेले में तप , 
    दो आदमियोँ से पाथन ,
       तिन से गायन , 
        चार आदमियों से रास्ता , 
    पाँच आदमियो के समूह से खेती 
   ओरजयद मनुष्यो के समूह के द्वारा युद्ध सम्प्पन होता है।

    4)जिस धर्म में दया का उपदेश न हो ,
      उस धर्म को त्याग देना चाहिए ।
       जिस गुरु में विद्या न हो उसे त्याग देना चाहिए ,
     हमेसा नाराज रहने वाली स्त्री को त्याग दे और स्नेह बिहिन भाई बंधू को त्याग दे ।

     5)यह कैसा समय है ,
       मेरे कौन-कौन से मित्र है ,
     यह कैसा देश है ,
     इस समय हमारी आमदनी कितनी है और खर्च कितना है  , 
      मैं किसके अधीन हूँ ,मुझमे कितनी शक्ति है ,
     इस बातों को बार -बार सोचते रहना चाहिए ।

  6) आलस्य से विध्या
 पराया हाथ में गया धन ,
    बिज की कमी से खेती
     और सेनापति बिहिन सेना नष्ट हो जाती है ।

      7) अभ्यास से विद्या की और शील से कुल की रक्षा होती है ।
        गुण से मनुष्य की पहचान होती है 
      और आँख देखने से क्रोध का पता चल जाता है ।

    8) वेद को ,पण्डित को ,
    सदाचार और अशांत मनुष्य को जो बदनाम करना चाहते है ,
    वे ब्यर्थ का कष्ट और अपना समय बर्बाद करते है ।

   9)  दान दरिद्रता को नष्ट कर देता है 
      ,शील दुःख को नष्ट क्र देता है 
       ,बुद्धि अज्ञान को ,
     और बिचार भय को नष्ट  कर  देता है ।

10)  काम के समन को रोज नहीं 
, मोह के सामान कोई सत्रु नही ,
  क्रोध के सामान कोई अग्नि नही 
 और ज्ञान से बढ़कर कोई सुख नही है ।

   11) जैसे रगरने , काटने ,तपने और पीटने से सोने (gold) की परीक्षा होती है  
      उसी तरह शील ,गुन और कर्म ,त्याग इन चारो से मनुष्य की परीक्षा होती है ।

No comments:

Post a Comment