fb likes

Monday, 31 August 2015

TAKSHILA UNIVERSITY in hindi



वर्तमान पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित था। जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि श्री राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी। यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। यहां 60 से भी अधिक व िषयों को पढ़ाया जाता था। 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, मन्त्र-विद्या, विविद्य भाषाएं, शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था। आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी। शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छ: माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी।

* यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी।

* तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे।

* यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।

* 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के'चिकित्सा शास्त्र'का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था।

आयुर्वेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र 

500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला'आयुर्वेद विज्ञान'का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों तक का ऑपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। इसके अतिरिक्त अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। शिष्य आचार्य के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे। एक आचार्य के पास अनेक विद्यार्थी रहते थे। इनकी संख्या प्राय: सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी। अध्ययन में क्रियात्मक कार्य को बहुत महत्त्व दिया जाता था। छात्रों को देशाटन भी कराया जाता था।

शुल्क और परीक्षा 

शिक्षा पूर्ण होने पर परीक्षा ली जाती थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना उससमय अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था। यहां धनी तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी। धनी छात्रा आचार्य को भोजन, निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे तथा निर्धन छात्र अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य करते थे। शिक्षा पूरी होने पर वे शुल्क देने की प्रतिज्ञा करते थे। प्राचीन साहित्य से विदित होता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले उच्च वर्ण के ही छात्र होते थे। सुप्रसिद्ध विद्वान, चिंतक, कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूर्ण की थी। उसके बाद यहीं शिक्षण कार्य करने लगे। यहीं उन्होंने अपने अनेक ग्रंथों की रचना की। इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसे स्थान पर थी, जहां पूर्व और पश्चिम से आने वाले मार्ग मिलते थे। चतुर्थ शताब्दी ई. पू. से ही इस मार्ग से भारतवर्ष पर विदेशी आक्रमण होने लगे। विदेशी आक्रांताओं ने इस विश्वविद्यालय को काफ़ी क्षति पहुंचाई। अंतत: छठवीं शताब्दी में यह आक्रमणकारियों द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिया।

पाठ्यक्रम

* उस समय विश्वविद्यालय कई विषयों के पाठ्यक्रम उपलब्ध करता था, जैसे - भाषाएं , व्याकरण, दर्शन शास्त्र , चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, कृषि , भूविज्ञान, ज्योतिष, खगोल शास्त्र, ज्ञान-विज्ञान, समाज-शास्त्र, धर्म , तंत्र शास्त्र, मनोविज्ञान तथा योगविद्या आदि।

* विभिन्न विषयों पर शोध का भी प्रावधान था।

* शिक्षा की अवधि 8 वर्ष तक की होती थी।

* विशेष अध्ययन के अतिरिक्त वेद , तीरंदाजी, घुड़सवारी, हाथी का संधान व एक दर्जन से अधिक कलाओं की शिक्षा दी जाती थी।

* तक्षशिला के स्नातकों का हर स्थान पर बड़ा आदर होता था।

* यहां छात्र 15-16 वर्ष की अवस्था में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने आते थे। 

स्वाभाविक रूप से चाणक्य को उच्च शिक्षा की चाह तक्षशिला ले आई। यहां चाणक्य ने पढ़ाई में विशेष योग्यता प्राप्त की
reference :-http://hindu.onetourist.in/2012/11/takshshila-university.html

Tuesday, 18 August 2015

धूमकेतु या पुच्छल तारे

सौर मंडल के अन्य छोटे पिंडो के विपरित धूमकेतुओ को प्राचिन काल से जाना जाता रहा है। चीनी सभ्यता मे हेली के धूमकेतु को 240 ईसापूर्व देखे जाने के प्रमाण है। इंग्लैड मे नारमन आक्रमण के समय 1066मे भी हेली का धूमकेतु देखा गया था।
1995 तक 878 धुमकेतुओ को सारणीबद्ध किया जा चूका था और उनकी कक्षाओ की गणना हो चूकी थी। इनमे से 184 धूमकेतुओ का परिक्रमा काल 200 वर्षो से कम है; शेष धूमकेतुओ के परिक्रमा काल की सही गणना पर्याप्त जानकारी के अभाव मे नही की जा सकी है।
धूमकेतुओ को कभी कभी गंदी या किचड़युक्त बर्फीली गेंद कहा जाता है। ये विभिन्न बर्फो(जल और अन्य गैस) और धूल ला मिश्रण होते है और किसी वजह से सौर मंडल के ग्रहो का भाग नही बन पाये पिंड है। यह हमारे लिये महत्वपूर्ण है क्योंकि ये सौरमंडल के जन्म के समय से मौजूद है।
जब धूमकेतु सूर्य के समिप होते है तब उनके कुछ स्पष्ट भाग दिखायी देते है:
  • केन्द्रक : ठोस और स्थायी भाग जो मुख्यत: बर्फ, धूल और अन्य ठोस पदार्थो से बना होता है।
  • कोमा: जल, कार्बन डायाआक्साईड तथा अन्य गैसो का घना बादल जो केन्द्रक से उत्सर्जित होते रहता है।
  • हायड्रोजन बादल: लाखो किमी चौड़ा विशालकाय हायड़्रोजन का बादलधूल भरी पुंछ : लगभग १०० लाख किमी लंबी धुंये के कणो के जैसे धूलकणो की पुंछ नुमा आकृति। यह किसी भी धूमकेतु का सबसे ज्यादा दर्शनिय भाग होता है।
  • आयन पुंछ : सैकड़ो लाख किमी लंबा प्लाज्मा का प्रवाह जो कि सौर वायु के धूमकेतु की प्रतिक्रिया से बना होता है।
होम्स धूमकेतु(२००७)
होम्स धूमकेतु(२००७)
धूमकेतु सामान्यतः दिखायी नही देते है, वे जैसे ही सूर्य के समेप आते है दृश्य हो जाते है। अधिकतर धूमकेतुओ की कक्षा प्लूटो की कक्षा से बाहर होते हुये सौर मंडल ले अंदर तक होती है। इन धूमकेतुओ का परिक्रमाकाल लाखो वर्ष होता है। कुछ छोटे परिक्रमा काल के धूमकेतु अधिकतर समय प्लूटो की कक्षा से अंदर रहते है।
सूर्य की 500 या इसके आसपास परिक्रमाओ के बाद धूमकेतुओ की अधिकतर बर्फ और गैस खत्म हो जाती है। इसके बाद क्षुद्रग्रहो के जैसा चट्टानी भाग शेष रहता है। पृथ्वी के पास के आधे से ज्यादा क्षुद्रग्रह शायद मृत धूमकेतु है। जिन धूमकेतुओ की कक्षा सूर्य के समिप तक जाती है उनके ग्रहो या सूर्य  से टकराने की या बृहस्पति जैसे महाकाय ग्रह के गुरुत्व से सूदूर अंतरिक्ष मे फेंक दिये जाने की संभावना होती है।
सबसे ज्यादा प्रसिद्ध धूमकेतु हेली का धूमकेतु है। 1994 मे शुमेकर लेवी का धूमकेतु चर्चा मे रहा था जब वह बृहस्पति से टुकड़ो मे टूटकर जा टकराया था।
हेली का धूमकेतु
हेली का धूमकेतु
पृथ्वी जब किसी धूमकेतु की कक्षा से गुजरती है तब उल्कापात होता है। कुछ उल्कापात एक नियमित अंतराल मे होते है जैसे पर्सीड उल्कापात जो हर वर्ष 9 अगस्त और 13 अगस्त के मध्य होता है जब पृथ्वी स्विफ्ट टटल धूमकेतु की कक्षा से गुजरती है। हेली का धूमकेतु अक्टूबर मे होनेवाले ओरीयानाइड उल्कापात के लिये जिम्मेदार है।
काफी सारे धूमकेतु शौकिया खगोलशास्त्रीयो ने खोजे है क्योंकि ये सूर्य के समिप आने पर आकाश मे सबसे ज्यादा चमकिले पिंडो मे होते है।
मैकनाट धूमकेतु
मैकनाट धूमकेतु
1882का महान धूमकेतु
1882का महान धूमकेतु
reference :-https://navgrah.wordpress.com/2011/03/03/comets/

ब्रह्मांड की उत्पत्ती कैसे हुई?

सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था ऋग्वेद(१०:१२९) से सृष्टि सृजन की यह श्रुती लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी यह श्रुति आज भीउतनी ही प्रासंगिक है जितनी इसे रचित करते समय थी। सृष्टि की उत्पत्ति आज भी एक रहस्य है। सृष्टि के पहले क्या था ? इसकी रचना किसने, कब और क्यों की ? ऐसा क्या हुआ जिससे इससृष्टि का निर्माण हुआ ?

universe_expansion
अनेकों अनसुलझे प्रश्न है जिनका एक निश्चितउत्तर किसी के पास नहीं है।
हाकिंग्स का कहना है कि सृष्टि के निर्माण में भगवान की कोई भूमिका नहीं है. मेरा यह लेख विज्ञान के प्रकाश में सृष्टि के निर्माण को समझने का एक प्रयास है. विज्ञान भगवान की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं समझता है. सृष्टि का निर्माण प्रकृति और विज्ञान के नियमों के अनुसार एक प्रक्रिया के तहत होता है. अगर ईश्वर है तो भी उसका आकार प्रकार हमारी कल्पना के अनुसार मानव जैसा नहीं हो सकता. वह हर प्रकार की कल्पना के परे है. जैसा हमारे यहाँ कहा गया है ईश्वर अनादि और अनंत है. उसकी न तो कोई शुरुआत है और न अंत. मुझे स्टीफन हाकिंग्स की बात तर्क संगत लगती है कि सृष्टि का निर्माण स्वत : एक प्रक्रिया के अंतर्गत होता है. हमारे यहाँ भी तो शिव को‘ स्वयंभुव ‘ ( या शंभु ) कहा गया है. स्वयंभुव का मतलब है जो स्वयं उत्पन्न होता है. सृष्टि का निर्माण, भगवान् की उपस्थिति / अनुपस्थिति का रहस्योद्घाटन अभी संभव नहीं है. अगर चार महान वैज्ञानिकों स्टीफन हाकिंग्स, अलबर्ट आइन्स्टीन, इलिया प्रिगोगीन ( Ilya Prigogine ) और चार्ल्स डार्विन के सद्धांतों पर विचार किया जाय तो एक रास्ता नज़र आता है. विज्ञान का रास्ता उचित, पाखण्ड और अंधविश्वास रहित और तर्कसंगत लगता है. आइन्स्टाइन के अनुसार किसी पदार्थ की मात्रा या मास ( Mass ) E = mc2 के अनुसार उर्जा में परिवर्तित होती है. लेकिन उर्जा पदार्थ में परिवर्तित होता है या नहीं यह एक रहस्य बना हुआ है. इस प्रश्न का उत्तर शायद स्टीफन हाकिंग्स के ‘ ब्लैक होल ‘ सिद्धांत में छिपा हुआ है. इस सिद्धांत के अनुसार ‘ ब्लैक होल ‘ उर्जा का सबसे सघन स्वरुप है. इसके बीच से सूर्य की किरण भी नहीं गुजर सकती. इसमें अपार गुरुत्वाकर्षण शक्ति होती है. यह किसी भी चीज़ को यहाँ तक की सूर्य की किरण को भी खींचकर अपने में समाहित कर लेता है. फिर एक ‘ क्रिटिकल स्टेज ‘ पहुंचने पर ‘ ब्लैक होल ‘ ‘ बिग बैंग ‘ से विस्फोट करता है. इस विस्फोट से‘ ब्लैक होल ‘ की उर्जा पदार्थ ( Matter ) बनकर बिखर जाती है शायद इस प्रकार उर्जा से पदार्थ का निर्माण होता है. इस प्रकार ब्रम्हांड में ब्लैक होल का निर्माण और विस्फोट लगातार होता रहता है. इस विस्फोट सेअनंत गैलेक्सियों का निर्माण होता है.

हर गैलेक्सी का अपना एक सूर्य होता है. कुछ सूर्य से छिटके हुए और कुछ बिग बैंग के दौरान निर्मित पदार्थ के टुकडे गुरुत्वाकर्षण बल के कारण केन्द्रीय सूर्य के चारों और अपनी कक्षा में चक्कर लगाते हैं. ये टुकडे ( Fragments ) अरबों-खरबों वर्ष में ठंढा होने पर ‘ गैलेक्सी ‘ और ग्रहोंका रूप ले लेते हैं. ब्रम्हांड में गैलेक्सियों का निर्माण और उनका ‘ ब्लैक होल‘ में परिवर्तन, सतत चलने वाली प्रक्रिया है. हाकिंग्स के अनुसार हमारी गैलेक्सी जिसे ‘ मिल्की वे ‘ ( Milky Way ) कहा जाता है, का निर्माण 3 मिनट में हुआ था ब्रह्मांड की उत्पत्ती के बारे में साइंस कई थ्योरीज़ पेश करती है। जिनमें सबसे भरोसेमन्द बिग बैंग थ्योरी मानी जाती है। इसके अनुसार यूनिवर्स एक महाधमाके (बिग बैंग) से पैदा हुआ और उस वक्त से मौजूदा जमाने तक यह लगातार फैल रहा है। यहधमाका कितने वक्त पहले हुआ इस बारे में वैज्ञानिकों में अलग अलग राय है। कुछ के अनुसार यूनिवर्स की कुल उम्र 14 बिलियन वर्षहै तो कुछ के अनुसार 20 बिलियन वर्ष। शुरूआती यूनिवर्स बहुत ही सघन (Dense) और छोटे गोले के रूप में था। और अत्यन्त गर्म था। फिर एक महाधमाके (बिग बैंग) के साथ टाइम और स्पेस का जन्म हुआ। उस समय से आज तक यह लगातार फैल रहा है। बिग बैंग के वक्त से ही भौतिकी के नियमों ने अपना काम करना शुरू किया।

चांद पर चीन ने छोड़े कामयाबी के निशान

                                 lunar_rover
चीन के पहले मून मिशन से जुड़ा रोवर रविवार को लैंडर से सफलतापूर्वक अलग हो गया और इस तरह चंद्रमा की सतह पर गहरा निशान छोड़ दिया। सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने खबर दी है कि चीन का पहला मून रोवर ‘यूतू’ या ‘जेड रैबिट’ रविवार सुबह लैंडर से अलग हो गया। छह पहियों वाला रोवर स्थानीय समयानुसार 4:35 बजे चंद्रमा की सतह को छू गया। इस पूरी प्रक्रिया को लैंडर पर लगे कैमरे के जरिए रिकॉर्ड किया गया। अलग होने के बाद रोवर और लैंडर पर लगे कैमरों ने एक दूसरे की तस्वीरें लीं और साइंटिफिक खोज शुरू कर दी।
इस रोवर को करीब दो सप्ताह पहले लॉन्ग मार्च-3बी कैरियर रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था। इस लैंडिंग के साथ ही चीन अमेरिका और पूर्व सोवियत रूस के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन गया है जिसने चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग की है। सॉफ्ट लैंडिंग का मतलब होता है जिस लैंडिंग में स्पेसक्राफ्ट और इसके उपकरणों को कोई नुकसान नहीं होता और वे सतह पर सही सलामत उतारे जाते हैं। इस प्रोब की सेफ लैंडिंग के लिए इसके चार पैरों में शॉक एब्जॉर्बर लगाए गए थे। इस तरह चांग’ई-3 जिसमें कि एक लैंडर और यूतू नाम का मून रोवर शामिल है, पैरों वाला पहला चाइनीज स्पेसक्राफ्ट बन गया। पेइचिंग एयरोस्पेस कंट्रोल सेंटर के मुताबिक, मून मिशन ने चांद के बे ऑफ रेनबोज पर स्थानीय समय के मुताबिक, 9 बजकर 11 मिनट पर लैंड किया था। चांग’ई-3 सही लैंडिंग पॉइंट पर उतरने और फ्री फॉल के लिए पूरी तरह ऑटो कंट्रोल पर भरोसा किया। रेंज और वेग की गिनती इसने खुद की थी।
इस प्रोब के लिए बनाए गए थ्रस्ट इंजन की डिजाइनिंग और निर्माण चीनी वैज्ञानिकों ने ही किया था। यह इंजन अलग-अलग फोर्स पावर को महसूस कर लेता है। अब यूतू का काम होगा कि चंद्रमा के भूवैज्ञानिक ढांचे का सर्वे करे, सतह पर मौजूद पदार्थों का सर्वे करे और वहां प्राकृतिक संसाधनों की मौजूदगी के बारे में पता लगाए। यह लैंडर मून पर एक साल तक काम करेगा जबकि रोवर तीन महीने तक ही रहेगा।
गौरतलब है कि चांग’ई-3 चीन के मून मिशन का दूसरा चरण है। इसमें ऑरबिटिंग, लैंडिंग और धरती पर वापसी शामिल है। इससे पहले चीन के चांग’ई-1 2007 में और चांग’ई-2 मिशन 2010 में कामयाब रहे थे। चांग’ई-3 ने पिछले दोनों मिशनों को कामयाबी के मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में चांग’ई-3 से पहले चांद के लिए 129 मिशन भेजे गए मगर इनमें से आधे ही कामयाब रहे थे। इनमें भी मानवरहित सॉफ्ट लैंडिंग करने में अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ को ही कामयाबी मिली थी।
पहला टेलीऑपरेशन स्पेस सेंटर : चीन ने रविवार को ही अपना पहला टेलीऑपरेशन अंतरिक्ष केंद्र खोला जहां से वह लूनर रोवर और लैंडर सुदूर अंतरिक्ष मिशन यानों की निगरानी कर सकेगा। इस केंद्र को पेइचिंग स्पेस कंट्रोल सेंटर ( बीएसीसी ) में बनाया गया है।

hacker

सामान्य प्रयोग में, कोई हैकर एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो सामान्यतः प्रशासकीय नियंत्रणों तक अभिगम प्राप्त करके कम्प्यूटरों के सुरक्षा-घेरे को तोड़ता है. हैकर्स के आस-पास जो उप-संस्कृति विकसित हुई है, अक्सर उसका उल्लेख कम्प्यूटर अंडरग्राउंड के रूप में किया जाता है
कंप्यूटर में शैतानी यानी हैकिंग। घर बैठे दुनिया के किसी कोने के कंप्यूटर के साथ छेड़छाड़ करने वाले और उससे तमाम महत्वपूर्ण जानकारियां आसानी से निकालने वाले को हैकर्स कहते हैं। जानकारों का कहना है कि हैकिंग के लिए बाजार में तमाम सॉफ्टवेयर मौजूद हैं लेकिन इसपर रोक लगाने का कोई तरीका अभी तक नहीं बना है।
लंबे समय तक इनके शैतानी कारनामों को बचपना बताकर खारिज कर दिया जाता था। इनकी गलतियों को छोटी मोटी बातें कह कर टाल दिया जाता था। लेकिन अब हैकर्स का एक बड़ा नेटवर्क है जो दुनिया के हर कोने में मौजूद है।
इनका मकसद पैसा कमाना हो गया है। इनके निशाने पर छोटी-मोटी साइटें नहीं बल्कि प्रतिष्ठित, विश्वसनीय और बड़ी वेबसाइटें होती हैं जहां लोग नियमित तौर पर अपने वेब ब्राउजर के जरिए विजिट करते हैं। ये बिक्री और वितरण से जुड़ी वेबसाइटों को खासतौर पर निशाने पर लेते हैं।
कंप्यूटर के जानकारों का कहना है कि हैकर्स सबसे पहले वेबसाइट का पासवर्ड तोड़ते हैं। इसके लिए कई तरह के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है। जानकार मानते हैं कि एक बार जैसे ही किसी ने आपका पासवर्ड हैक किया उसके बाद वो आप से जुड़ी सारी जानकारी अपने कब्जे में कर लेता है। आपके पैसे के लेन-देन से लेकर बैंक का पूरा हिसाब हैकर्स अपने पास रखने लगता है।
वो मन मुताबिक आपके बैंक अकाउंट से छेड़छाड़ कर सकता है। अगर आप किसी बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं तो उससे जुड़े सारे डाटा की कॉपी हैकर्स करता रहता है। जानकारों का कहना है कि इंटरनेट पर भी हैकिंग के तमाम तरीके उपलब्ध हैं। जिसे देखकर और पढ़कर लोग इस धंधे में आ रहे हैं

हैकर दृष्टिकोण

कम्प्यूटर अण्डरग्राउंड के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों और उद्देश्यों के साथ कार्य करनेवाले विभिन्न उप-समूह खुद को एक-दूसरे से अलग करने के लिये विभिन्न शब्दावलियों का प्रयोग करते हैं या जिस विशिष्ट समूह के साथ वे सहमत न हों, उसे बाहर रखने का प्रयास करते हैं. एरिक एस. रेमण्ड इस बात की वक़ालत करते हैं कि कम्प्यूटर अण्डरग्राउंड के सदस्यों को क्रैकर्स कहा जाना चाहिए. फिर भी, वे लोग स्वयं को हैकर्स के रूप में देखते हैं और जिसे वे एक व्यापक हैकर संस्कृति कहते हैं, में रेमण्ड के दृष्टिकोण को शामिल करने की भी कोशिश करते हैं, एक ऐसा विचार, जिसे स्वयं रेमण्ड द्वारा कड़े शब्दों में ख़ारिज किया जा चुका है. हैकर-क्रैकर द्विभाजन की बजाय, वे विभिन्न श्रेणियों, जैसे व्हाइट हैट (नैतिक हैकिंग), ग्रे हैट, ब्लैक हैट और स्क्रिप्ट किडी, के एक वर्णक्रम पर अधिक ज़ोर देते हैं. रेमण्ड के विपरीत, क्रैकर शब्दावली को वे सामान्यतः ब्लैक हैट हैकर्स, या अधिक सामान्य शब्दों में, ग़ैरक़ानूनी इरादों वाले हैकर्स, का उल्लेख करने के लिये आरक्षित रखते हैं.

चीन की दीवार – china Wall History In Hindi

                             china
चीन की दीवार का निर्माण चीन के प्रथम सामंत सम्राट छिन शहुंग के शालन काल में किया गया था , और मिंग राजवंश के काल में इस का पुनर्निर्माण किया गया , जो छै हजार किलोमीटर लम्बी है । लम्बी दीवार पर बड़ी संख्या में दर्रे बनाये गए ,जिन में से कुछ दर्रे विशेष महत्व रखते थे । लम्बी दीवार का प्रथम दर्रा शानहाईक्वान दर्रा कलहाता है , जो दुनिया के प्रथम दर्रे के नाम से मशहूर है , शानहाईक्वान दर्रा उत्तर चीन के हपै प्रांत व ल्याओ निन प्रांत की सीमा पर खड़ा है , यह लम्बी दीवार का आरंभ स्थल है। शानहाईक्वान दर्रा उत्तर में य्येन शान पर्वत से सटा हुआ है और दक्षिण में पो हाई समुद्र के तट तक पहुंचता है । दर्रे के क्षेत्र में प्राकृतिक सौंदर्य बहुत आकर्षक है , पर्वत पर हरियाली छायी है और समुद्र की जल राशि स्वच्छ और लहरेदार है । दर्रे का मुख्य दरवाजा पर्वत और समुद्र के बीच ऊंचा खड़ा नजर आता है । दर्रे पर आरोहित हुए दूर दृष्टि दौड़ाए , तो आलीशान और भव्य सुन्दर पहाड़ी समुद्री नजारा दिखता है , इसी कारण इस दर्रे का नाम शान हाई क्वान अर्थात गिर सागर का दर्रा रखा गया ।

चीन की दीवार 5वीं सदी ईसा पूर्व में बननी चालू हुई थी और 16 वीं सदी तक बनती रही।
यह दीवार चीन की उत्तरी सीमा पर बनाई गयी थी ताकि मंगोल आक्रमणकारियों को रोका जा सके।
चीन की यह दीवार संसार की सबसे लम्बी मानव निर्मित रचना है। जो लगभग 4000 मील (6,400 किलोमीटर) तक फैली है।
अंतरिक्ष से लिये गये पृथ्वी के चित्रों में भी यह नज़र आती है।
चीन की इस दीवार की चौड़ाई इतनी रखी गयी थी जिसपर 5 घुड़सवार या 10 पैदल सैनिक बगल-बगल में गश्त लगा सकें। इसकी सबसे ज़्यादा ऊँचाई 35 फुट है।
पुराने समय में तीर या भाले इतनी ऊँचाई को पार करके नहीं जा सकते थे और यह सुरक्षा देती थी।
बाद में इसमें निरीक्षण मीनारें बना कर दूर से आते शत्रुओं पर निगाह रखने के लिये भी इस्तेमाल किया गया और चीन को दूसरे देशों से अलग करने के लिये भी।
ऐसा कहा जाता है कि इसे बनाने में 3000 जानें गईं और कई मजदूर इसे अपनी पूरी ज़िन्दगी भर बनाते रहे.

Sunday, 16 August 2015

Iron pillar


कुतुब परिसर में स्थित लौह स्तम्भ
दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तम्भ सात मीटर ऊँचा है। इसका वजन लगभग छह टन है। इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1600 वर्ष पूर्व बनवाया। मुझे यह जानकर हैरानी हुई थी कि आज का यह लौह स्तम्भ प्रारम्भ से यहाँ नहीं था। गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तम्भ विदिषा (विष्णुपदगिरी/उदयगिरि - मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था। कुतुबुद्दीन-ऐबक ने जैन-मंदिर परिसर के सत्ताईस मंदिर तोड़े तब यह स्तम्भ भी उनमें से एक था। मंदिर से तोड़े गये लोहे व अन्य पदार्थ से से उसने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई। 



संस्कृत में अंकित कुछ वाक्य
कहते हैं कि राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने इस स्तम्भ को भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था और इसे एक पहाड़ी-विष्णुपदगिरि पर खड़ा करवाया। इस पर लिखी गईं संस्कृत की पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से यह बताती हैं कि बाह्लिक युद्ध के पश्चात उन्होंने यह स्तम्भ बनवाया। उनके काल में यह स्तम्भ समय बताने का भी कार्य करता था। विष्णुपदगिरि पहाड़ी पर स्थित इस स्तम्भ पर सूर्य की किरणें जिस ओर पड़तीं थीं उनकी गणना से समय पता लगाया जाता था।

ऐसा माना जाता है कि तोमर-साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तम्भ कुतुब परिसर में लगवाया। लौह स्तम्भ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन 1052 के तोमर राजा अनन्गपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

सन 1997 में पर्यटकों के द्वारा इस स्तम्भ को नुकसान पहुँचाने के पश्चात इसके चारों ओर लोहे का गेट लगा दिया गया है।

इस लौह स्तम्भ की खास बात यह है कि इसमें कभी ज़ंग नहीं लगा है। एक आम लोहा बारिश, सर्दी व गर्मी की लगातार बदलती ऋतुओं के कारण आसानी से ज़ंग खा जाता है किन्तु इसे हमारे इतिहास के बेहतरीन कारीगर व वैज्ञानिक क्षमता का उदाहरण ही कहा जायेगा कि यह लौह स्तम्भ आज विश्व में शोध का विषय बन गया है।

पंडित बाँकेराय द्वारा संस्कृत से किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद

qutub minar




नई दिल्ली: दिल्ली की पहचान कुतुब मीनार संभवत: पत्थरों की बनी विश्व की सबसे उंची मीनार है। यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों में शामिल कुतुब क्षेत्र की यह मीनार इस्लाम और हिन्दू स्थापत्य का बेजोड़ नमूना है।

दिल्ली के पुरातत्व अधीक्षक के के मोहम्मद ने कहा कि कुतुब मीनार की उंचाई 72. 5 मीटर है। लाल और धूसर बलुआ पत्थरों से बनी है। इस मीनार के आधार का व्यास 14. 32 मीटर और शिखर का व्यास 2. 75 मीटर है।

कुतुब मीनार का निर्माण कुतबुद्दीन ऐबक ने 1199 में शुरू किया था, वह पहली मंजिल ही बना सका। उसके उत्तराधिकारी शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने उपरी तीन मंजिलें और बनवाई। मीनार के आसपास एक उंची दीवार थी, जिसके बाहरी गलियारे को पत्थरों से निर्मित बड़े स्तंभों से सहारा दिया गया था।

मीनार में अरबी तथा नागरी लिपि में कई लेख पत्थरों पर खुदे हैं जो कुतुब का इतिहास बताते हैं। इसकी सतह के शिलालेखों के अनुसार, फिरोज शाह तुगलक और सिकंदर लोदी ने मरम्मत कराई थी। वर्ष 1829 में मेजर आर स्मिथ ने भी इसकी मरम्मत कराई थी।

कुतुब मीनार पर अंकित नागरी और फारसी अभिलेखों से प्रतीत होता है कि सन 1326 और 1368 में बिजली गिरने से इसे दो बार नुकसान हुआ था। पहले नुकसान के बाद मुहम्मद तुगलक ने उसने 1332 में इसकी मरम्मत कराई। दूसरे नुकसान के बाद फिरोज शाह तुगलक ने इसकी मरम्मत कराई थी। बाद में 1503 में सिकंदर लोदी ने भी उपर की मंजिलों की मरम्मत कराई थी।
मोहम्मद ने बताया कि इसमें बारिश का पानी जाने से खतरा उत्पन्न हो गया था, जिसकी तीन साल पहले ‘वाटर पैकिंग’ कर दी गयी है।

वाई डी शर्मा ने लिखा है कि यहां मंदिरों के नक्काशीयुक्त पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ। यहां निर्मित एक छतरी गिर गई थी, जिसकी जगह मेजर स्मिथ ने बाद में इस्लामी शैली की दूसरी छतरी 19वीं शताब्दी के शुरू में बनवाई लेकिन वह बेमेल लगती थी और उसे 1848 में उतार दिया गया। कुतुब मीनार के पूर्वोत्तर में है कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद जिसका निर्माण 1198 में कुतबुद्दीन ऐबक ने कराया था। यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तानों द्वारा निर्मित शुरूआती बड़ी मस्जिदों में से एक है।
मस्जिद के पूर्वी मुख्य द्वार के अभिलेख के अनुसार, कुतबुद्दीन ऐबक ने हिंदुओं और जैनों के 27 मंदिरों को तोड़ा तथा उनके मलबे और स्तंभों से यह मस्जिद बनवाई।

मस्जिद परिसर में लौह स्तंभ है जिस पर गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि में संस्कृत अभिलेख के अनुसार, यह चतुर्थ शताब्दी का है। अभिलेख के अनुसार, यह स्तंभ गुप्त वंश के चंद्रगुप्त द्वितीय की याद में विष्णुध्वजा के रूप में विष्णुपद पहाड़ी पर निर्मित किया गया था। स्तंभ के उपर बना गहरा छेद संकेत करता है कि शायद यहां गरूड की प्रतिमा स्थापित की गई होगी।

कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद के उत्तर पश्चिम में इल्तुतमिश का मकबरा है। इसे स्वयं इल्तुतमिश ने 1235 में बनवाया था। मस्जिद का दक्षिणी द्वार अलाउद्दीन खिलजी ने बनवाया था और इसे अलाई दरवाजा कहा जाता है। अलाई दरवाजा पहली इमारत है जिसमें निर्माण और ज्यामितीय अलंकरण के इस्लामी सिद्धांतों का इस्तेमाल किया गया।

कुतुब मीनार के उत्तर में अधूरी बनी अलाई मीनार स्थित है। इसका निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने शुरू किया था लेकिन 24. 5 फुट की पहली मंजिल जब बनी तब खिलजी का देहांत हो गया और मीनार अधूरी रह गई।

Mystery of this black pyramid ?

Mysterious pyramids
मिस्र के पिरामिड इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए हमेशा से ही उत्सुकता के केन्द्र रहे हैं. पिरामिडों में जिन लोगों के शवों को सहेज कर रखा गया है उनका इतिहास, पृष्ठभूमि के अलावा उनसे जुड़ी मान्यताओं और किस्से कहानियों की हकीकत को जानकर इतिहासकार और शोधकर्ता वर्षों से चली आ रही एक लंबी बहस का अंत करना चाहते हैं लेकिन इस ओर उनका प्रयास समय के साथ-साथ और मुश्किल होता जा रहा है.

black pyramidमिस्र के पिरामिडों की पहेली अभी सुलझी नहीं थी कि जापान में एक अनोखे और रहस्यमय पिरामिड ने शोधकर्ताओं की उत्सुकता को और अधिक बढ़ा दिया है. जापान के माउंट कसागी पर स्थित इस पिरामिड के विषय में बहुत कम लोग ही जानते हैं. लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह पिरामिड एक विशेष धार्मिक महत्व रखता है.

मिस्र के पिरामिडों से भिन्न यह जापानी पिरामिड ग्रेनाइट का बना हुआ है. माना जाता है कि दुनियां की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक अटलांटिस सभ्यता के लोग जब यहां भ्रमण करने आए होंगे तब उन्होंने यह पिरामिड बनाया होगा. काले रंग के इस पिरामिड की लंबाई 7 फुट और चौड़ाई 14 फुट है.

mysterious pyramids

ग्रेनाइट पत्थरों से बना यह पिरामिड देखने में जितना सुंदर और अद्भुत हैं, इसका इतिहास उससे कहीं ज्यादा रहस्यमयी है. क्योंकि कोई भी यह नहीं जानता कि इस पिरामिड को किसने और कब बनवाया. इतना ही नहीं पुख्ता तौर पर कोई यह भी नहीं जानता कि इस पिरामिड को बनाने का कारण क्या है. उत्तर-मध्य जापान के नगोया शहर में स्थित इस पिरामिड के बारे में जापानी लोग भी बहुत ज्यादा नहीं जानते. ग्रेनाइट के एक बड़े पत्थर को तराश कर एक पिरामिड का रूप दिया गया है. यह पत्थर कहां से आया और कौन इस भारी पत्थर को उठाकर लाया कोई नहीं जानता. नौ टन के इस पिरामिड रूपी पत्थर को किसी विशेष प्रयोजन के तहत यहां लाया गया है क्योंकि आसपास के किसी भी क्षेत्र में ऐसा बड़ा या छोटा कोई पत्थर नहीं है. यह पिरामिड पहाड़ी ढलान पर स्थित है और इतने बड़े पत्थर को आसानी से यहां लाना किसी भी रूप में संभव नहीं है. माना जा रहा है कि इसे पर्वत तक पहुंचाने में किसी विशेष सहायता की आवश्यकता पड़ी होगी.

घने जंगलों के बीचोबीच स्थित इस पिरामिड के विषय में कई मान्यताएं प्रचलित हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस पिरामिड में एक सफेद रंग का बड़ा और अद्भुत सांप रहता है. गांव के लोग इस सांप की पूजा करने के अलावा उसके खाने के लिए अंडे भी छोड़ते हैं. ऐसी परंपरा या मान्यता पूरे जापान या फिर संपूर्ण एशिया में कहीं और देखने को नहीं मिलेगी. हालांकि संप को अंडे खिलाए जाने का संबंध नाइल घाटी से भी है लेकिन वह जापान से विपरीत दिशा में है.

इस स्थान का अध्ययन करने के बाद यह बात सामने आई है कि आज तक कभी भी खगोलीय सर्वेक्षण के लिए इस स्थान का चुनाव नहीं किया गया है. इस जगह की खुदाई के बाद यह पता लगाया गया है कि इसका संबंध इतिहास से भी पहले से है.

nazaca line

किसी अनजान सी सभ्यता के अस्तित्व की अनूठी विरासत हैं 'नाज्का रेखाएं'. ये रेखाएं वस्तुतः Geoglyphs (धरती पर बने विशाल रेखाचित्र) हैं.   80 किमी से भी अधिक क्षेत्रफल में फैले भूभाग में सैकडों रेखाचित्रों का संग्रह हैं - नाज्का रेखाएं. इन रेखाओं में पक्षी, बन्दर आदि जीवों के अलावे कई ज्यामितीय रेखाएं भी हैं, जिनमें त्रिभुज, चतुर्भुज आदि सदृश्य संरचनाएं शामिल हैं. 

nazca lines peruलैटिन अमेरिका के पेरू में नाज्का मरुस्थल में संरक्षित ये संरचनाएं 'नाज्का संस्कृति' की विरासत मानी जाती हैं. स्थापित मान्यता के अनुसार इस संरचना का कालक्रम 200 BCE और 700 CE के मध्य का माना जाता है. 

इनके निर्माण के प्रयोजन हेतु कई मत प्रचलित हैं. एक मान्यता इनके धार्मिक मह्त्त्व को दर्शाती है. कहते हैं तत्कालीन सभ्यता यह विश्वास करती थी कि आकाश से देवता इन्हें देख सकेंगे. स्थानीय मान्यता इन रेखाचित्रों को अन्तरिक्ष यानों के लैंडिंग से भी जोड़ कर देखती है. आकाश से ही ऐसा जुडाव क्यों इसकी चर्चा आगे. एक अन्य मान्यता इन्हें खगोलीय पिंडों की स्थिति, अध्ययन और कैलेंडर के निर्माण से जोड़ती है. एक मत इनका जुडाव पहाड़ों तथा जल श्रोतों से जुडाव को लेकर भी है, जो सामाजिक और धार्मिक दोनों कारणों का सम्मिश्रण है. 

उल्लेखनीय है कि इन आकृतियों को इनके सही परिप्रेक्ष्य में आकाश मार्ग या remote height से ही देखा जा सकता है. इस अनुमान की पुष्टि में वैज्ञानिक Jim Woodmann ने एक गुब्बारे का निर्माण भी किया जिसके निर्माण में तत्कालीन सभ्यता सक्षम हो सकती थी. किन्तु उस काल में ऐसे किसी गुब्बारे के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं मिलता. ऐसे में बिना किसी अन्तरिक्षयान या हवाई सर्वेक्षण के धरती पर ऐसी विशालकाय संरचनाएं उकेरना वाकई आश्चर्यजनक है. 

UNESCO की 'विश्व विरासत सूची' में शामिल ये रचनायें जहाँ अभी भी कई रहस्यों को अपने में समेटे हुए हैं, वहीँ बदलती जलवायु से इनके अस्तित्व को खतरा भी पैदा हो गया है. इन आकृतियों का उद्देश्य चाहे जो भी रहा हो मगर ऐसी सभ्यताएं एक सवाल तो मन में उत्पन्न कर ही देती हैं कि- '"जाने वो कैसे लोग थे..."