किसी अनजान सी सभ्यता के अस्तित्व की अनूठी विरासत हैं 'नाज्का रेखाएं'. ये रेखाएं वस्तुतः Geoglyphs (धरती पर बने विशाल रेखाचित्र) हैं. 80 किमी से भी अधिक क्षेत्रफल में फैले भूभाग में सैकडों रेखाचित्रों का संग्रह हैं - नाज्का रेखाएं. इन रेखाओं में पक्षी, बन्दर आदि जीवों के अलावे कई ज्यामितीय रेखाएं भी हैं, जिनमें त्रिभुज, चतुर्भुज आदि सदृश्य संरचनाएं शामिल हैं.
लैटिन अमेरिका के पेरू में नाज्का मरुस्थल में संरक्षित ये संरचनाएं 'नाज्का संस्कृति' की विरासत मानी जाती हैं. स्थापित मान्यता के अनुसार इस संरचना का कालक्रम 200 BCE और 700 CE के मध्य का माना जाता है.
इनके निर्माण के प्रयोजन हेतु कई मत प्रचलित हैं. एक मान्यता इनके धार्मिक मह्त्त्व को दर्शाती है. कहते हैं तत्कालीन सभ्यता यह विश्वास करती थी कि आकाश से देवता इन्हें देख सकेंगे. स्थानीय मान्यता इन रेखाचित्रों को अन्तरिक्ष यानों के लैंडिंग से भी जोड़ कर देखती है. आकाश से ही ऐसा जुडाव क्यों इसकी चर्चा आगे. एक अन्य मान्यता इन्हें खगोलीय पिंडों की स्थिति, अध्ययन और कैलेंडर के निर्माण से जोड़ती है. एक मत इनका जुडाव पहाड़ों तथा जल श्रोतों से जुडाव को लेकर भी है, जो सामाजिक और धार्मिक दोनों कारणों का सम्मिश्रण है.
उल्लेखनीय है कि इन आकृतियों को इनके सही परिप्रेक्ष्य में आकाश मार्ग या remote height से ही देखा जा सकता है. इस अनुमान की पुष्टि में वैज्ञानिक Jim Woodmann ने एक गुब्बारे का निर्माण भी किया जिसके निर्माण में तत्कालीन सभ्यता सक्षम हो सकती थी. किन्तु उस काल में ऐसे किसी गुब्बारे के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं मिलता. ऐसे में बिना किसी अन्तरिक्षयान या हवाई सर्वेक्षण के धरती पर ऐसी विशालकाय संरचनाएं उकेरना वाकई आश्चर्यजनक है.
UNESCO की 'विश्व विरासत सूची' में शामिल ये रचनायें जहाँ अभी भी कई रहस्यों को अपने में समेटे हुए हैं, वहीँ बदलती जलवायु से इनके अस्तित्व को खतरा भी पैदा हो गया है. इन आकृतियों का उद्देश्य चाहे जो भी रहा हो मगर ऐसी सभ्यताएं एक सवाल तो मन में उत्पन्न कर ही देती हैं कि- '"जाने वो कैसे लोग थे..."
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