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Friday, 30 October 2015

वैज्ञानिकों को मिला चौंकाने वाला धूमकेतु, बड़ी मात्रा में मौजूद है ऑक्सीजन

           वैज्ञानिकों को मिला चौंकाने वाला धूमकेतु, बड़ी मात्रा में मौजूद है ऑक्सीजन
लंदन : वैज्ञानिकों को पहली बार किसी धूमकेतु के पर्यावरण में प्रचुर ऑक्सीजन का पता चला है जिससे अपनी सौर तंत्र के उद्भव के बारे में हमारी समझ बदल सकती है। यह धूमकेतु अगस्त में सूर्य के समीप से गुजरा था।
इस खोज से पता चला है कि धूमकेतु '67 पी चुरयुमोव- गेरोसिमेंको' के निर्माण के समय में उसमें ऑक्सीजन अणुओं को भी जगह मिली। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) का अंतरिक्षयान रोसेटा पिछले एक साल से इस धूमकेतु का अध्ययन में जुटा है और उसे वहां उसके केंद्र से उठती हुई कई गैसों की प्रचुर मात्रा का पता चला।
इस धूमकेतू पर वाष्पकण, कार्बन मोनो ऑक्साइड और कार्बन डाइ ऑक्साइड बहुत अधिक थी। जबकि नाइट्रोजन, सल्फर और कार्बन से जुड़े अन्य यौगिक भी थे। नोबल गैसों (गैसों के विशेष समूह) का भी पता चला है।
आयोन और न्यूट्रल एनालिसिस उपकरण रोसिना के रोसेटा ऑरबिटर स्पेक्ट्रोमीटर से जुड़े प्रधान वैज्ञानिक बर्न विश्वविद्यालय के कैथरीन एलटवेग ने कहा, 'हमें वाकई इस धूमकेतु पर ऑक्सीजन का पता चलने की उम्मीद नहीं थी और वो भी इतनी बड़ी मात्रा में क्योंकि यह रासायनिक रूप से बहुत सक्रिय गैस है, ऐसे में यह खोज बिल्कुल एक चौंकाने वाली बात है।'
referencehttp://zeenews.india.com/hindi/science/scientists-discovered-a-wonderful-comet/274399

Tuesday, 13 October 2015

पृथ्वी का भविष्य बताएगा चीन का सुपर कंप्यूटर ‘मैजिक क्यूब’



पृथ्वी का भविष्य बताएगा चीन का सुपर कंप्यूटर ‘मैजिक क्यूब’
बीजिंग : पृथ्वी के भविष्य को जानने की चाह, जलवायु और जैविक प्रणालियों में संभावित परिवर्तनों की गणना के लिए चीन की 1.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर की लागत से करीब दो मंजिला इमारत की ऊंचाई वाले ‘मैजिक क्यूब’ सुपर कंप्यूटर को इस काम में लाने की योजना है।
चीन के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि बादलों के निर्माण से लेकर सैकड़ों या हजारों साल बाद जलवायु परिवर्तन तक पृथ्वी की प्राकृतिक व्यवस्था में वे लगभग सबकुछ की गणना कर सकेंगे। चीनी विज्ञान अकादमी (सीएएस) के अंतर्गत आने वाले कई अनुसंधान संस्थानों ने संयुक्त रूप से विशेष सुपर कंप्यूटर का अनावरण किया जिसे अर्थ सिस्टम न्यूमेरिकल सिमुलेटर नाम दिया गया है और यह कंप्यूटर ‘सीएएस अर्थ सिस्टम मॉडल 1.0’ सॉफ्टवेयर पर काम करता है।
‘मैजिक क्यूब’ सुपर कंप्यूटर को उत्तरी बीजिंग के होंगग्युआनकून सॉफ्टवेयर पॉर्क में रखा गया है। इसको बनाने में करीब 9 करोड़ यूआन (करीब 1.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर) की लागत आयी। इस कंप्यूटर की गणना करने की क्षमता कम से कम एक पेटाफ्लॉप तक है जिस कारण यह चीन के 10 सबसे शक्तिशाली कंप्यूटरों में शुमार है। इसमें पांच पीबी (करीब 50 लाख गीगाबाइट) की डेटा संचयन क्षमता है।
सरकारी समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार ‘मैजिक क्यूब’ आकार में भविष्य के पृथ्वी सिम्युलेटर की तुलना में दसवां हिस्सा है जिसके डिजाइन पर अब भी काम चल रहा है और वैज्ञानिक इसका उपयोग अंतिम तौर पर उपयोग में लाये जाने वाले सिम्युलेटर के रूप में करेंगे।
reference :-http://zeenews.india.com/hindi/science/china-to-press-in-magic-cube-to-study-earths-future/271958

Monday, 12 October 2015

प्राचीन मंगल पर लंबे समय तक थी झीलें और नदियां : नासा

प्राचीन मंगल पर लंबे समय तक थी झीलें और नदियां : नासा
वैज्ञानिकों ने पाया है कि करीब 3.8 से लेकर 3.3 अरब साल पहले मंगल पर लंबे समय तक झीलें और जल धाराएं थी जिससे इस धारणा को बल मिलता है कि ‘लाल ग्रह’ पर कभी जीवन मौजूद रहा होगा। इन वैज्ञानिकों में भारतीय मूल का एक वैज्ञानिक भी शामिल है।
क्यूरोसिटी रोवर से मिले डेटा का उपयोग करते हुए नासा के मार्स साइंस लैबोरेटरी क्यूरियोसिटी टीम ने पाया कि काफी समय पहले जल ने गेल क्रेटर में गाद के जमा होने में मदद की होगी जहां रोवर तीन साल से कुछ समय पहले उतरा था। गाद के ये निक्षेप परत के रूप में जमा हैं जिसने माउंट शार्प को निर्मित किया। यह पर्वत क्रेटर के बीच पाया गया।
केलीफोर्निया स्थित नासा के जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी मार्स साइंस लैबोरेटरी परियोजना वैज्ञानिक अश्विन वासवडा ने बताया कि रोवर से मिली जानकारी से पता चलता है कि 3.8 से 3.3 अरब साल पहले इस अवधि के बीच कभी लंबे समय तक जलधाराएं और झीलें रही होंगी जिसने गाद बनाया होगा जो माउंट शार्प की निचली परतों में जमा है।
यह नयी जानकारी पहले के उन कार्यों पर आधारित है जिनके तहत कहा गया था कि मंगल पर प्राचीन समय में झीलें रही होंगी। पिछले महीने नासा के वैज्ञानिकों ने मंगल पर पानी का प्रवाह होने की पुष्टि की थी। नासा के मार्स एक्सप्लोरेशन के प्रमुख वैज्ञानिक माइकल मियर ने बताया कि यह स्पष्ट है कि अरबों साल पहले मंगल बहुत हद तक आज की पृथ्वी जैसा रहा होगा।
ताजा नतीजे इस बारे में संकेत देते हैं कि ये आद्र्र परिदृश्य माउंट शार्प के निचले हिस्से के लिए सही हैं। वासवडा ने बताया कि गेल में हमने प्राचीन कालीन तेजे से प्रवाहित होने वाली जल धाराओं के साक्ष्य देखें। हम बारीक कणों वाला गाद प्रचुर मात्रा में देख पा रहे हें जो झील के तलछट की तरह दिखते हैं। गाद इस बात के संकेत देते हैं कि झील के रूप में ठहरा हुआ पानी लंबे समय तक रहा होगा।
reference :-http://zeenews.india.com/hindi/science/ancient-mars-had-long-lasting-lakes-rivers-nasa/272556

मंगल ग्रह पर बहते पानी से गेल क्रेटर भरा

वॉशिंगटन: लगभग 3.3-3.8 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर मौजूद झरनों व झीलों ने गेल क्रेटर को तलछट से भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यही परतें उस पहाड़ की बुनियाद बनी, जिसे माउथ शार्प कहा जाता है। एक भारतवंशी वैज्ञानिक ने यह खुलासा किया।
नासा के मार्स साइंस लेबोरेटरी (एमएसएल) में परियोजना वैज्ञानिक अश्विन वसावडा ने कहा कि ऐसा लगता है कि अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर व्यापक वायुमंडल था और एक सक्रिय जलमंडल भी था, जहां झीलों में पानी जमा होता था। एमएसएल के दल ने कहा कि इसी जल ने गेल केट्रर को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वसावडा ने कहा,क्यूरियोसिटी रोवर के अवलोकन से पता चलता है कि वहां मौजूद उन झीलों व झरनों ने तलछट प्रदान करने का काम किया, जो धीरे-धीरे माउंट शार्प का निचले सतह के रूप में विकसित हुआ। मंगल ग्रह पर क्यूरियोसिटी रोवर के पहुंचने के पहले वैज्ञानिकों का विचार था कि गेल क्रेटर को तलछटों द्वारा भरा गया होगा।
कुछ संकल्पनाओं के मुताबिक, ये तलछट हवा में मौजूद धूल कणों व बालू से जमा हुए, जबकि कुछ अन्य के मुताबिक ये तलछट झीलों व झरनों से आए होंगे। हालिया शोध में यह बात पक्की हो गई है कि मंगल ग्रह पर मौजूद झरनों व झीलों ने गेल क्रेटर को तलछट से भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यही परतें उस पहाड़ की बुनियाद बनीं।

अंतरिक्ष से चलेगा इंटरनेट

Image copyrightFacebook
फ़ेसबुक अफ़्रीका के दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वालों को अंतरिक्ष के ज़रिए इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराएगा.
फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग ने इस बात की जानकारी एक पोस्ट में दी है.
कंपनी का कहना है कि उसने फ्रांस की एक कंपनी यूटेलसेट के साथ इस संबंध में क़रार किया है. उम्मीद है कि 2016 तक अंतरिक्ष में पहला उपग्रह भेजा जाएगा.
मार्क ज़करबर्ग ने कहा कि AMOS-6 नामक उपग्रह अभी तैयार किया जा रहा है, जो अंतरिक्ष से अफ्रीका के ज़्यादातर हिस्से में इंटरनेट की सुविधा पहुंचाएगा.
उन्होंने कहा, "हम पूरी दुनिया को कनेक्ट करने की मुहिम जारी रखेंगे, भले ही इसके लिए हमें पृथ्वी से बाहर देखना पड़े."

गंभीर आलोचना

उपग्रह के जरिए इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध करने की योजना फेसबुक के 'इंटरनेट डॉट ओआरजी' प्रोजेक्ट का हिस्सा है.

Image copyrightFacebook
हालांकि 'इंटरनेट डॉट ओआरजी' प्रोजेक्ट को कुछ देशों में तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.
कुछ इलाकों, ख़ासकर भारत में उद्योगपति-कारोबारी यह कहते हुए नाराज़ हो रहे हैं कि इससे फेसबुक और इसके पार्टनर को इंटरनेट बाजार को विकसित करने का अनुचित लाभ मिल रहा है.
'इंटरनेट डॉट ओआरजी' मुश्किल स्थलों पर इंटरनेट पहुंचाने के लिए विभिन्न तरीकों पर प्रयोग कर रहा है.
reference :-http://www.bbc.com/hindi/science/2015/10/151006_facebook_plans_satellite_sk

दो वैज्ञानिकों को मिला भौतिकी का नोबेल


इस साल भौतिकी शास्त्र का नोबेल दो वैज्ञानिकों तकाकी काजिता और आर्थर बी मैकडोनाल्ड को देने की घोषणा की गई है.
'रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ़ साइंस' का कहना है कि इन दोनों वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड में सबसे सामान्य तौर पर मिलने वाले कणों न्यूट्रीनोस को लेकर अद्भुत खोजें की हैं.
इनके प्रयोगों से पता चला है कि न्यूट्रीनोस में भार होता है.
एकेडमी के मुताबिक़ ये ऐसी खोज है जिसने 'पदार्थ की सबसे आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर हमारी समझ को बदला है और इसने ब्रह्मांड के इतिहास, ढांचे और भविष्य को प्रभावित किया है.'

अहम योगदान

Image copyrightKamioka Observatory ICCR University of Tokyo
प्रोफ़ेसर मैकडोनाल्ड कनाडा से हैं जहां वो किंग्स्टन की क्वींस यूनिवर्सिटी में पार्टिकल फ़िज़िक्स के प्रोफ़ेसर हैं.
ख़ुद को नोबेल दिए जाने की घोषणा पर उन्होंने कहा, "सौभाग्य से, मेरे बहुत से साथी हैं जो मेरे साथ इस पुरस्कार के हक़दार हैं. इस खोज में उनका बहुत अहम योगदान रहा है."
वहीं जापान के प्रोफ़ेसर काजिता टोक्यो यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं. नोबेल की घोषणा के दौरान प्रेस ब्रीफिंग में उनसे बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी.
वर्ष 1901 से अब तक 201 वैज्ञानिकों को भौतिकी शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है जिनमें दो महिलाएं भी शामिल हैं.
reference :-http://www.bbc.com/hindi/science/2015/10/151006_physics_nobel_2015_aa

डीएनए मरम्मत पर अध्ययन के लिए नोबेल

इस साल रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों टॉमस लिंडाल, पॉल मॉडरिश और अज़ीज सैंकर को दिया जाएगा.
उन्हें ये पुरस्कार डीएनए की मरम्मत पर उनके अध्ययन के लिए दिया जा रहा है.
'रॉयल स्वीडिश अकेडमी ऑफ साइंसेज़' का कहना है कि इन वैज्ञानिकों के अध्ययन ने इस बात को समझने में मदद की कि कैंसर जैसी परिस्थितियों में स्थिति किस तरह बिगड़ सकती है.
इन वैज्ञानिकों ने बताया कि कोशिकाएं किस तरह क्षतिग्रस्त डीएनए की मरम्मत करती हैं.

गर्व

Image copyrightThinkstock
पुरस्कार के तहत मिलने वाली 80 लाख स्वीडिश क्रोनर की राशि को तीनों विजेताओं में बराबर-बराबर बांटा जाएगा.
ब्रिटेन के फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट में कार्यरत टॉमस लिंडाल ने कहा, "इस पुरस्कार के लिए ख़ुद को चुने जाने पर मुझे ख़ुशी भी है और गर्व भी."
इससे पहले मंगलवार को भौतिकी शास्त्र का नोबेल जापान के तकाकी काजिता और कनाडा के आर्थर मैकडोनाल्ड को देने की घोषणा की गई.

जानें, नोबेल पुरस्कार हैं क्या?

जानें, नोबेल पुरस्कार हैं क्या?
नोबेल! पुरस्कार से ज्यादा एक ऐसा सम्मान है, जो समाज और दुनिया में आपके होने का अर्थ बता देता है, यह एक ऐसा सम्मान है जिसके आगे आज के आधुनिक दौर के तख्तोताज ही नहीं पैसे की चकाचौंध और सत्ता का गुरूर भी झुक जाता है. आखिर क्या है यह नोबेल पुरस्कार, कैसे शुरू हुआ यह, कौन देता है इसे, क्या है इसका इतिहास, फेस एन फैक्ट्स के हिन्दी पाठकों के लिए हम बता रहे दुनिया के इस सबसे सम्मानित सम्मान की गाथा: 

दुनिया को डायनामाइट जैसी विस्फोटक चीज देने वाले अल्फ्रेड नोबेल की संपत्ति से हर साल उन लोगों को सम्मानित किया जाता है जिन्होंने दुनिया को खुशहाल और शांतिमय बनाने में योगदान दिया है.

हर साल चिकित्सा, भौतिकी, रसायन, साहित्य और शांति के साथ साथ अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार दिए जाते हैं. वैसे स्वीडिश वैज्ञानिक और डायनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेड बर्नाड नोबेल की 1895 की जिस वसीयत के तहत 1901 में जब नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हुई उसमें अर्थशास्त्र के क्षेत्र में योगदान के लिए किसी पुरस्कार का जिक्र नहीं है. लेकिन 1968 में स्वीडन के केंद्रीय बैंक ने अपनी 300वीं वर्षगांठ पर अल्फ्रेड नोबेल की याद में इस पुरस्कार को शुरू किया. अर्थशास्त्र का पहला नोबेल 1969 में नॉर्वे के रैगनर एंथोन किटील फ्रिश और नीदरलैंड्स के यान टिरबेरगेन को दिया गया.

नोबेल पुरस्कार विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार माना जाता है. शांति के लिए दिए जाने वाला नोबेल पुरस्कार ओस्लो में जबकि बाकी सभी पुरस्कार स्टॉकहोम में दिए जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि नोबेल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिए जाते.

1901 में पहले नोबेल पुरस्कार:

चिकित्सा, भौतिकी, रसायन, साहित्य और शांति के क्षेत्र में पहली बार 1901 में नोबेल पुरस्कार दिए गए.  पहला नोबेल शांति पुरस्कार 1901 में रेड क्रॉस के संस्थापक हैरी दुनांत और मशहूर शांतिवादी फ्रेडरिक पैसी को संयुक्त रूप से दिया गया. पुरस्कार के लिए बनी समिति और चयनकर्ता हर साल अक्टूबर में नोबेल पुरस्कार विजेताओं की घोषणा करते हैं लेकिन पुरस्कारों का वितरण अल्फ्रेड नोबेल की पुण्य तिथि 10 दिसंबर को किया जाता है.

हर एक पुरस्कार से एक साल में अधिकतम तीन लोगों को पुरस्कार दिया जा सकता है. इनमें से प्रत्येक विजेता को एक स्वर्ण पदक, डिप्लोमा और निश्चित धनराशि दी जाती है. अगर एक पुरस्कार साझा तौर पर दो लोगों को दिया जाता है, तो धनराशि दोनों में समान रूप से बांट दी जाती है. 2009 में विजेता को 14 लाख अमेरिकी डॉलर इनाम के रूप में दी गई थी.  हर साल इनाम राशि नोबेल फाउंडेशन की आय पर निर्भर करती है.

अब तक केवल दो बार मृत व्यक्तियों को यह पुरस्कार दिया गया है. पहली बार एरिक एक्सल कार्लफेल्ड को 1931 में और दूसरी बार संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव डैग हैमर्सक्योल्ड को 1961 में इससे नवाजा गया. लेकिन 1974 में नियम बना दिया गया कि मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाएगा.

कौन थे अल्फ्रेड  नोबेल ?


अल्फ्रेड बर्नाड  नोबेल का जन्म 1833  में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुआ था. 9 वर्ष की आयु में वह अपने परिवार के साथ रूस चले गए. नोबेल  जब 18 साल के थे तो उन्हें रसायन की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजा गया. अल्फ्रेड नोबेल ने 1867  में डाइनामाइट की खोज की. नोबेल ने अपनी पूरी जिंदगी में कुल 355 आविष्कार किए थे. लेकिन सबसे ज़्यादा नाम और पैसा उन्होंने 1867 में डायनामाइट के आविष्कार से कमाया.

रूस से स्वीडन वापस आने पर वह अपने पिता के कारखाने में विस्फोटकों और खासकर नाइट्रोग्लिसरीन के अध्ययन में लग गए.  3 सितंबर 1864 को भयानक विस्फोट के कारण  वह कारखाना नष्ट हो गया और इनके छोटे भाई की उसी में मौत हो गई. इस धमाके में 4 और लोगों की मृत्यु हुई.

क्यो शुरू किए नोबेल पुरस्कार:

1888 में एक अखबार ने गलती से अल्फ्रेड नोबेल की मौत की खबर छापी. उस खबर को नोबेल ने भी पढ़ा. अखबार ने लिखा था, "मौत के सौदागर की मृत्यु". अखबार ने डाइनामाइट के आविष्कार की आलोचना की  और उसे हजारों लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहराया. अपनी मृत्यु का समाचार पढ़कर नोबेल को गहरा सदमा लगा. 

उन्होंने ने सोचा कि क्या उनकी मौत के बाद दुनिया उन्हें इसी नाम से पुकारेगी. 27 नवंबर 1895 को उन्होंने एक वसीयत लिखी जिसमें  उन्होंने अपनी संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा एक ट्रस्ट बनाने के लिए अलग कर दिया. उनकी इच्छा थी कि इस रकम पर मिलने वाले ब्याज से हर साल उन लोगों को सम्मानित किया जाए जिनका काम मानवजाति के लिए सबसे कल्याणकारी पाया जाए. 31 दिसंबर 2007 के एक आंकड़े के मुताबिक नोबेल फाउंडेशन की संपत्ति 56 करोड़ अमेरिकी डॉलर बताई गई.

अपनी जिंदगी में नोबेल ने शादी नहीं की, लेकिन उनके प्रेम संबंध तीन महिलाओं से रहे. 10 दिसंबर 1896 नोबेल का दिल का दौरा पड़ने से इटली में निधन हुआ.
reference :-http://www.jantajanardan.com/NewsDetails/5073/meaning-of-nobel-prize.htm