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Friday, 18 September 2015

सूर्य ग्रहण से जुड़े 15 रहस्य जो आप नहीं जानते

एक सेकेंड भी इधर-उधर नहीं क्या आप जानते हैं सूर्य ग्रहण अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पड़ता है। जिसमें एक सेकेंड इधर-उधर नहीं होता है।
6,585.32 दिन का महत्व अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार जो सूर्य सूर्य ग्रहण कल पड़ेगा, ठीक वैसा ही सूर्य ग्रहण 6,585.32 दिन (18 वर्ष 11 दिन) बाद भी पड़ेगा
चंद्रमा की परछाईं सूर्य ग्रहण के वक्त पृथ्वी पर चंद्रमा की परछाईं पृथ्वी पर पड़ती है, जो 1100 मील प्रति घंटा की रफ्तार से इक्वेटर पर चलती है
ध्रुवों पर चंद्रमा की परछाईं सूर्य ग्रहण के वक्त पृथ्वी के ध्रुवों पर चंद्रमा की परछाईं 5000 मील प्रति घंटा की रफ्तार से चलती है
कंफ्यूज हो जाते हैं जानवर सूर्य ग्रहण के वक्त पशु-पक्षी कंफ्यूज हो जाते हैं और सोने की तैयारी करने लगते हैं
पृथ्वी की घुर्णन गति प्रत्येक सूर्य ग्रहण पड़ने पर पृथ्वी की घुर्णन गति में 0.001 सेकेंड प्रति दशक की कमी आती है।
परछाईं की चौड़ाई पृथ्वी पर पड़ने वाली परछाईं की अध‍िकतम चौड़ाई 167 मील हो सकती है, इससे अध‍िक नहीं
पूर्ण सूर्य ग्रहण की समय सीमा एक पूर्ण सूर्य ग्रहण अध‍िकतम 7.5 मिनट तक रह सकता है।
एक साल में कितने सूर्य ग्रहण एक साल में कम से कम 2 और अध‍िकतम 5 सूर्य ग्रहण पड़ सकते हैं।
उत्तीरी और दक्ष‍िणी ध्रुव से उत्तीरी और दक्ष‍िणी ध्रुव से केवल आंश‍िक सूर्य ग्रहण ही दिख सकता है, पूर्ण सूर्य ग्रहण यहां से कभी नहीं दिख सकता है
चरम पर होता है सूर्य ग्रहण जब सूर्य ग्रहण अपने चरम पर होता है, तब पृथ्वी पर चंद्रमा की एक गोलाकार छवि बनती है।
गिर जाता है तापमान जिस जगह से सूर्य ग्रहण दिखाई देता है, वहां का तापमान करीब 20 डिग्री सेंटीग्रेड तक गिर जाता है
सूर्योदय-सूर्यास्त प्रत्येक ग्रहण सूर्योदय के वक्त शुरू होता है और सूर्यास्त पर खत्म होता है
पूर्ण सूर्य ग्रहण प्रत्येक एक या दो वर्षों में पूर्ण सूर्य ग्रण पड़ता है।
यदि कोई ग्रह है तो सूर्य ग्रहण के वक्त यदि कोई ग्रह मौजूद है, तो वह प्रकाश के बीच एक बिंदु की तरह दिखाई देता है

पृथ्वी पर मौजूद हैं कई अमर इंसान, कैंब्रिज के वैज्ञानिक का दावा

अमर कौन नहीं होना चाहता! इस बात को एक स्थापित सत्य मान लिया गया है कि जो धरती पर पैदा हुआ है उसे एक न एक दिन मरना ही होता है. लेकिन कैंब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े एक वैज्ञानिक का कहना है कि यह पूरा सत्य नहीं है. इस धरती के ऊपर ऐसे कई इंसान पैदा हुए हैं जो कि अमर हैं. अपने इस दावे को साबित करने के लिए इस वैज्ञानिक के पास अपने तर्क हैं.

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इस वैज्ञानिक का नाम है औब्रे डी ग्रे जो कि एक जेरॉन्टोलॉजिस्ट हैं. जेरॉन्टोलॉजिस्ट उम्र के बारे में सभी पहलुओं का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक को कहते हैं. औब्रे डी ग्रे के अनुसार एक ऐसा व्यक्ति जो सभी प्रकार के बीमारियों से मुक्त हो और जिसके शरीर में ऐसी कोई व्याधि न उत्पन्न हो जो उसके मृत्यु का कारण बन सकती है वह अमर हो सकता है.


औब्रे डी ग्रे का कहना है कि अगर लोग उनसे यह सवाल करते हैं कि क्या दुनिया में किसी ऐसे व्यक्ति का अस्तित्व संभव है जो काफी वर्षों से जिंदा हो और उसे किसी‌ भी तरह की बीमारी न हो, तो उन्हें मेरा जवाब होगा कि ऐसी संभावना बहुत ज्यादा है कि ऐसा व्यक्ति जिंदा है. औब्रे डी ग्रे कैलिफॉर्निया स्थित स्ट्रैटजी फॉर इंजीनियर्ड नेग्लिजिबल सिनेसेंस (एसईएनएस) रिसर्च फाउंडेशन के को-फाउंडर हैं. उन्होंने कहा कि इस बात की 80 फीसदी से ज्यादा संभावना है कि ऐसे लोग पहले ही पृथ्वी पर जन्म ले चुके हों और मौजूद हों.

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औब्रे डी ग्रे ने ‘अमरत्व’ को  एक जिंदा शब्द कहा. उन्होंने कहा कि इस शब्द का इस्तेमाल करना गलत नहीं है. डी ग्रे के मुताबिक, अमरत्व का मतलब होता है हर प्रकार की बीमारी से पूरी तरह सुरक्षित. अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति को प्राप्त कर लेता है तो बढ़ती उम्र का उसके स्वास्थय पर असर नहीं पड़ता है और वह मौत की वजहों को दरकिनार करता रहता है
reference :-http://infotainment.jagranjunction.com/2015/04/28/cambridge-scientist-claim-imortal-man-allready-born-on-earth/

भविष्यवाणी: क्या ‘खूनी चांद’ से 28 सितंबर को खत्म हो जाएगा पूरा विश्व?

पिछले साल अप्रैल से अब तक चंद्रमा का रंग चार बार लाल हो चुका है, जो 28 सितंबर को पूरी तरह से लाल हो जाएगा. इसके बाद धरती पर भयानक भूकंप आएंगे और आसमान से उल्का पिंडों की बाररिश होगी. जो ईसा मसीह के धरती पर आने की सूचना देंगे. ये वो समय होगा, जब धरती पर भयानक भूकंप के झटके होंगे, जो अरब देशों में युद्ध की स्थिति पैदा कर तीसरे विश्वयुद्ध की ओर धकेल देगी. यह दावा अमरीकी ईसाई संतों ने की है.

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मार्क ब्लिज्ट और जॉन हेगी नाम के इन दो ईसाई संतों की इस भविष्यवाणी ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है. दोनों इसाई कैथलिक संतों का दावा है कि चांद के लाल होने की घटना 2000 साल में एक बार होती है. हालांकि दोनों की इस भविष्यवाणी ने अमरीकी लोगों में बेचैनी पैदा कर दी है. मामले की गंभीरता को देखते हुए अमरीकी पुलिस ने मार्क ब्लिज्ट और जॉन हेगी को हिरासत में लिया है.


इसाई पादरी जॉन हेगी ने तो आपदा की भविष्यवाणी पर ‘फोर ब्लड मून’ नाम से एक किताब भी लिखी है जो 2013 में प्रकाशित हुई थी. इस किताब ने बिक्री के कई रिकॉर्ड भी तोड़े. दोनों संतो का दावा है कि “1948 में जब ‘ब्लड मून’ की स्थिति बनी थी, तो इजरायल का जन्म हुआ था और इस बार ‘ब्लड मून’ धरती पर पैगंबर की वापसी का संकेत मिल रहे हैं”.


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वैसे विश्व खत्म होने की अटकले विभिन्न साइट और ब्लॉग में 22 से 28 सितंबर के बीच बताई गई है.

इस तरह की खबर आने के बाद में सोशल मीडिया पर कई तरह की अटकले लगाई जा रही हैं. हालांकि नासा ने पृथ्वी पर किसी भी तरह की अनहोनी हो उससे इंकार किया है. उनके अनुसार अगले कई सौ सालों तक ऐसी कोई आपदा आने की संभावना नहीं है
reference :-http://infotainment.jagranjunction.com/2015/09/09/will-the-world-end-on-september-28/

इंसान के जन्म से बहुत पहले बन गया था चांद हमारा मामा... जानिए चंद्रमा के जन्म की कहानी

अपने बच्चों को मां अक्सर चांद कहकर बुलाती है पर अपनी लोरियों में कहती है कि चांद उसके मामा हैं. वही बच्चा जब किशोरावस्था में पहुंचता है तो चांद में उसे अपना महबूब नजर आने लगता है. पर चांद के उपर अगर किसी का सचमुच कॉपीराईट है तो वे हैं कवि और फिल्मी गीतकार. इन्होंने चांद और इंसान के रिश्तों की इतनी तरह से व्याख्या की है कि अगर कभी चांद इन कविताओं को पढ़ ले तो वो भी इंसानों के साथ अपने रिलेशनशिप स्टेटस को लेकर कनफ्यूज हो जाए. अगर कविता-कहानी की बात छोड़ भी दें तो क्या सचमुच चांद के साथ हमारा संबंध इतना आत्मीय है कि उसके ना रहने से हमारे जीवन में कुछ फर्क पड़ेगा?


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अगर आप यह सोच रहें हैं कि हम ऐसा बेतुका सवाल क्यों पूछ रहें हैं, भला चांद कहां जाएगा? तो आपको बता दे कि चांद पर इतना भरोसा न करें क्योंकि यह हमेशा-हमेशा के लिए धरती के पास यूं ही नहीं रहने वाला. आपकी जानकारी के लिए यह बता दें कि हर साल चांद धरती से 3.8 सेमी दूर जा रहा है. भले ही यह दूरी बेहद कम है लेकिन संभव है कि एक दिन चांद इस धरती और हम धरतीवासियों को छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए अनंत अंतरिक्ष में खो जाए. यह बात अलग है कि ऐसी स्थिति करोड़ो साल बाद आएगी पर अगर हम अपनी सोच को करोड़ो साल आगे ले जा सकें तो एक दफा सोच कर देखिए कि क्या होगा अगर हमारी धरती मम्मी के भाई यानी चंदू मामा हमें छोड़कर चले जाएं.


चलिए सबसे पहले हम आपको धरती मां और चंदा मामा के बीच वैज्ञानिक रिश्ते के बारे में बताते हैं. आप अगर चांद की जन्म कि कहानी देखेंगे तो आपको कतई यह हैरानी नहीं होगी कि चांद धरती का भाई कैसे है. वैज्ञानिक दृष्टि से भी चांद धरती का छोटा भाई है. कुछ 5 करोड़ साल छोटा! उम्र का यह अंतर भले ही आपका बहुत अधिक लगे पर अगर इसे धरती और चांद कि उम्र के संदर्भ में देखें तो यह अंतर कुछ नहीं है. तब न सूर्य का परिवार यानी सोलर फैमिली वैसी थी जैसी आज है और न हीं धरती. सूर्य का परिवार तब अपने शैशव आवस्था में था और तब धरती की एक जुड़वा बहन भी हुआ करती थी.

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वैज्ञीनिकों ने धरती के इस जुड़वा बहन का नाम थिया रखा है. थिया भी उसी कक्षा में घूमती थी जिसमें की धरती. उन दोनों में एक भीषण टक्कर हुई. इसके बाद थिया का एक बड़ा हिस्सा धरती में समा गया जिससे पृथ्वी का आयतन बढ़ गया और उसका गुरूत्वाकर्षण भी. इस टक्कर से उत्पन्न हुए ढेरों मलबे पृथ्वी के चारो और चक्कर काटने लगे. समय के साथ इस मलबे के टुकड़े आपस में जुड़ने लगे और एक नए अंतरिक्ष पिंड का जन्म हुआ. यह पिंड है धरती का एकमात्र उपग्रह, हमारा चांद.


पर चांद का रिश्ता सिर्फ धरती तक ही सीमित नहीं है. इसका हम सबकी जिंदगियों से भी गहरा संबंध है. अगर चांद न होता या चांद न रहे तो शायद धरती पर इतना विविध जीवन संभाव ना हो पाए. चांद का धरती के मौसम को स्थिर करने में एक अहम योगदान है. अगर चांद न हो तो धरती का तापमान कभी 100 डिग्री के पार चला जाता तो कभी शून्य से नीचे. कम से कम ऐसी परिस्थितियों में मानव जीवन का पनपना तो असंभव होगा.

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अगर चांद न हो तो धरती की अपनी कक्षा पर घूमने की गति और बढ़ जाएगी यानी दिन रात तब ऐसे नहीं होंगे जैसे हुआ करते हैं. तब एक दिन लगभग 6-8 घंटे का ही होगा और साल में होंगे तकरीबन 1000-1400 दिन. रातें और काली होंगी, समुद्र में लहरे इतनी उंची नहीं उठेंगी और धरती पर कभी चंद्र या सूर्य ग्रहण नहीं लगेगा. तो समझ गए न किस कदर गहरा रिश्ता है हम सब कि जिंदगी और चांद का और क्यों चांद को हम मामा, बेटा या महबूब कहकर आत्मीयता जताते हैं
reference :-http://socialissues.jagranjunction.com/2014/12/10/birth-history-of-moon/

नासा के उलट इस वैज्ञानिक का दावा है कि धरती सुरक्षित है लेकिन सिर्फ अगले हफ्ते तक

धरती पर हर रोज अतंरिक्ष से तकरीबन 100 टन मलबा गिरता है. हालांकि यह मलबा छोटे-छोटे पत्थर के टुकड़ों के रुप में होता है. इनमें से ज्यादातर धरती के वातावरण में घर्षण के कारण जल जाते हैं इसलिए हमपर इसका ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन प्रोफेसर रॉबर्ट वॉल्श का कहना है कि अगले हफ्ते धरती से एक ऐसा उल्का पिंड टकरा सकता है जो धरती पर जीवन को समाप्त कर दे. हालांकि नासा ने ऐसी किसी संभावना की न्यूनतम आशंका जताई है लेकिन प्रोफेशर वॉल्श के तर्कों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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मिरर में छपी खबर के अनुसार वॉल्श का कहना है कि जो हस्र डायनासोर का हुआ वह इंसानो का भी हो सकता है. ऐसा भी नहीं है कि यह संभावना दूर भविष्य की है. कुछ शंकालु एक्सपर्टों की आशंका अगर सच साबित होती है तो 22 से 28 सितंबर के बीच कभी भी धरती का आखिरी दिन हो सकता है. उनके अनुसार हमारे ग्रह पर कई तरह की विपत्तियां टूटने वाली हैं. इनमें उल्का पिंड का धरती से टकराना, भूकंप, सुनामी आदी शामिल हैं.

हालांकि नासा का कहना है कि वे लगातार आसमान की निगरानी कर रहें हैं और उन्हें निकट भविष्य में  धरती पर किसी उल्का पिंड गिरने का कोई संकेत नहीं मिला है.

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नासा के एक प्रवक्ता ने कहा कि, “नासा ऐसे किसी भी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु के बारे में जानकारी नहीं है जो धरती से टकराने वाला है, ऐसे किसी प्रमुख टकराहट की संभावना बेहद कम है.” वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल लंकाशायर में अनुसंधान के कार्यकारी निदेशक पद पर कार्यरत प्रोफेसर रॉबर्ट वॉल्श इस विषय पर अपने व्यापक एतिहासिक ज्ञान के आधार पर कुछ और ही संभावना जताते हैं.

दो साल पहले ही फरवरी 2013 में एक लॉरी के आकार का उल्का पिंड साइबेरिया के चेल्याबिंस्क शहर के उपर आकाश में विस्फोट के साथ फट पड़ा. इस दृश्य को कई लोगों ने अपने फोन कैमरे में भी कैद किया. इस विस्फोट से निकली उर्जा के कारण कई खिड़कियों के शीशे टूट गए और सैकड़ों लोग घायल हो गए.

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हालांकि यही विस्फोट अगर ज्यादा आबादी वाले इलाके जैसे लंदन, न्यूयॉर्क या बिजींग के आसमान में हुआ होता तो ज्यादा विनाशकारी सिद्ध हो सकता था
reference :-http://news.jagranjunction.com/2015/09/18/expert-says-life-on-earth-will-end-very-soon/?src=jfb

Tuesday, 8 September 2015

सौरमंडल में एक और छोटा ग्रह मिला

                          सौरमंडल में एक और छोटा ग्रह मिला
खगोलविदों ने सौर मंडल से बाहर एक छोटे ग्रह की तस्वीर ली है जिससे बृहस्पति जैसे ग्रह के बनने और उसके जैसे ग्रहों पर उसके प्रभाव का पता चल सकता है.
वैज्ञानिकों ने ‘51 ईरीदानी बी’ नाम के ग्रह का पता लगाने के लिए चिली में एक टेलीस्कोप पर लगे जेमिनी प्लैनेट इमेजर का इस्तेमाल किया. यह ग्रह सूर्य जैसे नए तारों से घिरा है जो कि धरती से करीब 95 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है.

यह ग्रह बृहस्पति से करीब दुगुने आकार का है और अपने जनक तारे से काफी दूर स्थित है. ‘51 ईरीदानी बी’ सौरमंडल से बाहर के सबसे छोटे ग्रहों में से एक है.

दो सौ करोड़ वर्ष पहले बने इस ग्रह से अब भी ऊष्मा निकलती है और इंफ्रारेड प्रकाश में यह चमकता है. टेलीस्कोप ने इसी इंफ्रारेड प्रकाश को कैद किया है.

‘स्टैनफोर्ड विविद्यालय’ के खगोलविद ब्रूस मैकिनटोश और उनके सहयोगियों में इस सप्ताह जारी विज्ञान पत्रिका में लिखा ‘41 ईरी बी’ ने एक ग्रह के विस्तारपूर्वक अध्ययन का मौका दिया है जो अब भी अपनी शुरुआती परिस्थितियों से प्रभावित है.’

विशेषज्ञों ने खुलासा किया कि बृहस्पति जैसे ग्रह का वातावरण मिथेन गैस से प्रभावित है. इस खोज से वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे गैस वाले ग्रह बनते हैं.
reference :-http://www.samaylive.com/science-news-in-hindi/323794/51-eridani-b-jupiter-like-exoplanet-discovered.html

मात्र 90 मिनट में यूरोप से ऑस्ट्रेलिया!

                        मात्र 90 मिनट में यूरोप से ऑस्ट्रेलिया!
‘यूरोप से ऑस्ट्रेलिया का सफर केवल 90 मिनट में’ है न ऐसी बात जिस पर अभी भरोसा करना शायद आपके लिए संभव नहीं हो रहा हो...
...लेकिन आवाज की गति से भी 20 गुना तेजी से चलने वाले हाइपरसोनिक स्पेसलाइनर की मदद से 2030 तक यह हकीकत साबित हो सकती है.

डेली मेल की एक रिपोर्ट के अनुसार जर्मनी एयरोस्पेस सेंटर (डीएलआर) ने सबसे पहले 2007 में इस परियोजना का प्रस्ताव पेश किया था लेकिन बाद में इस पर काम बंद कर दिया गया और अब कंपनी का कहना है कि हाइपरसोनिक स्पेसलाइनर की परिकल्पना पर यदि 33 अरब डॉलर और खर्च कर दिए जाएं तो सुपरसोनिक यात्री विमान बनाना संभव हो सकता है जो लगभग 100 यात्रियों को लेकर 90 मिनट में यूरोप से ऑस्ट्रेलिया पहुंच सकता है.

‘द जर्मन स्पेसलाइनर’ परियोजना के मूर्त रूप लेने से यूरोप से अमेरिका का सफर केवल 60 मिनट यानी एक घंटे में कर पाना संभव हो जाएगा।द्विचरणीय इस स्पेसलाइनर को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकेगा.

इसके एक भाग में यात्री बैठेंगे और दूसरा भाग विमान के बूस्टर का होगा जिसके रॉकेट प्रोपल्शन सिस्टम में पर्यावरण मित्र ईधन के तौर पर द्रव हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का इस्तेमाल किया जाएगा. विमान का इंजन 10 मिनट से भी कम समय में इसे ध्वनि की गति के 20 गुने से भी अधिक तेजी दे देगा.

इसके बाद 80 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्पेसक्राफ्ट से अलग होने वाला हिस्सा 20 मैक से भी अधिक की रफ्तार से गंतव्य की ओर बढ़ेगा.

स्पेसलाइनर परियोजना के प्रमुख मार्टिन सिप्पेल ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित ‘अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोडायनमिक्स एंड एयरोनोटिक्स स्पेस प्लेंस एंड हाइपरसोनिक’ कांफ्रेंस में बताया कि इस परियोजना पर काम आगे बढ़ाया जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘हम इस संबंध में एक विकासीय खाके के साथ आगे आना चाहते हैं.

इस परियोजना के साकार होने से केवल एक घंटे में 100 यात्रियों को लेकर अंतरमहाद्वीपीय और अंतरप्रशांत महासागरीय अभियानों को पूरा करना संभव हो पाएगा.

इस परियोजना पर लाखों डॉलर का खर्च आने और इसका टिकट भी काफी महंगा होने की उम्मीद है.

सिपल ने कहा, ‘हर साल लाखों लोग एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप की यात्रा करते हैं और हमारा मानना है कि इसमें अंतरिक्ष का इस्तेमाल काफी कम किया जाता है.’ सिपल ने उम्मीद जताई कि स्पेसलाइनर एक दिन में ऐसी 15 उड़ानों को अंजाम देगा.

स्नेक रोबोट बचाएगा लोगों की जान

                          स्नेक रोबोट बचाएगा लोगों की जान
भारतीय वैज्ञानिक सांप के जैसे दिखने वाले एक रोबोट का विकास कर रहे हैं, जो आपदा और दुर्घटना में न सिर्फ लोगों की जान बचा सकता है, बल्कि निगरानी में भी सहायक साबित हो सकता है.
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-हैदराबाद के ‘मैकेनिकल व एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ के वैज्ञानिकों ने तलाशी व बचाव अभियान (एसएआरपी-सांप के जैसा अर्टकिुलेटेड रोबोट प्लेटफॉर्म) के लिए स्नेक रोबोट के दो नमूनों को डिजाइन किया है.

विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर आर प्रशांत कुमार ने कहा, ‘भूकंप के दौरान मकान गिरने, किसी इमारत में आग लगने या नाभिकीय संयंत्र में दुर्घटना जैसी आपदाओं के दौरान स्नेक रोबोट का इस्तेमाल मुश्किल जगहों में पहुंचने तथा मलबे में जिंदा बचे लोगों की तलाश के लिए किया जा सकता है.’

कुमार ने कहा, ‘यह हालात के बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है, जिसके आधार पर बचाव दल अपने मिशन की योजना बना सकता है. अग्निरोधक एबीएस प्लास्टिक से बना यह रोबोट सांप की तरह रेंगता है और ऊबड़-खाबड़ इलाके में भी काम करने में मदद कर सकता है.

जब स्नेक रोबोट को किसी तलाशी अभियान में लगाया जाएगा तो यह एक-दूसरे से संपर्क स्थापित कर सकता है. इसके अलावा, ये रोबोट मलबे में जीवित बचे लोगों को छू सकता है और उनकी पहचान कर सकता है.

यह परियोजना संचार व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के ‘इनोवेशन हब फॉर साइबर फिजिकल सिस्टम्स’ का हिस्सा है. इस रोबोट का निर्माण जब स्थानीय स्तर पर किया जाएगा, तो इसकी कीमत लगभग 20 हजार रु पए के आसपास होगी.