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Wednesday, 22 July 2015

मृत आकाशगंगाओं में हो सकते हैं डार्क मैटर

मृत आकाशगंगाओं में हो सकते हैं डार्क मैटर
मेलबर्न: पृथ्वी से लगभग 30 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर आकाशगंगाओं के एक समूह में दृश्य पदार्थ की तुलना में 100 गुना अधिक डार्क मैटर हैं।
एक नये अध्ययन के अनुसार अनुसंधानकर्ताओं ने कोमा कलस्टर की आकाशगंगाओं के अध्ययन के लिए शक्तिशाली कम्प्यूटर सिमुलेशन का प्रयोग किया। कोमा कलस्टर ब्रह्मांड की सबसे बड़ी संरचना में से है जिसमें 1000 से अधिक आकाशगंगाएं गुरुत्वाकषर्ण से एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा, इस कलस्टर की आकाशगंगाएं कम से कम सात अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आयी होगी। अगर आकाशगंगाओं के विकास के बारे में हमारा मौजूदा सिद्धांत सही है तो इसका मतलब है कि उनमें बहुत अधिक डार्क मैटर है जो दृश्य पदार्थ का बचाव करती है। डार्क मैटर को सीधे तौर पर नहीं देखा जा सकता है लेकिन माना जाता है कि ब्रह्मांड के करीब 84 प्रतिशत पदार्थ में यह रहस्यमयी तत्व है।

डार्क मैटर :-

श्याम पदार्थ , पदार्थ का वह रूप है जिससे संभवतःअब तक हम अपरिचित हैं । चूँकि यह किसी भी प्रकार के विद्युत-चुंबकीय विकिरणों को न तो विकरित करता है तथा न ही अवशोषित करता है , फलस्वरुप इसे किसी भी टेलीस्कोप के द्वारा प्रत्यक्षतः नहीं देखा जा सकता है । दूसरे शब्दों में , हमारी पारंपरिक बोध क्षमता इस पदार्थ के सामने बिलकुल अंधेरे में है जिसके चलते इसका नामकरण श्याम पदार्थ किया गया है । सन्‌ 1932 ई में हॉलैंड के महान वैज्ञानिक जॉन ऊर्ट ने पाया कि हमारी आकाशगंगा के पड़ोस में स्थित सितारों की परिक्रमण गति परिकलनों में पूर्वानुमानित गति से कहीं ज्यादा है । इस असंगति की व्याख्या करने के लिए उन्होंने एक ऐसे पदार्थ की सर्वथा प्रथम अवधारणा की जो कि हमारी नजरों से ओझल थी । सन्‌ 1933 ई में विख्यात वैज्ञानिक फ्रिट्ज विकी ने कोमा आकाशगंगा-समूह में आकाशगंगाओं की गणनाओं से प्राप्त से कहीं ज्यादा तीव्र परिक्रमण गति की व्याख्या में पाया कि इस “गायब पदार्थ” पदार्थ की मात्रा दृश्य पदार्थ की मात्रा से कम–से-कम सौ गुनी ज्यादा होनी चाहिए । उन्होंने इस गायब पदार्थ के लिए “श्याम पदार्थ” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया । सन्‌ 1950 और 60 के दशक में वैज्ञानिकों ने सर्पिल आकाशगंगाओं के घूर्णन के अध्ययन दौरान एक पेचीदा खोज की । उन्होंने पाया कि हमारी आकाशगंगा के केंद्र में जहाँ पर दृश्य पदार्थ की मात्रा ज्यादा होती है, सितारों की घूर्णन गति आकाशगंगा के किनारों पर स्थित सितारों की घूर्णन गति के बराबर होती है । यह उनके इस आशा कि केंद्र में सितारों की घूर्णन गति आकाशगंगा के किनारों पर स्थित सितारों की घूर्णन गति से ज्यादा होगी के उलट था । 1970 के दशक में वैज्ञानिक सुश्री वीरा रुबीन ने एंड्रोमेडा सहित अनेक अन्य आकाशगंगाओं में सितारों की गति का विस्तृत अध्ययन कर ब्रह्मांड में इस परिघटना की व्यापकता की पुष्टि कर दी । इन सभी परिणामों का निहितार्थ यह इंगित करते थे कि या तो गुरुत्वाकर्षण तथा घूर्णन के बारे में हमारी समझ में कोई मूलभूत त्रुटि है ,जिसकी संभावना अत्यंत ही क्षीण थी क्योंकि न्यूटन के नियम सदियों से परीक्षणों में खरे उतरते रहे हैं , अथवाआकाशगंगाओं तथा आकाशगंगा समूहों में अवश्य ही कोई ना कोई ऐसा पदार्थ उपस्थित है जो गुरुत्वाकर्षण के इन देखे गए प्रभावों के लिए उत्तरदायी है । इन प्रेक्षणों ने खगोलविदों को श्याम पदार्थ के अस्तित्व तथा उनकी विशेषताओं की खोज हेतु ब्रह्मांड की दूर दराज के कोनों को खंगालने के लिए प्रेरित कर दिया । इसके लिए वैज्ञानिकों ने अपना ध्यान गुरुत्वाकर्षण बल से जुड़ी आकाशगंगाओं के विशाल समूहों (जिनमें पचास से लेकर हजारों आकाशगंगाएँ शामिल थीं) पर इस उम्मीद में केंद्रित किया कि शायद वहाँ पर उन्हें वे तप्त गैसें मिलेगीं जो उनके पूर्व के अवलोकनों में नहीं देखी जा सकी थीं और ये गैसें ही उस गायब अथवा श्याम पदार्थ की समस्या का हल होंगी । इस प्रक्रिया में जब उन्होंनेएक्स-किरण टेलीस्कोपों (जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता महान भारतीय वैज्ञानिक सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर के सम्मान में रखे गए नासा के चंद्रा टेलीस्कोप नामक एक्स-किरण टेलीस्कोप का अत्यंत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है ) का रुख उन समूहों की ओर किया तो उन्हें वास्तव में अति तप्त गैसों के बृहदाकार बादल मिले । लेकिन गैसों के ये विशाल बादल भी द्रव्यमान की प्रेक्षित असंगति को दूर करने में सक्षम सिद्ध नहीं हुए । इन आकाशगंगीय क्लस्टरों के उष्ण गैस दाब की गणना करने पर प्राप्त हुआ कि क्लस्टरों का द्रव्यमान सभी तारों तथा गैसों के कुल द्रव्यमान का न्यूनतम पाँच से छः गुना होना चाहिए अन्यथा इन तप्त गैसों को पलायन रोक सकने के लिए यथेष्ट गुरुत्व नहीं नहीं होगा । इन प्रेक्षणों तथा गणनाओं ने श्याम पदार्थ के अस्तित्व संबंधी अनेक सूत्र उपलब्ध करा दिए ।परवर्ती काल में वैज्ञानिकों ने गतिज तथा व्यापक सापेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित निर्मित आकाशगंगा ,आकाशगंगाओं के समूहोंतथा संपूर्ण ब्रह्मांड के द्रव्यमान तथा “प्रकाशित” पदार्थों (जिसमें तारे, गैस तथा अंतर-तारकीय एवं अंतर-आकाशगंगीय धूल शामिल हैं) के द्रव्यमान में व्यापक विसंगति पायी । इस विसंगतता की सर्वाधिक सफल व्याख्या ब्रह्मांड में भारी तथा असाधारण कणों से निर्मित श्याम पदार्थों ,जो केवल गुरुत्वार्कषण बल तथा संभवतः दुर्बल बल के द्वारा परस्पर अंतःक्रिया करते हैं , के अस्तित्व में होने के सिद्धांत के द्वारा की जा सकती है ।कम्प्यूटर जनित मॉडलों में वैज्ञानिकों ने पाया कि श्याम पदार्थ को सामान्य दृश्य पदार्थ के साथ संपूर्ण ब्रह्मांड में गुंथा होना चाहिए ।
गौरतलब है कि, यूरोप में शुरू हुई महामशीन या लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर के ढेरों मकसदों में से एक आन्ध्र पदार्थ की खोज करना भी है।
reference :-https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95_%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%9F%E0%A4%B0

श्याम उर्जा (Dark Energy)

श्याम उर्जा (Dark Energy) यह विषय एक विज्ञान फैटंसी फिल्म की कहानी के जैसा है। श्याम ऊर्जा (Dark Energy), एक रहस्यमय बल जिसे कोई समझ नहीं पाया है, लेकिन इस बल के प्रभाव से ब्रह्मांड के पिंड एक दूसरे से दूर और दूर होते जा रहे है।

यह वह काल्पनिक बल है जिसका दबाव ऋणात्मक है और सारे ब्रह्मांड में फैला हुआ है। सापेक्षता वाद के सिद्धांत के अनुसार, इस ऋणात्मक दबाव का प्रभाव गुरुत्वाकर्षण के विपरीत प्रभाव के समान है।

श्याम ऊर्जा 1998 में उस वक्त प्रकाश में आयी, जब अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के 2 समुहों ने विभिन्न आकाशगंगाओं में विस्फोट की प्रक्रिया से गुजर रहे सितारों (सुपरनोवा) (1) पर एक सर्वे किया। उन्होंने पाया की ये सुपरनोवा की प्रकाश दीप्ति अपेक्षित प्रकाश दीप्ति से कम है, इसका मतलब यह कि उन्हें जितने पास होना चाहिये थी, वे उससे ज्यादा दूर है। इसका एक ही मतलब हो सकता था कि ब्रह्मांड के विस्तार की गति कुछ काल पहले की तुलना में बढ़ गयी है! (लाल विचलन भी देखे)

इसके पहले तक यह माना जाता था कि ब्रह्मांड के विस्तार की गति धीरे-धीरे गुरुत्वाकर्षण बल के कारण कम होते जा रही है। लेकिन सुपरनोवा के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि कोई रहस्यमय बल गुरुत्वाकर्षण बल ले विपरीत कार्य कर ब्रह्मांड के विस्तार को गति दे रहा है। यह एक आश्चर्यजनक, विस्मयकारी खोज थी।

पहले तो वैज्ञानिकों को इस प्रयोग के परिणामों की विश्वसनीयता पर ही शक हुआ। उन्हें लगा की सुपरनोवा की प्रकाश दीप्ति किसी गैस या धूल के बादल के कारण कम हो सकती है या यह भी हो सकता है कि सुपरनोवा की प्रकाश दीप्ति के बारे में वैज्ञानिकों का अनुमान ही गलत हो। लेकिन उपलब्ध आँकड़ों को सावधानी पूर्वक जांचने के बाद पता चला कि कोई रहस्यमय बल का अस्तित्व जरूर है जिसे आज हम श्याम ऊर्जा (Dark Energy) कहते है।

वैसे यह विचार एकदम नया नहीं है। आईंस्टाईन ने अपने सापेक्षता वाद के सिद्धांत (Theory of Relativity) मे एक प्रति गुरुत्वाकर्षण प्रभाव को दर्शाने वाला बल ब्रह्मांडीय स्थिरांक (Cosmological Constant) का समावेश किया है। लेकिन आईन्स्टाईन खुद और बाद में अन्य विज्ञानी भी मानते थे कि यह ब्रह्मांडीय स्थिरांक(Cosmological Constant) एक गणितिय सरलता के लिये ही है जिसका वास्तविकता से काफी कम रिश्ता है। 1990 तक किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह ब्रह्मांडीय स्थिरांक एक सच्चाई भी हो सकता है।

दक्षिण केलीफोर्निया विश्व विद्यालय की वर्जीनिया ट्रीम्बल कहती है
“श्याम ऊर्जा को प्रति गुरुत्वाकर्षण कहना सही नहीं है। यह बल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत कार्य नहीं करता है। यह ठीक वैसे ही व्यवहार करता है जैसे सापेक्षता वाद के सिद्धांत के उसे अनुसार उसे करना चाहिये। सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार इस बल का दबाव ऋणात्मक है।”

उनके अनुसार
“ मान लिजिये ब्रह्मांड एक बड़ा सा गुब्बारा है। जब यह गुब्बारा फैलता है, तब विस्तार से इस श्याम ऊर्जा का घनत्व कम होता है और गुब्बारा थोड़ा और फैलता है। ऐसा इस लिये कि श्याम ऊर्जा से ऋणात्मक दबाव (2) उत्पन्न होता है। जबकि गुब्बारे के अंदर यह गुब्बारे को खींचने की कोशिश कर रहा है, घनत्व जितना कम होगा यह गुब्बारे को अंदर की ओर कम खिंच पायेगा जिससे विस्तार और ज्यादा होगा। यही प्रक्रिया ब्रह्मांड के विस्तार में हो रही है।”

सुपरनोवा का उदाहरण यह बताता है कि ब्रह्मांड के विस्तार का त्वरण(acceleration) 5 खरब वर्ष पहले शुरू हुआ था। उस समय आकाशगंगाये इतनी दूरी पर जा चुकी थी कि गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से श्याम ऊर्जा का प्रभाव ज्यादा हो चुका था।(ध्यान रहे गुरुत्वाकर्षण बल विभिन्न पिण्डो अपनी तरफ खिंचता है, श्याम ऊर्जा वही उन्हे एक दूसरे से दूर ले जाती है।) उस समय के पश्चात श्याम ऊर्जा के प्रभाव से ब्रह्मांड के विस्तार की गति बढ़ते जा रही है। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह गति अनिश्चित काल के लिये बढ़ते जायेगी। इसका मतलब यह है कि आज की तुलना में खरबों वर्षों बाद हर आकाशीय पिंड एक दूसरे तेज और तेज दूर होते जायेगा और हम अकेले रह जायेंगे।

श्याम ऊर्जा के इस नये सिद्धांत ने वैज्ञानिकों को थोड़ा निराश किया है, उन्हें एक अप्रत्याशित और एकदम नये ब्रह्मांड की अवधारणा को स्वीकारना पड़ा है। वे पहले ही एक श्याम पदार्थ (Dark Matter) की अवधारणा को मान चुके है। आज की गणना के अनुसार यह श्याम पदार्थ, वास्तविक पदार्थ से कहीं ज्यादा है। यह एक ऐसा पदार्थ है जिसे आज तक किसी प्रयोगशाला में महसूस नहीं किया गया है लेकिन इसके होने के सबूत पाये गये है। अब श्याम ऊर्जा का आगमन जख्म पर नमक छिड़कने के समान है।

अंतरिक्ष विज्ञानीयो के अनुसार ब्रह्मांड तीन चीजों से बना है साधारण पदार्थ, श्याम पदार्थ और श्याम ऊर्जा। हम सिर्फ साधारण पदार्थ के बारे में जानते है। ब्रह्मांड का 90-95% भाग ऐसे दो पदार्थों से बना है जिसके बारे में कोई नहीं जानता , यह सुन कर आप कैसा महसूस करते है ?

क्वांटम भौतिकी को समझने के लिये दो पीढ़ीया लग गयी। यह समय उस विज्ञान के बारे में था जिसे हम प्रयोगशाला में प्रयोग कर के सिद्ध कर सकते थे। एक ऐसे पदार्थ और ऊर्जा को समझना जिसे देखा नहीं जा सकता, प्रयोगशाला में बनाया नहीं जा सकता कितना कठिन है ?

लेकिन श्याम ऊर्जा ने एक ऐसे रहस्य को सुलझा दिया है जो ब्रह्मांडीय विकिरण ने उत्पन्न किया था। ब्रह्मांडीय विकिरण की तीव्रता के विचलन पर हाल ही के प्रयोगों से प्राप्त आंकडे ब्रह्मांड के अनंत विस्तार के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों के लिये इस विस्तार के पीछे कारणीभूत बल एक पहेली था, श्याम ऊर्जा शायद इसी का हल है।

श्याम ऊर्जा का अस्तित्व चाहे किसी भी रूप मे गणना की गयी ब्रह्मांड की ज्यामिती और ब्रह्मांड के कुल पदार्थ की मात्रा के संतुलन के लिये जरूरी है। ब्रह्मांडीय विकिरण (cosmic microwave background (CMB)), की गणना यह संकेत देती है की ब्रह्मांड लगभग सपाट(Flat) है। ब्रह्मांड के इस आकार के लिये , द्रव्यमान और ऊर्जा का अनुपात एक निश्चित क्रान्तिक घनत्व(Critical Density) के बराबर होना चाहिये। ब्रह्मांड के कुल पदार्थ की मात्रा (बायरान और श्याम पदार्थ को मिला कर), ब्रह्मांडीय विकिरण की गणना के अनुसार क्रान्तिक घनत्व का सिर्फ 30% ही है। इसका मतलब यह है कि श्याम ऊर्जा ब्रह्मांड के कुल द्रव्यमान का 70% होना चाहीये।

हाल के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्मांड का निर्माण 74% प्रतिशत श्याम ऊर्जा से, 22% श्याम पदार्थ से और सिर्फ 4% साधारण पदार्थ से हुआ है। और हम इसी 4% साधारण पदार्थ के बारे में जानते है।

श्याम ऊर्जा की प्रकृति एक सोच का विषय है। यह समांगी, कम घनत्व का बल है जो गुरुत्वाकर्षण के अलावा किसी और मूलभूत बलों (3) से कोई प्रतिक्रिया नहीं करता है। इसका घनत्व काफी कम है लगभग 10-29 g/cm3। इसकी प्रयोगशाला में जांच लगभग असंभव ही है।

श्याम ऊर्जा को समझने के लिये सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत है ब्रह्मांडीय स्थिरांक सिद्धांत:
यह आईन्स्टाईन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत है। यह एक दम सरल है, इसके अनुसार अंतराल मे (Volume of Space) मे एक अंतस्थ मूलभूत ऊर्जा होती है। यह एक ब्रह्मांडीय स्थिरांक है जिसे लैम्डा कहते है। द्रव्यमान और ऊर्जा का ये आईन्सटाईन के समीकरण e = mc2 के द्वारा संबंधित है, इससे यह साबित होता है कि ब्रह्मांडीय स्थिरांक पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव होना चाहिये। इसे कभी कभी निर्वात ऊर्जा (Vacuum Energy) भी कहते है क्योंकि यह निर्वात की ऊर्जा का घनत्व है। वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार ब्रह्मांडीय स्थिरांक का मूल्य 10-29 g/cm3 है।

ब्रह्मांडीय स्थिरांक एक ऋणात्मक दबाव वाला बल है जो अपने ऊर्जा घनत्व के बराबर होता है, इसी वजह से यह ब्रह्मांड के विस्तार को त्वरण देता है।

श्याम ऊर्जा का ब्रह्मांड के भविष्य पर प्रभाव


जैसा कि हम पहले देख चुके है सुपरनोवा का उदाहरण यह बताता है कि ब्रह्मांड के विस्तार का त्वरण (acceleration) 5 खरब वर्ष पहले शुरु हुआ था। इसके पहले यह सोचा जाता था कि ब्रह्मांड के विस्तार की गति बायरानीक और श्याम पदार्थ के गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप कम हो रही है। विस्तारित होते ब्रह्मांड में श्याम पदार्थ का घनत्व का श्याम ऊर्जा की तुलना में ज्यादा तीव्रता से ह्रास होता है। जिससे श्याम ऊर्जा का पलड़ा भारी रहता है। जब ब्रह्मांड का आकार दुगुना हो जाता है श्याम पदार्थ का घनत्व आधा हो जाता है जबकि श्याम ऊर्जा का घनत्व ज्यों का त्यों रहता है। सापेक्षता वाद के सिद्धांत के अनुसार तो यह ब्रह्मांडीय स्थिरांक (Cosmological Constant) है।

यदि विस्तार की गति इस तरह से बढ़ती रही तो आकाशगंगाये ब्रह्मांडीय क्षितिज के पार चली जायेंगी और दिखायी देना बंद हो जायेंगी। ऐसा इस लिये होगा कि उनकी गति प्रकाश की गति से ज्यादा हो जायेगी। यह सापेक्षता वाद के नियम का उल्लंघन नहीं है। पृथ्वी, अपनी आकाशगंगा मंदाकिनी को कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन बाकी का सारा ब्रह्मांड दूर चला जायेगा।

ब्रह्मांड के अंत के बारे कुछ कल्पनायें है जिसमे से एक है कि श्याम ऊर्जा का प्रभाव बढ़ते जायेगा, और एक समय यह केन्द्रीय बलों और अन्य मूलभूत बलों से भी ज्यादा हो जायेगा। इस स्थिती में श्याम ऊर्जा सौर मंडल, आकाशगंगा, कोई भी पिंड से लेकर अणु परमाणु सभी को विखंडित कर देगी। यह स्थिती महा विच्छेद (Big Rip)की होगी।

दूसरी कल्पना महा संकुचन (Big Crunch) की है, इसमें श्याम ऊर्जा का प्रभाव एक सीमा के बाद खत्म हो जायेगा और गुरुत्वाकर्षण उस पर हावी हो जायेगा। यह एक संकुचन की प्रक्रिया को जन्म देगा। अंत मे एक महा संकुचन से सारा ब्रह्मांड एक बिंदु में तबदील हो जायेगा| यह बिंदु एक महा विस्फोट से एक नये ब्रह्मांड को जन्म देगा।

(1) सुपरनोवा - कुछ तारों के जीवन काल के अंत में जब उनके पास का सारा इंधन (हायड्रोजन) जला चुका होता है, उनमें एक विस्फोट होता है। यह विस्फोट उन्हें एक बेहद चमकदार तारे में बदल देता है जिसे सुपरनोवा या नोवा कहते है।

(2) ऋणात्मक दबाव - वह दबाव आसपास के द्रव (जैसे वायु) के दबाव से कम होता है।

(3) मूलभूत बल : गुरुत्वाकर्षण, विद्युत चुंबकीय बल, कमजोर केन्द्रीय बल, मजबूत केन्द्रीय बल
reference :-http://hindi.indiawaterportal.org/node/35461

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