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Wednesday, 28 September 2016

Acchi bate -16

कुछ कहते है की आतंकबाद का कोई महजब नही होता है । तो फिर इतने आतंकबाद आते कहा से है , जो कितने निर्दोष का जान ले लेता है । आतंकबाद वह है जो परिशिक्षण के लिए जगह देता है , बन्दुक देता है था अपने देश में पनाह देता है ।अगर अच्छे आदमी भी चोर के साथ रहता है तो वह भी चोर ही कहलाता है । जो सांप को पलता है उसे भी सांप काटने का दर रहता है , ऐसा की सांप काटे उस सांप को मार दे या उसे अपने घर से बहार कर दे । कुत्ते भी  काटते है पर घर वाले  को नही नही बाहर वाले को क्योकि उसे अपने और पराये का ज्ञान होता है ।
इसलिये सांप पलने वाले सतर्क हो जाये क्योंकी जब उसके पूछ पर पैर पड़ेगें वो काटने से चूकेंगे नही ।
यही सत्य है ।
शंकर भगवान ने भस्मासुर बनये थे , थे असुर पर जब वो आतंक करना सुरु किये देबता सब भी उसे छुपने और भागने लगे । यहाँ तक की भगवान शंकर भी । अंत में कितने मुश्किल के साथ उसको समाप्त किया गया भगवान बिष्णु के द्वारा ।
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सस्त्र से 2 , 3 , 4, 10 , 20 को अपने सामने झुका सकते है । पर  वो तब तक ही झुकेंगे जब तक आप के शस्त्र है । और जब बुद्धि का प्रयोग कर आप  झुकाते है  हाँ थोड़ा समय लग सकता है ,तो वह फिर कभी आपके सामने सर नही उठायेगे ।और आपके फेन हो जायेंगे और शस्त्र से झुकाया हुआ सर आपके दुश्मन हो जायेंगे ।
"अपने लक्ष्य तक पहुचने  का दो रास्ते होते है , एक आसान और एक  कठिन | आसान रास्ता  आपको अपने लक्ष्य के काफी समीप लगेगा , पर वास्तब में वो  आपको अपने लक्ष्य तक पहुचने देगा नही ।और कठिन रस्ते और थोड़ा दूर लगेंगे पर वह आपको अपने लक्ष्य तक पंहुचा देगा ।"
आप पता होगा
company की प्रोडक्ट खरीदते है तो आपको एक बार रुलाता है  मतलब जयदा रुपया लगता हैं
पर जब कोई ओडनारी प्रॉडक्ट ख़रीदते है तो आप को बार बार रुलाता है मतलब 2 महीने चलाइये ये ख़राब वो ख़राब आखिर में useless हो जाता हैं ।
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कोई  अच्छे स्कूल में पढ़ने से कोई महान नही बना जाता । अगर कोई ख़राब स्कूल में पढ़कर अगर कोई महान काम करता है तो वो वह स्कूल नाम भी बढ़ जाता है।
कोई उच्चय जाती या निम्न जाती में हो अगर वह बुरे काम करते तो वह हमेसा के लिए उसके इज्जत ख़राब हो जाते ।  अगर निम्न जाती के हो अगर अच्छे काम क़र जाते है हमेसा के लिए नाम हो जाता है ।
अगर वह किसी धर्म के ब्यक्ति हो और धर्म के नाम पर किसी को कष्ट और बुरे काम करते है , बल्कि धर्म या महजब बल्कि आदमी बुरे है , कोई भी धर्म की निब रखने वाले कोई वह तो महान् ही आदमी होएंगे ने जिसने इतने बड़े आदमी को आपने महजब में जोरा । जैसे बौद्ध , जैन , सिख , ईसाई और न जाने कितने  सबके आदर करने चाहिए ।
 कोई अच्छे राजनितिक पार्टी नही होते , बल्कि उस पार्टी को बनाने वाले और उस पार्टी की कयर्कता पर निर्भर करता है । एक समय में कोई पार्टी अच्छे होते है , कभी वही पार्टी बेकार हो जाते है , समय के साथ सारा कुछ परवर्तन शील है , कोई राजनितिक तब तक अच्छे रहेंगे जब तक वह अच्छे आदमी कार्यकर्ता रहेंगे ।
जाती धर्म महजब से उपर उठकर सोचिये की देश की विकाश में योगदान दीजिये । अपना मूल्य चुनिए और देश को आगे बढाइये ।

Monday, 26 September 2016

अच्छी बातें-15

शंब्दों को हमेशा तौल कर बोलें.
एक किसान की एक दिन अपने पड़ोसी से खूब जमकर लड़ाई हुई। बाद में जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, तो उसे ख़ुद पर शर्म आई।
वह इतना शर्मसार हुआ कि एक साधु के पास पहुँचा और पूछा, ‘‘मैं अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहता हूँ।’’
साधु ने कहा कि पंखों से भरा एक थैला लाओ और उसे शहर के बीचों-बीच उड़ा दो। किसान ने ठीक वैसा ही किया, जैसा कि साधु ने उससे कहा था और फिर साधु के पास लौट आया।
लौटने पर साधु ने उससे कहा, ‘‘अब जाओ और जितने भी पंख उड़े हैं उन्हें बटोर कर थैले में भर लाओ।’’ 
नादान किसान जब वैसा करने पहुँचा तो उसे मालूम हुआ कि यह काम मुश्किल नहीं बल्कि असंभव है। खैर, खाली थैला ले, वह वापस साधु के पास आ गया। यह देख साधु ने उससे कहा, ‘‘ऐसा ही मुँह से निकले शब्दों के साथ भी होता है।’’
इसलिए हमेशा अपने शब्दों को तौल कर बोलें । महान दार्शनिक कन्फ्यूसियस ने कहा है-‘शब्दों को नाप तौल कर बोलो, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके।‘ भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार -‘कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो उससे सत्य, न्याय और नम्रता का व्यतिक्रम न होगा।‘

सोच का फर्क - story 8

सोच का फ़र्क
एक शहर में एक धनी व्यक्ति रहता था, उसके पास बहुत पैसा था और उसे इस बात पर बहुत घमंड भी था| एक बार किसी कारण से उसकी आँखों में इंफेक्शन हो गया|
आँखों में बुरी तरह जलन होती थी, वह डॉक्टर के पास गया लेकिन डॉक्टर उसकी इस बीमारी का इलाज नहीं कर पाया| सेठ के पास बहुत पैसा था उसने देश विदेश से बहुत सारे नीम- हकीम और डॉक्टर बुलाए| एक बड़े डॉक्टर ने बताया की आपकी आँखों में एलर्जी है| आपको कुछ दिन तक सिर्फ़ हरा रंग ही देखना होगा और कोई और रंग देखेंगे तो आपकी आँखों को परेशानी होगी|
अब क्या था, सेठ ने बड़े बड़े पेंटरों को बुलाया और पूरे महल को हरे रंग से रंगने के लिए कहा| वह बोला- मुझे हरे रंग से अलावा कोई और रंग दिखाई नहीं देना चाहिए मैं जहाँ से भी गुजरूँ, हर जगह हरा रंग कर दो|
इस काम में बहुत पैसा खर्च हो रहा था लेकिन फिर भी सेठ की नज़र किसी अलग रंग पर पड़ ही जाती थी क्यूंकी पूरे नगर को हरे रंग से रंगना को संभव ही नहीं था, सेठ दिन प्रतिदिन पेंट कराने के लिए पैसा खर्च करता जा रहा था|
वहीं शहर के एक सज्जन पुरुष गुजर रहा था उसने चारों तरफ हरा रंग देखकर लोगों से कारण पूछा| सारी बात सुनकर वह सेठ के पास गया और बोला सेठ जी आपको इतना पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है मेरे पास आपकी परेशानी का एक छोटा सा हल है.. आप हरा चश्मा क्यूँ नहीं खरीद लेते फिर सब कुछ हरा हो जाएगा|
सेठ की आँख खुली की खुली रह गयी उसके दिमाग़ में यह शानदार विचार आया ही नहीं वह बेकार में इतना पैसा खर्च किए जा रहा था|
तो मित्रों, जीवन में हमारी सोच और देखने के नज़रिए पर भी बहुत सारी चीज़ें निर्भर करतीं हैं कई बार परेशानी का हल बहुत आसान होता है लेकिन हम परेशानी में फँसे रहते हैं| तो मित्रों इसे कहते हैं सोच का फ़र्क|

Saturday, 24 September 2016

अच्छी बातें-14

सब्र का फल

बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे|
एक बार महात्मा बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गाँव में भ्रमण कर रहे थे| उन दिनों कोई वाहन नहीं हुआ करते थे सो लोग पैदल ही मीलों की यात्रा करते थे| ऐसे ही गाँव में घूमते हुए काफ़ी देर हो गयी थी| बुद्ध जी को काफ़ी प्यास लगी थी| उन्होनें अपने एक शिष्य को गाँव से पानी लाने की आज्ञा दी| जब वह शिष्य गाँव में अंदर गया तो उसने देखा वहाँ एक नदी थी जहाँ बहुत सारे लोग कपड़े धो रहे थे कुछ लोग नहा रहे थे तो नदी का पानी काफ़ी गंदा सा दिख रहा था|
शिष्य को लगा की गुरु जी के लिए ऐसा गंदा पानी ले जाना ठीक नहीं होगा, ये सोचकर वह वापस आ गया| महात्मा बुद्ध को बहुत प्यास लगी थी इसीलिए उन्होनें फिर से दूसरे शिष्य को पानी लाने भेजा| कुछ देर बाद वह शिष्य लौटा और पानी ले आया| महात्मा बुद्ध ने शिष्य से पूछा की नदी का पानी तो गंदा था फिर तुम साफ पानी कैसे ले आए| शिष्य बोला की प्रभु वहाँ नदी का पानी वास्तव में गंदा था लेकिन लोगों के जाने के बाद मैने कुछ देर इंतजार किया| और कुछ देर बाद मिट्टी नीचे बैठ गयी और साफ पानी उपर आ गया|
बुद्ध यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा ये जो जीवन है यह पानी की तरह है| जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं तब तक सब कुछ शुद्ध है, लेकिन जीवन में कई बार दुख और समस्या भी आते हैं जिससे जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है| कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह बुराई को देख कर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट जाते हैं, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते वहीं दूसरी ओर कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं वो व्याकुल नहीं होते और कुछ समय बाद गंदगी रूपी समस्याएँ और दुख खुद ही ख़त्म हो जाते हैं|
तो मित्रों, इस कहानी की सीख यही है कि समस्या और बुराई केवल कुछ समय के लिए जीवन रूपी पानी को गंदा कर सकती है| लेकिन अगर आप धैर्य से काम लेंगे तो बुराई खुद ही कुछ समय बाद आपका साथ छोड़ देगी|

Story -7

Story 7
छोटी-छोटी बाधाओं को पहाड़ ना समझें, बिना समय गंवाएं उनसे लड़ें !

एक किसान था. उसके खेत में एक पत्थर का एक हिस्सा ज़मीन से ऊपर निकला हुआ था जिससे ठोकर खाकर वह कई बार गिर चुका था और कितनी ही बार उससे टकराकर खेती के औजार भी टूट रोजाना की तरह आज भी वह सुबह-सुबह खेती करने पहुंचा और इस बार वही हुआ, किसान का हल पत्थर से टकराकर टूट गया. किसान क्रोधित हो उठा, और उसने निश्चय किया कि आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से निकाल कर इस खेत के बाहर फ़ेंक देगा.
वह तुरंत गाँव से ४-५ लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस पत्त्थर के पास पहुंचा और बोल, ” यह देखो ज़मीन से निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे आज उखाड़कर खेत के बाहर फ़ेंक देना है.” और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के किनार वार करने लगा, पर यह क्या ! अभी उसने एक-दो बार ही मारा था कि पूरा-का पूरा पत्थर ज़मीन से बाहर निकल आया. साथ खड़े लोग भी अचरज में पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए पूछा , “क्यों भाई , तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है , पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला ??”
किसान भी आश्चर्य में पड़ गया सालों से जिसे वह एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक छोटा सा पत्थर था ! उसे पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने का प्रयास किया होता तो ना उसे इतना नुकसान उठाना पड़ता और ना ही दोस्तों के सामने उसका मज़ाक बनता .
हम भी कई बार ज़िन्दगी में आने वाली छोटी-छोटी बाधाओं को बहुत बड़ा समझ लेते हैं और उनसे निपटने की बजाय तकलीफ उठाते रहते हैं. ज़रुरत इस बातकी है कि हम बिना समय गंवाएं उन मुसीबतों से लडें , और जब हम ऐसा करेंगे तो कुछ ही समय में चट्टान सी दिखने वाली समस्या एक छोटे से पत्थर के समान दिखने लगेगी जिसे हम आसानी से हल पाकर आगे बढ़ सकते हैं.

Story -6


अपनी त्रुटियों पर विजय ही मनुष्य को महान बनाती है.

अपनी बहन इलाइजा के साथ एक किशोर बालक घूमने निकला। रास्ते में एक किसान की लड़की मिली। वह सिर पर अमरूदों का टोकरा रखे हुए उन्हें बेचने बाज़ार जा रही थी। इलाइजा ने भूल से टक्कर मार दी, जिससे सब अमरूद वहीं गिरकर गन्दे हो गये। कुछ फूट गये, कुछ में कीचड़ लग गई।
गरीब लड़की रो पड़ी। “अब मैं अपने माता पिता को क्या खिलाऊंगी जाकर, उन्हें कई दिन तक भूखा रहना पड़ेगा।” इस तरह अपनी दीनता व्यक्त करती हुई वह अमरूद वाली लड़की खड़ी रो रही थी। इलाइजा ने कहा- “भैया चलो भाग चलें, कोई आयेगा तो हम पर मार पड़ेगी और दण्ड भी देना पड़ेगा। अभी तो यहाँ कोई देखता भी नहीं।”
बहन देख ऐसा मत कह, जब लोग ऐसा मान लेते हैं कि यहाँ कोई नहीं देख रहा, तभी तो पाप होते हैं। जहाँ मनुष्य स्वयं उपस्थित है वहाँ एकान्त कैसा? उसके अन्दर बैठी हुई आत्मा ही गिर गई तो फिर ईश्वर भले ही दण्ड न दे वह आप ही मर जाता है। गिरी हुई आत्मायें ही संसार में कष्ट भोगती हैं, इसे तू नहीं जानती, मैं जानता हूँ।”
इतना कहकर उस बालक ने अपनी जेब में रखे सभी तीन आने पैसे उस ग्रामीण कन्या को दिये और उससे कहा-बहन तू मेरे साथ चल। हमने गलती की है तो उसका दण्ड भी हमें सहर्ष स्वीकार करना चाहिये, तुम्हारे फलों का मूल्य घर चल कर चुका दूँगा।”
तीनों घर पहुँचे, बालक ने सारी बात माँ को सुनाई। माँ ने एक तमाचा इलाइजा को जड़ा दूसरा उस लड़के को और गुस्से से बोली- “तुम लोग नाहक घूमने क्यों गये? घर खर्च के लिये पैसे नहीं, अब यह दण्ड कौन भुगते?”
बच्चे ने कहा- “माता जी! देख मेरे जब खर्च के पैसे तू इस लड़की को दे दे। मेरा दोपहर का विद्यालय का नाश्ता बन्द रहेगा, मुझे उसमें रत्ती भर भी आपत्ति नहीं है। अपनी गलती के लिये प्रायश्चित भी तो मुझे ही करना चाहिये।”
माँ ने उसके डेढ़ महीने के जेब खर्च के पैसे उस लड़की को दे दिये। लड़की प्रसन्न होकर घर चली गई। डेढ़ महीने तक विद्यालय में उस लड़के को कुछ भी नाश्ता नहीं मिला, इसमें उसने जरा भी अप्रसन्नता प्रकट नहीं की। अपनी मानसिक त्रुटियों पर इतनी गम्भीरता से विजय पाने वाला यही बालक आगे चलकर विश्व विजेता नैपोलियन बोनापार्ट के नाम से विश्व विख्यात हुआ।

अच्छी बातें -13


सुकरात और आईना
दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।
तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया ; सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा । वह कुछ बोला नही सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले ,”मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ…….शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है ?”
शिष्य कुछ नहीं बोला , उसका सिर शर्म से झुक गया।
सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया , “शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ”
“नहीं ” , शिष्य बोला ।
गुरु जी ने कहा “मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं”। आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं। इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए। “
शिष्य को ये बहुत शिक्षाप्रद लगी । परंतु उसने एक शंका प्रकट की- ” तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए ?”
“ऐसी बात नही!” सुकरात समझाते हुए बोले ,” उन्हे भी आईना अवश्य देखना चाहिए”! इसलिए ताकि उन्हे ध्यॉन रहे कि वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें, कहीं बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना ले और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दे ।
शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया। वह गुरु के आगे नतमस्तक हो गया।
प्रिय मित्रो, कहने का भाव यह है कि सुन्दरता मन व् भावों से दिखती है। शरीर की सुन्दरता तात्कालिक है जब कि मन और विचारों की सुन्दरता की सुगंध दूर-दूर तक फैलती है।

Friday, 23 September 2016

बुद्धि का बल - story 5


बुद्धि का बल
विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां एक ज्योतिषी आ पहुंचा।
वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला ,' मैं ज्ञानी हूँ ,मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?'
सभी शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे।
सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा।
अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा।
सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे , बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी।
ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, ” तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो, तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है। तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है ….'
ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा।
पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कहा।
ज्योतिषी बोला, ” तुम्हारा बेडौल सिर और माथे से पता चलता है कि तुम एक लालची ज्योतिषी हो, और तुम्हारी ठुड्डी की बनावट तुम्हारे सनकी होने के तरफ इशारा करती है।”
इतना सुनकर शिष्य और भी क्रोधित हो गए पर इसके उलट सुकरात प्रसन्न हो गए और ज्योतिषी को इनाम देकर विदा किया। शिष्य सुकरात के इस व्यवहार से आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा, ' गुरूजी, आपने उस ज्योतिषी को इनाम क्यों दिया, जबकि उसने जो कुछ भी कहाँ वो सब गलत है ?'
नहीं पुत्रों, ज्योतिषी ने जो कुछ भी कहा वो सब सच है, उसके बताये सारे दोष मुझमें हैं, मुझे लालच है, क्रोध है, और उसने जो कुछ भी कहा वो सब है, पर वह एक बहुत ज़रूरी बात बताना भूल गया, उसने सिर्फ बाहरी चीजें देखीं पर मेरे अंदर के विवेक को नही आंक पाया, जिसके बल पर मैं इन सारी बुराइयों को अपने वष में किये रहता हूँ, बस वह यहीं चूक गया, वह मेरे बुद्धि के बल को नहीं समझ पाया !”, सुकरात ने अपनी बात पूर्ण की।

अच्छी बातें -12

जो है ,वही रहे :-
आजकल के आदमी सारा कुछ बिना कुछ किये हुए ही पाना चाहता है ,वो हमेसा यही सोचता है की कोई शॉर्टत्रिक अपनाये जिससे वो जल्दी आमिर हो जाये , जल्दी को काम हो जाये । कुछ भी काम कुछ क्यों न हो बिना किये हुए पूरा हो नही सकता है , न ही कोई दैबिक चमत्कार से पूरा नही होता है ,अपने लक्ष्य को अंजाम तक पहुचने के लिए आपको काम करने होंगे ।कुछ महान काम करने के लिए सायद आपको भगवान भेजे होंगे , उस काम को भगवान के भरोशे मत छोड़िये , हो सकता है की भगवन ही आपके भोरोशे बैथे होंगे की उस काम को आप ही अंजाम देकर पूरा कर सके । कोई दैबिक चमत्कार के भोरेषे मत रहिये , आप अपने चमत्कार खुद कीजिये और दुनिया वाले को दिखाइए की कोई चमत्कार आप अपने हाथो और मन की शक्ति से पूरा किये है । कोई भी महान काम किये है उसके खुद के मेहनत और कठिन लगन का परिश्र्म है । कोई आदमी किसी उच्य जाती ,या धर्म में जन्म लेने से महान नही बनाता है , अगर ऐसा होता तो सारा कोई महान् ही नही बन जाते , किसी जाती या धर्म में पैदा होने से महान नही बनाता बल्कि उसको अपने काम को अंजाम देकर और अच्छी शिख से बनते है । यहाँ आजकल के कुछ युवा को देखा गया है की वो अपने जाती या अपने धर्म को अपने में श्रेस्ट मानता है । कौन से जाती श्रेस्ट है ,और कौन से धर्म श्रेस्ट है , ये हमेसा विबादिक मुद्दा रहता है , जाती धर्म को से ऊपर उठकर अपने आप को श्रेस्ट बनाने की कोशिस कीजिये , अच्छे काम कीजिए , अच्छे सोच रखिये , देश के बारे में सोचिये , अपने लक्ष्य तक पहुँचिये ,यही सब विचार आपको को अच्छे बनायेअंगे । जो " लोग किसी जाती या धर्म को ख़राब कहते है आपके सामने सोचिये की वो आदमी कभी कुछ नही कर कर सकता है , क्योकि उसका कुछ लक्ष्य होता नही ,फिजूल की बात करते रहता ,उसके पास कोई काम जो नही है , तो क्या करेगा ,कुछ न कुछ तो फालतू की बात करेगा ही न , इस तरह के आदमी को लात मरकर भगा दीजिये ,तब उसकी औकात पता चलेगा , वो हमेसा दूसरे जाती के बारे में ख़राब कहैँगे या धर्म के बारे में ।"" उससे बस आप ये पूछिये की तुम अपने धर्म के बारे में क्या जानते हो और जो तुम्हारे धर्म में अच्छी अच्छी बातें शिखाया गया है क्या तुम उकसा 2% भी पालन करते हो ," तब तो उसकी बोलती ही बंद हो जायेगी ।और वह आपके सामने से भागने की कोशिस करेगा , अगर बोले हाँ करते है तो पूछिये क्या क्या पालन करते हो ,कुछ का नाम हमको भी बताओ , तब तो वह रुकेगा नही वह से वह नो दो ग्यारह हो जायेगा । फिर वह कभी कही किसी जाती या धर्म का बारे में बोलने से 1000 बार सोचेगा । इंसान है ,इंसान के तरह सोचिये । " जब कोई बच्चा रोड पे एक्ससिडेंट होता है और बुरी तरह घायल हो जाता है  और दर्द के मरे चिल्लाते है तो वहाँ देखने वाले के आँख में स्वत् अंशु आ जाते है । " या फिर उस बच्चे से पूछते है की तुम किस जाती या धर्म के हो । उस समय सब अपने अपने भगवान से यही प्रार्थना करते है की बच्चे जल्दी से ठीक हो जाये , हरेक आदमी के दिल में कुछ न कुछ दया जरूर रहता है , ।

एक कहानी है :-
एक गांव में एक संत आये हुए थे । उसी गांव में एक आदमी थे जिसका कोई काम नही हो रहा था ,वह उस काम को लेकर परेशान थे , उसी बात को लेकर वह गांव में ठहरे हुए साधू के पास गए और बोले महराज मेरा यह काम बहुत दिनों से नही हो रहा है ,तब साधू बोले बेटा " विवेक रखो और दया पालो " । वह आदमी साधू की बात सुनकर घर चल गए , अचानक उसका वह काम हो गया । तब वह भागते भागते साधू के पास आये और साधू को प्रणाम किये और साधू के बारे में अच्छी अच्छी प्रंससा किये और साधू फिर बोले " विवेक रखो और दया पालो ' । वह आदमी  वहाँ से घर आये और पता चला की उस काम में और जटिल हो गया है , वह आदमी गुस्से के मारे साधू के पास आये और बुरा भला कह कर चल दिए , साधू फिर " विवेक रखो और दया पालो "। उसके जाने के बाद उसके शिष्य पूछे ,गुरूजी वह आदमी एक बार आपके बारे में अच्छा बोले और दूसरी बार में आपके बारे में बुरा कह कर चल दिए । तब साधू ने बोले

"परस्थिति बदलते ही आदमी के विचार बदल जाते है , मैं न तो उसके तारीफ से खुस हूँ न ही उसके गुस्से से "
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मन को लगता है की वह मेरा है तो वह मेरा हो जता है , अगर मन को लगता है वह मेरा नही है ,तो वह परया हो जाता है ।ब्यक्ति हो या बस्तु तेरा मेरा होते ही हमारे भाव बदलने लगता है । मन ही हँसता है और मन ही रोटा है ,। मन का ही सुख और दुःख है ,मन का ही संसार है ।महान बैज्ञानिक einstine कहते है "यह संसार जो बना है ,वह हमारी सोच का परिणाम है ।और यकह तब तक नही बदलता जब तक की आप नही बदलते ।

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Saturday, 17 September 2016

संतोष का धन :-

संतोष का धन :-
पंडित श्री रामनाथ शहर के बाहर अपनी पत्नी के साथ रहते थे | एक जब वो अपने विद्यार्थिओं को पढ़ाने के लिए जा रहे थे तो उनकी पत्नी ने उनसे सवाल किया ” कि आज घर में खाना कैसे बनेगा क्योंकि घर में केवल मात्र एक मुठी चावल भर ही है ?” पंडित जी ने पत्नी की और एक नजर से देखा फिर बिना किसी जवाब के वो घर से चल दिये ।
शाम को वो जब वापिस लौट कर आये तो भोजन के समय थाली में कुछ उबले हुई चावल और पत्तियां देखी | यह देखकर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा ” भद्रे ये स्वादिष्ट शाक जो है वो किस चीज़ से बना है ??”  मेने जब सुबह आपके जाते समय आपसे भोजन के विषय में पूछा था तो आपकी दृष्टि इमली के पेड़ की तरफ गयी थी | मैंने उसी के पतों से यह शाक बनाया है | पंडित जी ने बड़ी निश्चितता के साथ कहा अगर इमली के पत्तो का शाक इतना स्वादिष्ट होता है फिर तो हमे चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है अब तो हमे भोजन की कोई चिंता ही नहीं रही
जब नगर के राजा को पंडित जी की गरीबी का पता चला तो राजा ने पंडित को नगर में आकर रहने का प्रस्ताव दिया किन्तु पंडित ने मना कर दिया | तो राजा हैरान हो गया और स्वयं जाकर उनकी कुटिया में उनसे मिलकर इसका कारण जानने की इच्छा हुई | राजा उनकी कुटिया में गया तो राजा ने काफी देर इधर उधर की बाते की लेकिन वो असमंजस में था कि अपनी बात किस तरह से पूछे लेकिन फिर उसने हिम्मत कर पंडित जी से पूछ ही लिया कि आपको किसी चीज़ का कोई अभाव तो नहीं है न ?
पंडित जी हसकर बोले यह तो मेरी पत्नी ही जाने इस पर राजा पत्नी की और आमुख हुए और उनसे वही सवाल किया तो पंडित जी की पत्नी ने जवाब दिया कि अभी मुझे किसी भी तरीके का अभाव नहीं है क्योंकि मेरे पहनने के वस्त्र इतने नहीं फटे कि वो पहने न जा सकते और पानी का मटका भी तनिक नहीं फूटा कि उसमे पानी नहीं आ सके और इसके बाद मेरे हाथों की चूडिया जब तक है मुझे किसी चीज़ का क्या अभाव हो सकता है ?? और फिर सीमित  साधनों में भी संतोष की अनुभूति हो तो जीवन आनंदमय हो जाता है ।

नागरिक का फर्ज:-

नागरिक का फर्ज:-
एक बार की  बात है चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस अपने चेलो के साथ एक पहाड़ी से गुजर रहे थे । थोड़ी दूर चलने के बाद वो एक जगह अचानक रुक गये और कन्फ्यूशियस बोले ” कंही कोई रो रहा है ” वो आवाज को लक्ष्य करके उस और बढ़ने लगे । शिष्य भी पीछे हो लिए एक जगह उन्होंने देखा कि एक स्त्री रो रही है ।
इस पर कन्फ्यूशियस हैरान हुए और बोले कि अगर ऐसा है तो तुम इस खतरनाक जगह को छोड़ क्यों नहीं देती । इस पर स्त्री ने कहा ” इसलिए नहीं छोडती क्योंकि कम से कम यंहा किसी अत्याचारी का शासन तो नहीं है ।” और चीते का अंत तो किसी न किसी दिन हो ही जायेगा ।
कन्फ्यूशियस उसके रोने का कारण पूछा तो स्त्री ने कहा इसी स्थान पर उसके पुत्र को चीते ने मार डाला । इस पर कन्फ्यूशियस ने उस स्त्री से कहा तो तुम तो यंहा अकेली हो न तुम्हारा बाकि का परिवार कंहा है ? इस पर स्त्री ने जवाब दिया हमारा पूरा परिवार इसी पहाड़ी पर रहता था लेकिन अभी थोड़े दिन पहले ही मेरे पति और ससुर को भी इसी चीते ने मार दिया था । अब मेरा पुत्र और मैं यंहा रहते थे और आज चीते ने मेरे पुत्र को भी मार दिया ।
इस पर कन्फ्यूशियस ने अपने शिष्यों से कहा निश्चित ही यह स्त्री करूँणा और सहानुभूति की पात्र है लेकिन फिर भी एक महत्वपूरण सत्य से इसने हमे अवगत करवाया है कि एक बुरे शासक के राज्य में रहने से अच्छा है किसी जंगल या पहाड़ी पर ही रह लिया जाये । जबकि मैं तो कहूँगा एक समुचित व्यवस्था यह है कि जनता को चाहिए कि ऐसे बुरे शासक का जनता पूर्ण विरोध करें और सत्ताधारी को सुधरने के लिए मजबूर करे और हर एक नागरिक इसे अपना फर्ज समझे ।

बदलाव story 4

बदलाव:-
एक लड़का सुबह सुबह दौड़ने को जाया करता था | आते जाते वो एक बूढी महिला को देखता था | वो बूढी महिला तालाब के किनारे छोटे छोटे कछुवों की पीठ को साफ़ किया करती थी | एक दिन उसने इसके पीछे का कारण जानने की सोची
वो लड़का महिला के पास गया और उनका अभिवादन कर बोला
” नमस्ते आंटी ! मैं आपको हमेशा इन कछुवों की पीठ को साफ़ करते हुए देखता हूँ आप ऐसा किस वजह से करते हो ?”  महिला ने उस मासूम से लड़के को देखा और  इस पर लड़के को जवाब दिया ” मैं हर रविवार यंहा आती हूँ और इन छोटे छोटे कछुवों की पीठ साफ़ करते हुए सुख शांति का अनुभव लेती हूँ |”  क्योंकि इनकी पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचता जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए ये कछुवे तैरने में मुश्किल का सामना करते है | कुछ समय बाद तक अगर ऐसा ही रहे तो ये कवच भी कमजोर हो जाते है इसलिए कवच को साफ़ करती हूँ
यह सुनकर लड़का बड़ा हैरान था | उसने फिर एक जाना पहचाना सा सवाल किया और बोला “बेशक आप बहुत अच्छा काम कर रहे है लेकिन फिर भी आंटी एक बात सोचिये कि इन जैसे कितने कछुवे है जो इनसे भी बुरी हालत में है जबकि आप सभी के लिए ये नहीं कर सकते तो उनका क्या क्योंकि आपके अकेले के बदलने से तो कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा न
महिला ने बड़ा ही संक्षिप्त लेकिन असरदार जवाब दिया कि भले ही मेरे इस कर्म से दुनिया में कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा लेकिन सोचो इस एक कछुवे की जिन्दगी में तो बदल्वाव आयेगा ही न | तो क्यों न हम छोटे बदलाव से शुरुवात करे ।

अपना अपना नजरिया:- story 1

अपना अपना नजरिया:-
एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ नदी में स्नान कर रहे थे | तभी एक राहगीर वंहा से गुजरा तो महात्मा को नदी में नहाते देख वो उनसे कुछ पूछने के लिए रुक गया | वो संत से पूछने लगा ” महात्मन एक बात बताईये कि यंहा रहने वाले लोग कैसे है क्योंकि मैं अभी अभी इस जगह पर आया हूँ और नया होने के कारण मुझे इस जगह को कोई विशेष जानकारी नहीं हैँ।
इस पर महात्मा ने उस व्यक्ति से कहा कि ” भाई में तुम्हारे सवाल का जवाब बाद में दूंगा पहले तुम मुझे ये बताओ कि तुम जिस जगह से आये वो वंहा के लोग कैसे है ?” इस पर उस आदमी ने कहा “उनके बारे में क्या कहूँ महाराज वंहा तो एक से एक कपटी और दुष्ट लोग रहते है इसलिए तो उन्हें छोड़कर यंहा बसेरा करने के लिए आया हूँ |”  महात्मा ने जवाब दिया बंधू ” तुम्हे इस गाँव में भी वेसे ही लोग मिलेंगे कपटी दुष्ट और बुरे |”  वह आदमी आगे बढ़ गया ।
थोड़ी देर बाद एक और राहगीर उसी मार्ग से गुजरता है और महात्मा से प्रणाम करने के बाद कहता है ” महात्मा जी मैं इस गाँव में नया हूँ और परदेश से आया हूँ और इस ग्राम में बसने की इच्छा रखता हूँ लेकिन मुझे यंहा की कोई खास जानकारी नहीं है इसलिए आप मुझे बता सकते है ये जगह कैसे है और यंहा रहने वाले लोग कैसे है ?
महात्मा ने इस पर फिर वही प्रश्न किया और उनसे कहा कि ” मैं तुम्हारे सवाल का जवाब तो दूंगा लेकिन बाद में पहले तुम मुझे ये बताओ कि तुम पीछे से जिस देश से भी आये हो वंहा रहने वाले लोग कैसे है ?
उस व्यक्ति ने महात्मा से कहा ” गुरूजी जन्हा से मैं आया हूँ वंहा भी सभ्य सुलझे हुए और नेकदिल इन्सान रहते है मेरा वंहा से कंही और जाने का कोई मन नहीं था लेकिन व्यापार के सिलसिले में इस और आया हूँ और यंहा की आबोहवा भी मुझे भा गयी है इसलिए मेने आपसे ये सवाल पूछा था |” इस पर महात्मा ने उसे कहा बंधू ” तुम्हे यंहा भी नेकदिल और भले इन्सान मिलेंगे |”  वह राहगीर भी उन्हें प्रणाम करके आगे बढ़ गया ।
शिष्य ये सब देख रहे थे तो उन्होंने ने उस राहगीर के जाते ही पूछा गुरूजी ये क्या अपने दोनों राहगीरों को अलग अलग जवाब दिए हमे कुछ भी समझ नहीं आया | इस पर मुस्कुराकर महात्मा बोले वत्स आमतौर पर हम आपने आस पास की चीजों को जैसे देखते है वैसे वो होती नहीं है इसलिए हम अपने अनुसार अपनी दृष्टि (point of view) से चीजों को देखते है और ठीक उसी तरह जैसे हम है | अगर हम अच्छाई देखना चाहें तो हमे अच्छे लोग मिल जायेंगे और अगर हम बुराई देखना चाहें तो हमे बुरे लोग ही मिलेंगे | सब देखने के नजरिये ( point of view in hindi ) पर निर्भर करता है ।

सेबा भाव और चंचलता से बुद्धि का नास story 3

सेबा भी एक धर्म है :-
एक साधु शिष्यों के साथ कुम्भ के मेले में भ्रमण कर रहे थे। एक स्थान पर उनने एक बाबा को माला फेरते देखा। लेकिन वह बाबा माला फेरते- फेरते बार- बार आँखें खोलकर देख लेते कि लोगों ने कितना दान दिया है। साधु हँसे व आगे बढ़ गए।
आगे एक पंडित जी भागवत कह रहे थे, पर उनका चेहरा यंत्रवत था। शब्द भी भावों से कोई संगति नहीं खा रहे थे, चेलों की जमात बैठी थी। उन्हें देखकर भी साधु खिल- खिलाकर हँस पड़े ।
थोड़ा आगे बढ़ने पर इस मण्डली को एक व्यक्ति रोगी की परिचर्या करता मिला। वह उसके घावों को धोकर मरहम पट्टी कर रहा था। साथ ही अपनी मधुर वाणी से उसे बार- बार सांत्वना दे रहा था। साधु कुछ देर उसे देखते रहे, उनकी आँखें छलछला आईं।
आश्रम में लौटते ही शिष्यों ने उनसे पहले दो स्थानों पर हँसने व फिर रोने का कारण पूछा। वे बोले-‘बेटा पहले दो स्थानों पर तो मात्र आडम्बर था पर भगवान की प्राप्ति के लिए एक ही व्यक्ति आकुल दिखा- वह, जो रोगी की परिचर्या कर रहा था। उसकी सेवा भावना देखकर मेरा हृदय द्रवित हो उठा और सोचने लगा न जाने कब जनमानस धर्म के सच्चे स्वरूप को समझेगा ।
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| चंचलता से बुद्धि का नास होता है :-

किसी तालाब में कम्बुग्रीव नामक एक कछुआ रहता था। तालाब के किनारे रहने वाले संकट और विकट नामक हंस से उसकी गहरी दोस्ती थी। तालाब के किनारे तीनों हर रोज खूब बातें करते और शाम होने पर अपने-अपने घरों को चल देते ।
एक वर्ष उस प्रदेश में जरा भी बारिश नहीं हुई। धीरे-धीरे वह तालाब भी सूखने लगा। अब हंसों को कछुए की चिंता होने लगी ।
जब उन्होंने अपनी चिंता कछुए से कही तो कछुए ने उन्हें चिंता न करने को कहा। उसने हंसों को एक युक्ति बताई। उसने उनसे कहा कि सबसे पहले किसी पानी से लबालब तालाब की खोज करें फिर एक लकड़ी के टुकड़े से लटकाकर उसे उस तालाब में ले चले । उसकी बात सुनकर हंसों ने कहा कि वह तो ठीक है पर उड़ान के दौरान उसे अपना मुंह बंद रखना होगा। कछुए ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह किसी भी हालत में अपना मुंह नहीं खोलेगा ।
कछुए ने लकड़ी के टुकड़े को अपने दांत से पकड़ा फिर दोनो हंस उसे लेकर उड़ चले। रास्ते में नगर के लोगों ने जब देखा कि एक कछुआ आकाश में उड़ा जा रहा है तो वे आश्चर्य से चिल्लाने लगे। लोगों को अपनी तरफ चिल्लाते हुए देखकर कछुए से रहा नहीं रहा गया । वह अपना वादा भूल गया। उसने जैसे ही कुछ कहने के लिए अपना मुंह खोला कि आकाश से गिर पड़ा। ऊंचाई बहुत ज्यादा होने के कारण वह चोट झेल नहीं पाया और अपना दम तोड़ दिया। इसीलिए कहते हैं कि बुद्धिमान भी अगर अपनी चंचलता पर काबू नहीं रख पता तो परिणाम बहुत बुरा होता है ।

बल बड़ा या बुद्धि :- story2



बल बड़ा या बुद्धि :-
एक जंगल में बड़ा ताकतवर शेर रहता था। वह प्रतिदिन जंगल के अनेक जानवरों को मार डालता था। उस वन के सारे जानवर उसके डर से काँपते रहते थे। एक बार जानवरों ने सभा की। उन्होंने निश्चय किया कि शेर के पास जाकर उससे निवेदन किया जाए। जानवरों के कुछ चुने हुए प्रतिनिधि शेर के पास गए। जानवरों ने उसे प्रणाम किया।और फिर  एक प्रतिनिधि ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, ‘आप इस जंगल के राजा है। आप अपने भोजन के लिए प्रतिदिन अनेक जानवरों को मार देते हैं, जबकि आपका पेट एक जानवर से ही भर जाता है।’
'शेर ने गरजकर पूछा-‘तो मैं क्या कर सकता हूँ?’
सभी जानवरों में निवेदन किया, ‘महाराज, आप भोजन के लिए कष्ट न करें। आपके भोजन के लिए हम स्वयं हर दिन एक जानवर को आपकी सेवा में भेज दिया करेंगे। आपका भोजन हरदिन समय पर आपकी सेवा से पहुँच जाया करेगा
शेर ने कुछ देर सोचा और कहा-‘यदि तुम लोग ऐसा ही चाहते हो तो ठीक है। किंतु ध्यान रखना कि इस नियम में किसी प्रकार की ढील नहीं आनी चाहिए।’
इसके बाद हर दिन एक पशु शेर की सेवा में भेज दिया जाता। एक दिन शेर के पास जाने की बारी एक खरगोश की आ गई। खरगोश बुद्धिमान था।
उसने मन-ही मन सोचा- ‘अब जीवन तो शेष है नहीं। फिर मैं शेर को खुश करने का उपाय क्यों करुँ? ऐसा सोचकर वह एक कुएँ पर आराम करने लगा।  आराम करते करते वह कुँए में झांककर देखा तो उसका चेहरा दिखाई दिया , वह समझ गया की अब क्या करना है ,इसी कारण शेर के पास पहुँचने में उसे बहुत देर हो गई।’
खरगोश जब शेर के पास पहुँचा तो वह भूख के कारण परेशान था। खरगोश को देखते ही शेर जोर से गरजा और कहा, ‘एक तो तू इतना छोटा-सा खरगोश है और फिर इतनी देर से आया है। बता, तुझे इतनी देर कैसे हए ।
खरगोश बनावटी डर से काँपते हुए बोला- ‘महाराज, मेरा कोई दोष नहीं है। हम दो खरगोश आपकी सेवा के लिए आए थे। किंतु रास्ते में एक शेर ने हमें रोक लिया। उसने मुझे पकड़ लिया।’ और मैं किसी तरह आपके पास जान बचा के आया ,आपके भोजन के लिए । और जब उसको आपके बारे में बतया तो बोला , हम इस जंगल के राजा है  ,और दूसरा कोई नही है ।
। वह बोला, ‘तुम झूठ बोलते हो।’ इस पर खरगोश ने कहा, ‘नहीं, मैं सच कहता हूँ तुम मेरे साथी को बंधक रख लो। मैं अपने राजा को तुम्हारे पास लेकर आता हूँ।’
खरगोश की बात सुनकर दुर्दांत शेर का क्रोध बढ़ गया। उसने गरजकर कहा, ‘चलो, मुझे दिखाओ कि वह दुष्ट कहाँ रहता है?’
खरगोश शेर को लेकर एक कुँए के पास पहुँचा। खरगोश ने चारों ओर देखा और कहा, महाराज, ऐसा लगता है कि आपको देखकर कही छुप गया ,
फिर अचानक बोला महराज लगता है इस कुएँ में छिपा है ,
खरगोश स्वयं कुएँ की मुँडेर पर खड़ा हो गया। शेर भी मुँडेर पर चढ़ गया। दोनों की परछाई कुएँ के पानी में दिखाई देने लगी। खरगोश ने शेर से कहा, ‘महाराज, देखिए। वह रहा मेरा साथी खरगोश। देखिये वह खड़ा है ,
शेर ने दोनों को देखा। उसने भीषण गर्जन किया। उसकी गूँज कुएँ से बाहर आई। बस, फिर क्या था! देखते ही देखते शेर ने अपने शत्रु को पकड़ने के लिए कुँए में कूद गए । और वह डूब के मर गया ।विपत्ति में घबराये नही , शांत भाव से बचने का रास्ता निकालिये , दुनिया में कुछ भी अशंभव नही है ,हरेक का निदान है उस निदान को आप ढूँढिये , आपको बहार निकलने का रास्ते मिल जायेअंगे ।
" सामने वाले जब आपसे बल में ताकतवर है ,तो उसे हरने के लिए बुद्धि का इस्तेमाल करना होगा ।तब जाकर ही आप जित सकते है ।"
इशी तरह एक और कहानी है , आपको कुछ शब्द में समझाता हूँ ,
एक बार हाथी भी अपने पैरों से छोटे छोटे चींटी को कुचल देते थे ,चींटी भी उसे समझनें का बहुत प्रयास किये ,पर वो मनमतंग हाथी नही समझे , अंत में चींटी ने बुद्धि से काम लिया और घास के सहारे उसके सूंड़ में घुस गए तब जाकर हाथी को सबक मिला ।

Saturday, 10 September 2016

धर्म क्या है ?

धर्म (Dharma) क्या है ।
धर्म का मतलब धारण करना , अच्छा विचार,   अच्छा ब्यवहार , एक आदर्श आदमी बनाना ।

किसी भी वस्तु के स्वाभाविक गुणों को उसका धर्म कहते है जैसे अग्नि का धर्म उसकी गर्मी और तेज है। गर्मी और तेज के बिना अग्नि की कोई सत्ता नहीं। पिता का धर्म है ,अपने बच्चे को लालन ,पालन करना और शिक्षित करना । शिक्षक का धर्म है शिष्य को शिक्षा देना ।अत: मनुष्य का स्वाभाविक गुण मानवता है। यही उसका धर्म है।
 वेद कहता है – मनुर्भव अर्थात मनुष्य बन जावो (ऋग्वेद 10-53-6)।
गीता में श्रीकृष्ण जी कहते है कि ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ अर्थात जहाँ धर्म है वहाँ विजय है आगे आता है कि ‘वेदोsखिलो धर्ममुलं’ अर्थात वेद धर्म का मूल है।
वेदों के आधार पर महर्षि मनु (manu) ने धर्म के 10 लक्षण बताए है :-

धृति क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणमं ॥

(1) धृति :- कठिनाइयों से न घबराना।

(2) क्षमा :- शक्ति होते हुए भी दूसरों को माफ करना।

(3) दम :- मन को वश में करना (समाधि के बिना यह संभव नहीं) ।

(4) अस्तेय :- चोरी न करना। मन, वचन और कर्म से किसी भी परपदार्थ या धन का लालच न करना ।

(5) शौच :- शरीर, मन एवं बुद्धि को पवित्र रखना।

(6) इंद्रिय-निग्रह :- इंद्रियों अर्थात आँख, वाणी, कान, नाक और त्वचा को अपने वश में रखना और वासनाओं से बचना।

(7) धी :- बुद्धिमान बनना अर्थात प्रत्येक कर्म को सोच-विचारकर करना और अच्छी बुद्धि धारण करना।

(8) विद्या :- सत्य वेद ज्ञान ग्रहण करना।

(9) सत्य :- सच बोलना, सत्य का आचरण करना।

(10) अक्रोध :- क्रोध न करना। क्रोध को वश में करना।

इन दश नियमों का पालन करना धर्म है। यही धर्म के दस लक्षण है। यदि ये गुण या लक्षण किसी भी व्यक्ति में है तो वह धार्मिक है। मनुष्य बिना सिखाये अपने आप कुछ नहीं सीखता है। जबकि ईश्वर ने अन्य जीवों को कुछ स्वाभाविक ज्ञान दिया है जिससे उनका जीवन चल जावे। जैसे :- मनुष्य को बिना सिखाये न चलना आवे, न बोलना, न तैरना और न खाना आदि। जबकि हिरण का बच्चा पैदा होते ही दौड़ने लगता है, तैरने लगता है। यही बात अन्य गाय,भैंस,शेर,मछ्ली,सर्प,कीट-पतंग आदि के साथ है। अत: ईश्वर ने मनुष्य के सीखने के लिए भी तो कोई ज्ञान दिया होगा जिसे धर्म कहते है। जैसे भारत के संविधान को पढ़कर हम भारत के धर्म, कानून, व्यवस्था, अधिकार आदि को जानते है वैसे ही ईश्वरीय संविधान वेद को पढ़कर ही हम मानवता व इस ईश्वर की रचना सृष्टि को जानकर सही उन्नति को प्राप्त कर सकते है।
Reference-http://www.vedicpress.com/what-is-dharma/

Friday, 9 September 2016

हथियार से हमारे मानिसक बदलाव

आज मैं आपको बताना आदमी कब तक कुछ चीज को बर्दास्त कर सकता है खासकर बल में , बल में अगर एक दूसरे की अपेक्षा कम ताकतवर है तो उसमे एक उससे शाररिक रूप से अगर अधिक बलशाली है तो वो हमेशा अपने से कम शारारिक शक्ति आदमी को मेन्टल ,फिजिकल ,या फिर कोई आंतरिक कारणों के कारन परेशान करता है तो वो बर्दास्त कर सकता है जब तक वह कम है उससे , मतलब वह लड़ाई के पक्ष में नही के बराबर ही रहेगा ।
तब तक वह शांति का माहौल को अपनाएगा , चाहे वह कितना भी उसे लड़ने के लिए उत्तेजित करता है ,वह हर संभम बर्दास्त करने की कोसिस करंगे ।
" यह बर्दास्त ,मर्यादा तब ख़तम हो जायेगी तब उसके पास कोई हथियार ,जैसे तलवार या भिर बन्दुक , और इसके आने के साथ ही उसका आत्म बल बल बढ़ जायेगी और वह लड़ाई के के लिए हमेशा तैयार रहेगें , उस टाइम उसकी बर्दास्त करने की शक्ति ख़तम हो जायेगी , जो शांति थी वो ख़तम होने की कारगर पर होगी । "
मतलब मैं यह कहना चाहता हूँ की , वह तब तक ही बर्दास्त करैंगे जब तक उसके पास कोई हथियार नही है , जैसे ही कोई हथियार हथियार होएंगे वहाँ पर कोई अपने को कम नही समझेगा , मतलब  लड़ाई की स्थिति हमेशा बानी रहेगी , क्यों की कोई एक दूसरे से कम नही रहेगा । क्योंकि आज के समय में कोई कम रहना चाहता नही है , और जल्दी ही क्रोधित हो जाते है आजकल के लोग , और जब क्रोधित होंगे तो वह बरचस्य की लड़ाई नही रह जाती बल्कि अपनी शक्ति की लड़ाई हो जाती है ,इसमें कोई उसको या इसको पिट देता है , जिसमे हानि दोनों को है ,आर्थिक क्षति हो या फिर किसी के मारने का क्षति "
" आज के स्थिति देखकर यह अनुमान लगया जा सकता है , की सभी देश अपने अपने घातकऔर खतरनाक  हथियार तैयार कर रहे है ,आने वाले दिनों में देश के बिच अगर किसी बात को लेकर तनाव होता है तो उस समय वरचस्य की लड़ाई नही हथियार की लड़ाई होगी , और उसमे न जाने कितने जान मॉल की ,आर्थिक क्षति ,और न जाने कितने इन्शान अपनों को खो देगें , दूसरे के हस्तक्षेप करते करते तब तक कितने चीज उजर जायेअंगे ।
"युद्ध दो दो देशो के बिच ,दो राजाओं के बिच ,दो  सैनिक के बिच , दो आदमियो के बिच , दो समूहों के बिच होता । पर  युद्ध के परिणाम बाद में पता चलता है की ,इन्शान ने क्या क्या खोया ।

Monday, 5 September 2016

भारत के कुछ महान शिक्षक

किताबें ,मित्रो में सबसे शांत और स्थाई मित्र होती है ,
सलाहकारों में सबसे सुलभ और बुद्धिमान सलाहाकार होती है ,
और शिक्षकों में सबसे धर्यवान शिक्षक होते है ।
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दो तरह के शिक्षक होते है एक जो भयभीत कर देते है की आप हिल नही सकते ,
एक वह शिक्षक है जो आपके पीठ पीछे से ठप थपा दे और आप आसमान छु लेते है ।
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एक औसत दर्जे के शिक्षक बताता है ,
एक अच्छा शिक्षक समझाता है
और एक बेहतर शिक्षक कर के दिखता है ,
और एक महान शिक्षक प्रेरित करता है ।
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एक अच्छे अद्यापक सबसे अच्छे अद्यापक अपने सबसे अच्छे क्षात्र होकर बनता है ।।
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सहिष्णुता के अभ्यास में किसी का दुश्मन ही सबसे अच्छा शिक्षक होता है ।
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युद्ध में दो लोगोँ के साथ युद्ध चल रहा है ,तो वो दोनों मेरे गुरु के सामान कार्य करैंगे ,
एक की मैं अछी बात पकुरुगा और उसका अनुशरण करूँगा ,
और दूसरे का बुरी बात पकुरुगा और उसे अपने अंदर सही करुँगा ।
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अगर किसी देश को भर्ष्टाचार मुक्त और सुन्दर मन वाले लोगो का देश बनाना है तो ,
मेरा दृढ़ता पूर्वक मनना है की देश के तिन लोग ये काम क्र सकते है ,माता ,पिता और गुरु । A.P.J .KALAM
सफलता एक घठिया शिक्षक है ,लोगो में ये सोच बिकसित क्र देते है की वो अशफल नही हो सकते ।  .......बिल गेट्स
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रचनात्मक और अभिब्यक्ति और ज्ञान में प्रशन्नता जागना शिक्षक की सरवोच्य कला है ...einstine
more quotation on teacher -http://www.scitechideas.in/2016/07/8.html


अब्दुल कलम :-
उन्हाने भारत को परमाणु शक्ति बनाया |राष्पति बन गये थे ,लेकिन
चाहते थे की उनकी पहचान एक शिक्षक के रूप में हो |
बच्चो के सबलो को उत्साह के साथ जबाब देते थे |
> उन्हाने सिखाया पहली सफलता के बाद रुको मत ,बाद में
बिफल हुए तू पहली सफलता को एक संग्योग मानेंगे |
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होमी जहागीर भाभा :-
उन्हाने  देश को पहला रिसर्च इंस्टिट्यूट दिया | परमाणु शक्ति
बनाने की निब राखी ,३१ वर्ष की उर्म में रॉयल सोसायटी के सदस्य बने |
पांच बार नोबेल के लिए नामांकित हुए |
> उसने सिखाया सिर्फ आज की नहीं ,आगे की सोचो |
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सीबी रमण :-
1907 में सहायक अकाउंटेंट जनरल की नौकरी पा ली थी ,|
लेकिन विज्ञानं के प्रति लगाव होने होने के कारन नौकरी छोर दी |और
1930 में नोबेल प्राइज पहले अश्वेत भारतीय बने |
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श्री निवास रामानुजन :-
32 शाल के ही उर्म में ही बनाया चार हजार थ्योरम
उसने 32 शाल की उर्म में ही करीब चार थ्योरम दिए |उन्हाने
infinite सीरीज दी जिसका प्रयोग पई की गणना में होता है |
>दुसरे सब्जेक्ट  में फ़ैल होते थे लेकिन गणित उनका जनून था |
उनमे उनको सफलता मिली , जो भी करे जनून के साथ करे |
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सत्येन्द्रनाथ बोश :-
1920 में आइन्स्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत का जर्मन से अंग्रेजी भासा में
अनुवाद करने वाले पहले बैज्ञानिक |
> उन्हाने सिखाया आधुनिकता को अपनाओ , जहाँ देश में सब पारंपरिक भौताकी
को समझ रहे है | इन्हाने भौताकी के आधुनिक परिबर्तन को समझा |
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पर्फुल्ला चन्द्र रे :-
देश को पहली फार्म कंपनी दिए |27 शाल की उर्म में यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबरा से डॉक्टरेट ऑफ़ साइंस की
डिग्री ली |
>उन्हाने सिखाया लिक से हटकर काम करो |
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प्रोफेसर एच् एन महा बाला :-
उन्हाने कई आईटी आइकॉन दिए ,देश में कंप्यूटर शिक्षा लोगो तक पहुचाई |
उसने सिखाया हमेशा नए स्तरों को अपनाओ ,खासकर युवाओ को पुराने रास्ते हमेशा के लिए छोर देने चाहिए |
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सर सय्यद अहमन खान :-
अंग्रेजी पर जोर ताकि पिछर न जाये भारतीय
amu  की स्थापना की ,पढने पे जोर दिया |
उन्हाने सिखाया पुराणी और बेकार परम्परा को छोरो ,यह मनाब विकाश में बाधा पहुचती है |
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ज्योतिबा फुले :-
हत्या का प्रयास ,पर दलित को पढ़ना नही छोरा
महिला और दलितों की पढाई के लिए काम
>विना शिक्षा बुद्धि नष्ट हो जाती है ,बिना बुद्धि नैतिकता नष्ट हो जाती है ,बिना नैतिकता
विकाश नही होता , देखिये शिक्षा के विना कितना कुछ नष्ट हो जाता है |
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इश्वर चन्द्र विद्या सागर :-
इनके बनी से ही सुधर जाते थे बिगड़े क्षात्र
 विधवा पुनर्विवाह काननु पारित किया ,बल विहाह के बिरोधी रहे ,स्त्री शिक्षा के लिए काम किये
> कुछ सिखाने के लिए दंड नही ,स्नेह सबसे प्रभावशाली तरीका है | कठोरता अपनाने
से बच्चे सुधरते नही बल्कि बिगारते ही है |
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महामना मदन मोहन मालवीय :-
काशी विश्वविद्या लय की स्थापना की
1918 में कांग्रेस के दिल्ली अधिवेशन में महामना ने पहली बार देश को
सत्यमेब जयते का नारा दिया |वे कहते थे सत्य छिपाया जा सकता है पर हराया नही जा सकता है |
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सर्वपल्ली राधाकृष्णन :-
40 शाल शिक्षक रहे |कक्षात्रो में लोक प्रिय रहे
मदन मोहन मालवीय 1939  में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हटे ,तब उन्हाने तब
राधा कृष्णन को पद पर नियुक्त किये |
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डॉ. जाकिर हुसैन :-
सिर्फ 23 वर्ष की उर्म में ही जामिया मिलिया ईस्लामिक विश्वविद्यालय की स्थापना
दल के सदस्य  बने , वे देश के कई विश्व विद्यालय में कुलपती रहे  |
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रबिन्द्रनाथ  टैगोर :-
शान्तिनिकेतन की स्थापना की | यहाँ पढने के लिए एंट्रेंस टेस्ट नही होता ,बल्कि गुरुदेव अभ्यर्थियों को तौल लेते है ,
इसी के अधर पर दाखिल होता है |
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प्रेमचंद :-
जब तक शिक्षक रहे ,तिन तरह से शिक्षा दी ,
पहली -क्षात्रो का मन जान लेते थे , दूसरी -हर शिक्षा में गाव होता था ,तीसरा -
जो भी पढ़ते उस विषय को कहानी में बदल दते थे |
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विधान चन्द्र राय:-
विधान चन्द्र राय कोलकाता मेडिकल कॉलेज में बतौर ब्य्ख्यता क्षात्र को
पढाया , इंके जन्म दिन एक जुलाई को देश में चिकित्सा दिबस के रूप में मनाया जाता है |