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Wednesday, 8 July 2015

What is Universe ,ब्रह्मांड क्या है ?



प्रारंभिक स्वरूप

आज से 14 अरब वर्ष पूर्व ब्रह्मांड का कोई अस्तित्व नहीं था। पूरा ब्रह्मांड एक छोटे से अति सघन बिंदु में सिमटा हुआ था। अचानक एक जबर्दस्त विस्फोट – बिग बैंग (Big Bang) हुआ और ब्रह्मांड अस्तित्व में आया। महाविस्फोट के प्रारंभिक क्षणों में आदि पदार्थ (Proto matter) व प्रकाश का मिला-जुला गर्म लावा तेजी से चारों तरफ बिखरने लगा। कुछ ही क्षणोंमें ब्रह्मांड व्यापक हो गया। लगभग चार लाख साल बाद फैलने की गति धीरे-धीरे कुछ धीमी हुई। ब्रह्मांड थोड़ा ठंडा व विरल हुआ और प्रकाश बिना पदार्थ से टकराये बेरोकटोक लम्बी दूरी तय करने लगा और ब्रह्मांड प्रकाशमान होने लगा। तब से आज तक ब्रह्मांड हजार गुना अधिक विस्तार ले चुका है।

ब्रह्मांड का व्यापक स्वरूप

आकाशगंगाओं में केवल अरबों-खरबों तारे ही नहीं बल्कि धूल व गैस के विशाल बादल बिखरे पड़े हैं। सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर तक फैले इन बादलों में लाखों- तारों के पदार्थ सिमटे हुए हैं। इन्हें निहारिकाएँ (nebule) कहते हैं। ये सैकड़ों भ्रूण तारों को अपने गर्भ में समेटे रहती हैं। हमारी अपनी आकाशगंगा में भी हजारों निहारिकाएं हैं, जिनसे हर पल सैकड़ों तारे पैदा होते हैं। तारों की भी एक निश्चित आयु होती हैै। सूर्य जैसे मध्यम आकार के तारों की जीवन यात्रा लगभग 10 अरब वर्ष लम्बी है। सूर्य के आधे आकार के तारों की उम्र इससे भी दुगुनी होती है। पर भारी-भरकम तारों की जीवन-लीला कुछ करोड़ वर्षों में ही समाप्त हो जाती है। तारों का अंत सुपरनोवा विस्फोट के रूप में होता है।

आधुनिक खगोलशास्त्र का उदय

सन् 1929 में एडविन हब्बल और मिल्टन हुमासान ने एक महत्वपूर्ण खोज की। उन्होंने पाया कि दूरस्थ आकाशगंगाओं के प्रकाश में विशेष रहस्य छिपे हैं। हब्बल व हुमासान ने आकाशगंगाओं की दूरी और इनकी गति का तुलनात्मक अध्ययन किया। जिससे पता चला कि सुदूर अंतरिक्ष में बिखरी पड़ी अनगिनत आकाशगंगाएँ हमसे जितनी दूर हैं उतनी ही अधिक तेजी से वह और दूर भाग रही हैं। इस खोज ने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारी आकाशगंगा से परे न सिर्फ पूरा ब्रह्मांड व्यापक जाँच-पड़ताल की प्रतीक्षा में है बल्कि यह लगातार फैलता जा रहा है। इस खोज ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति की जड़ तक पहुँचने में सफलता दिलाई और यह तथ्य उभरकर सामने आया कि पूरा का पूरा ब्रह्मांड कभी एक अति सघन छोटे से बिंदु में सिमटा हुआ था। इसकी महाविस्फोट से शुरुआत हुई और तभी से यह लगातार फैलता जा रहा है। नजदीकी तारों का प्रकाश कुछ वर्षों में हम तक पहुँचता है और दूरस्थ आकाशगंगाओं का प्रकाश हम तक पहुँचने में अरबों साल लग सकते हैं। हम आकाशगंगाओं का जो दृश्य देखते हैं वहकरोड़ों-अरबों साल पहले का होता है क्योंकि प्रकाश इतने ही वर्षों में हम तक पहुँचता है।इस लंबी दूरी को व्यक्त करने के लिए प्रकाश वर्ष एक प्रचलित पैमाना है।

अंतरिक्षीय विकिरण

अंतरिक्षीय विकिरण के रूप में एक महत्वपूर्णखोज सन् 1964 में विल्सन व पेनजिऑस द्वारा की गई जिसने ब्रह्मांड को खंगालने की एक नई विधा हमारे हाथ में पकड़ा दी। विकिरण की सर्वव्यापकता व निरंतरता इस बात की गवाह है कि आकाशगंगाओं, इनके झुण्डों और ग्रहों आदि जैसी संरचना निर्मित होने के भी बहुत पहले अतीत काल से ही विकिरण चला आ रहा है। इस सहज प्रवाह के कारण हम विकिरण के गुणों की प्रामाणिक पहचान कर सकते हैं। इस कार्य को ठीक से करने के लिए सन् 1989 में पृथ्वी की कक्षा में एक कॉस्मिक बैकग्राउंड एक्सप्लोरर उपग्रह भेजा गया। यह प्रारंभिक ब्रह्मांड द्वारा उत्सर्जन का परीक्षण करनेमें सफल रहा। ब्रह्मांड का लगातार प्रसार हो रहा है और शुरुआती समय की अपेक्षा यह विकिरण सतरंगी पट्टी के सूक्ष्म तरंगीय हिस्से में दिखाई देने वाले तरंगदैध्र्य के परे लाल रंग की तरफ झुका था। विल्सन व पेनजिऑस द्वारा अन्वेषित सूक्ष्म तरंगीय आकाश हमारी अपनी आकाशगंगा के स्तर को छोड़कर पूरी तरह शांत था। लेकिन इस स्तर के ऊपर व नीचे के विकिरण में कोई उतार-चढ़ाव नहीं था। कॉस्मिक बैकग्राउंड एक्सप्लोरर यानि कोबे (ष्टह्रक्चश्व) उपग्रह ने बहुत हल्का उतार-चढ़ाव दर्ज किया है। फिर भी सूक्ष्म तरंगीय विकिरण हलचल मुक्त ही है। यह उतार-चढ़ाव- एक लाख में एक भाग-बिग बैंग के लगभग चार लाख साल बाद प्रारंभिक ब्रह्मांड के तापमान में हुए बदलाव का प्रभाव है। सन् 2001 में कोबे से 100 गुना अधिक संवेदनशील उपग्रह के सहारे वैज्ञानिकों ने अधिक आँकड़ों को समेटे एक सूक्ष्म तरंगीय आसमान का मानचित्र तैयार किया। इसमें भी बहुत हल्का उतार-चढ़ाव पाया गया, जो नवजात ब्रह्मांड में पदार्थों के इकट्ठे होने की ओर संकेत करता है। अरबों साल में ये पदार्थ सघन हुए और गुरुत्व बल के प्रभाव से चारों तरफ के अधिकाधिक पदार्थों को अपनी ओर खींचने लगे। यह प्रक्रिया आगे बढ़ते हुए आकाशगंगाओंतक जा पहुँची। नजदीकी आकाशगंगाओं के समूह से अन्तहीन जाल जैसी संरचनाएं बन गई। यह बीज ब्रह्मांड के जन्म के समय ही पड़ा और काल के प्रवाह में अरबों-खरबों आकाशगंगाओं का वटवृक्ष खड़ा हुआ जिन्हें आज हम देख रहे हैं।उपग्रहीय अवलोकन ने कुछ और अज्ञात, अनजाने तथ्यों के साथ-साथ अदृश्य पदार्थ के अस्तित्व को भी प्रमाणित किया।

खोज और परिणाम:-

आइए जानें क्या है यह सर्न, खोज और परिणाम...
नई दिल्ली: दुनियाभर के वैज्ञानिक सबसे बड़े टेस्ट में पास हो गए हैं। जिनीवा में सर्न के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने हिग्स बोसॉन कण जिन्हें आमतौर पर गॉड पार्टिकल्स भी कहा जाता है उसकी मौजूदगी के बेहद ठोस संकेत हासिल कर लिए हैं।

वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने प्रयोग के दौरान 123 जीईवी मास यानी द्रव्यमान के बोसॉन पार्टिकल्स की मौजूदगी दर्ज की है यानी उस रहस्यमय कण का ठोस अहसास उन्हें हो गया है जिसके लिए जिनीवा में धरती के सौ मीटर नीचे यह महाप्रयोग चल रहा है।

जहां तक सवाल वैज्ञानिकों के दावे के सही होने का है तो हिग्स बोसॉन यानी गॉड पार्टिकल के इस संकेत को 5 तक के स्केल पर 4.9 सिग्मा बताया गया है जिसका मतलब ये हुआ कि दस लाख मामलों में चूक की गुंजाइश सिर्फ एक बार है। यही वजह है कि जैसे ही सर्न में इस बात का ऐलान हुआ वहां मौजूद वैज्ञानिकों में खुशी की लहर दौड़ गई।

दरअसल वैज्ञानिक इस खोज को लेकर बेहद उत्साहित हैं क्योंकि हिग्स बोसॉन की मौजूदगी ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़े रहस्यों पर से पर्दा उठाने में मददगार साबित होगा। अब इस बात को वैज्ञानिक तरीके से समझा जा सकेगा कि धरती चांद सितारे और दूसरी चीजें अपने वजूद में कैसे आईं। लेकिन यह जानना कम जरूरी नहीं कि गॉड पार्टिकल की जरूरत ही क्यों पड़ी।

दरअसल, अभी तक विज्ञान जिस थ्योरी पर काम करता है उसके मुताबिक सारे पदार्थ अणु परमाणु और दूसरे छोटे कणों से मिलकर बने हैं जिन्हें हम देख पाते हैं।
− इसे स्टैंडर्ड मॉडल कहा जाता है लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी ये है कि इससे इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि पदार्थ के सूक्ष्म कणों को द्रव्यमान कैसे मिलता है।
यानी इन कणों के भीतर क्या होता है, इसी के जवाब में 1964 में छह वैज्ञानिकों ने हिग्स सिस्टम की थ्योरी रखी।

आखिर द्रव्यमान क्यों ज़रूरी है-
दरअसल, यही वो नाप है जिससे पता चल सकता है कि वो चीज कितने सारे सूक्ष्म कणों से मिलकर बनी है
और अगर द्रव्यमान नहीं हो तो किसी भी पदार्थ को बनाने वाले सारे कण प्रकाश की रफ्तार से घूमते रहेंगे
और दुनिया जिस रूप में आज मौजूद है वैसी नहीं होती।
हिग्स थ्योरी के मुताबिक पूरा ब्रह्मांड एक ऐसा क्षेत्र है जिसके जरिए पार्टिकल्स मास या द्रव्यमान लेते हैं। ब्रह्मांड की तुलना किसी बर्फीले मैदान से की गई है। जहां आपकी चाल धीमी हो जाती है।

और अब आइए ब्रह्मांड की बात करते हैं-
मौजूदा सिद्धातों के मुताबिक ब्रह्मांड की शुरूआत एक महाविस्फोट से हुई जिसे बिगबैंग कहा गया। यही वो पल है जब से समय या टाइम की शुरूआत भी मानी जाती है।
लाखों अरबों साल पहले हुए उस धमाके के बाद ब्रह्मांड बना। पदार्थ यानी मैटर वजूद में आए जिनसे आगे चलकर आकाशगंगाओं से लेकर तारे ग्रह और उपग्रह जैसी चीजें बनी।

नए प्रयोगों से ये बात साबित हो गई है कि हमारे ब्रह्मांड का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में अगर हम टाइम मशीन को एकदम पीछे ले जाकर शुरुआती लम्हे पर ले जाकर रोके तो पूरा ब्रह्मांड सिर्फ एक बिंदु सरीखा होगा।
 
यही वजह है कि महाप्रयोग के लिए भी उसी माहौल की जरूरत पड़ी जो बिगबैंग के वक्त रहा होगा। लेकिन ये सब करना इतना आसान भी नहीं है। स्विटज़रलैंड और फ्रांस की सीमा पर ज़मीन के भीतर दुनिया के सबसे बड़े सर्कुलर ऐटम स्मैशर में मौजूद वैज्ञानिक उन कणों की मौजूदगी साबित करने में दिन रात लगे रहे जिन्हें वैज्ञानिकों ने गॉड पार्टिकल का नाम दे रखा है।

इसके लिए वैज्ञानिक बीते 4 साल से प्रकाश की रफ्तार से चल रही किरणों को एक दूसरे से टकराकर उन बेहद छोटे हिग्स बोसॉन का वजूद तलाशते रहे जिन्हें गॉड पार्टिकल कहा जा रहा है। ये खोज इतनी अहम है कि ऐलान से पहले वैज्ञानिकों को कई बार सोचना पड़ा।

दुनिया के इस सबसे बड़े महाप्रयोग में सौ से ज़्यादा देशों के करीब 8000 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया और इसपर 10 अरब डॉलर से भी ज़्यादा ख़र्च हुए। एनडीटीवी शुरुआत से ही इस प्रयोग पर नज़र रखे हुए था और बीच बीच में सर्न जाता रहा है।
 
इतनी रफ्तार से ये काम पहले कभी नहीं हुआ- प्रोटोन की दो किरणें आपस में टकराईं और कंट्रोल रूम में बैठे
वैज्ञानिक एक−दूसरे को बधाइयां दी। करीब 10 खरब डॉलर की लागत वाले लार्ज हैड्रोन कोलाइडर नाम की
इस महामशीन में मौजूदा ताकत के मुकाबले तीन गुना रफ्तार से जब प्रोटांस आपस में टकराए तो 7 ट्रिलियन इलेक्ट्रॉन वोल्ट के बराबर ऊर्जा दर्ज की गई।

ये हालात प्रयोग को बिगबैंग यानी महाविस्फोट के बिलकुल करीब ले जाते हैं जिसके बाद हमारा पूरा ब्रह्मांड वजूद में आया। इसके लिए जिस मशीन का इस्तेमाल हुआ उसे नाम दिया गया लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स।

ये छोटे स्तर पर ब्राह्मांड की उत्पत्ति जैसा माहौल पैदा करती है इसके लिए − ज़मीन से 175 मीटर नीचे 27 किलोमीटर लंबी एक सुरंग बनाई गई। वहां का तापमान शून्य से 270 डिग्री नीचे रखा गया। सुरंग में प्रकाश की रफ्तार से चार्ज्ड सबएटॉमिक पार्टिकल्स को तोड़कर द्रव्य यानी मैटर और ऊर्जा यानी एनर्जी के रिश्ते को जानने की कोशिश की गई।

सर्न यानी यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च के इस महाप्रयोग में भारत ने भी करीब चार करोड़ डॉलर के उपकरण भेजे हैं। जिनमें वो दो मैग्नेटिक आर्म्स भी हैं जिनपर पार्टिकल एक्सलरेटर को रखा गया।

भारत की इस भागेदारी को बेहद सम्मान के साथ देखा जा रहा है। भारत ने 3 करोड़ डॉलर का हाइटेक साज़ोसामान और सौ साल से ज़्यादा मियाद की विशेषज्ञों की सेवाएं भी दान की हैं। हिग्स बोसॉन की तलाश में  भारतीय वैज्ञानिकों ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। आख़िर, हिग्स बोसॉन में बोसॉन का नाम भी तो भारतीय वैज्ञानिक सत्येन नाथ बोस के नाम पर है।

इतना ही नहीं ब्रह्मांड की उत्पत्ति से भारतीय दर्शन के गहरे जुड़ाव की याद दिलाने के लिए भारत ने नटराज की ये मूर्ति भी भेंट की है जो चोल काल की बताई जाती है। तांडव करते शिव से बेहतर ब्रह्मांड की उत्पत्ति और विनाश को भला कौन समझ सकता है।

हमारी आकाशगंगा में 100 अरब ग्रह मौजूद

वॉशिंगटन: एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि हमारी आकाशगंगा में कम से कम 100 अरब ग्रह हैं।
इस अध्ययन पर भरोसा किया जाए तो हर तारे के लिए कम से कम एक ग्रह है और ज्यादातर ग्रहों में जीवन की संभावना हो सकती है।
पूर्व की धारणा से उलट, नए अध्ययन में खगोलविदों ने कहा है कि ग्रहों के साथ साथ तारा प्रणालियां पूरे ब्रह्मांड में फैली हैं।
नासा का कहना है कि कैलिफोर्निया इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के खगोलविदों ने केपलर 32 नामक तारे की कक्षा में मौजूद ग्रहों तथा हमारी आकाशगंगा के ग्रहों का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रणालियों के अध्ययन के दौरान यह निष्कर्ष निकाला।
केलटेक में खगोलविज्ञान के सहायक प्राध्यापक जॉन जॉन्सन इस अध्ययन के सह लेखक भी हैं। उन्होंने कहा कि हमारी आकाशगंगा में कम से कम 100 अरब ग्रह मौजूद हैं। यह चौंकाने वाली बात है। ग्रह व्यवस्था का पता नासा के केपलर स्पेस टेलिस्कोप की मदद से लगाया गया था और इस व्यवस्था में पांच ग्रह होते हैं। केपलर 32 की कक्षा में मौजूद दो ग्रहों की खोज अन्य खगोलविद पूर्व में कर चुके हैं।
केलटेक की टीम ने शेष तीन ग्रहों की पुष्टि की और फिर पांच ग्रहों की प्रणाली का विश्लेषण कर इसकी तुलना केपलर द्वारा खोजी गई अन्य प्रणालियों से की। (एजेंसी

2 comments:

  1. क्या बिग बैंग से पहले स्पेस था

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  2. क्या बिग बैंग से पहले स्पेस था

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