जाने अचार्य चाणक्य की ''चाणक्यनीति "
1)मुर्ख शिष्य को उपदेश देने से ,
कर्कशा स्त्री का भरण पोषण से और दुःखियों का संपर्क रखने से ,
समझदार मनुष्य को भी दुःखी होना परता है
2) जिस मनुष्य की स्त्री अछि नही है ,
नौकर उत्तर देने वाला है
,जिस घर में सांप रहता हो ,तो निश्तित है
,किसी रोज उसकी मुर्त्यु होगी ,
3)अप्पति काल के लिए धन ,
और धन से बढ़कर स्त्री की रक्षा करनी चाहिए ,
पर धन स्त्री से बढ़कर अपनी रक्षा करनी चाहिए ।
4)जिस देश में ना सम्मान हो न रोजी हो ,
ना कोई भाईबंधु हो ,
ना विद्या का आगम हो ,
वहा निवेश नहीं करना चाहिए ।
5) जिसमे रोज़ी ,भय ,लज्जा ,उदारता ,और त्यागशीलता ,
ये पांच विधमान न हो ,ऐसी मनुष्य से दोस्ती नहीं करनी चाहिए ।
6)सेबा कार्य उपस्थित होने पर सबको की
आपत्तिकाल में मित्रो की
, दुःख में बान्धवो की ,
और धन से नष्ट हो जाने पर स्त्री की परीक्षा की जाती है ।
7) जो ब्यक्ति निश्चत बस्तु को छोड़कर ,
अनिश्चित बस्तु की ओर दोड़ता है ।
तो उसकी निश्चित बस्तु नष्ट हो जाती है ,
और अनिश्चित बस्तु बहले से नष्ट थी।
8) नदियो का ,
सस्त्रधारीको का ,
सिंह वाले पशु का ,
राजकुल के लोगो का ,
विस्वास नही करना चाहिए ।
9) स्त्री में पुरषो की अपेक्षा दुना आहार ,
चौगुनी लज्जा ,
छः गुणी साहस ,
और आठगुनि वासना रहता है ।
10) झूठ बोलना ,
एकाएक कोई काम कर बैठना ,
नखरे करना ,
मूर्खता करना ,
लालच करना ,
वपवित्र रहना ,
और निर्दयता का बर्ताव करना ,
ये स्त्री के स्वाभाविक दोष है ।

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