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Sunday, 29 May 2016

जाने अचार्य चाणक्य की ''चाणक्यनीति " -1

जाने अचार्य चाणक्य की ''चाणक्यनीति "
1)मुर्ख शिष्य को उपदेश देने से , 
कर्कशा स्त्री का भरण पोषण से और दुःखियों का संपर्क रखने से ,
समझदार मनुष्य को भी दुःखी होना परता है

2) जिस मनुष्य की स्त्री अछि नही है ,
 नौकर उत्तर देने वाला है 
,जिस घर में सांप रहता हो ,तो निश्तित है 
,किसी रोज उसकी मुर्त्यु होगी ,

3)अप्पति काल के लिए धन , 
और धन से बढ़कर स्त्री की रक्षा करनी चाहिए ,
 पर धन स्त्री से बढ़कर अपनी रक्षा करनी चाहिए ।

4)जिस देश में ना सम्मान हो न रोजी हो ,
ना कोई भाईबंधु हो ,
 ना विद्या का आगम हो ,
वहा निवेश नहीं करना चाहिए ।

5) जिसमे रोज़ी ,भय ,लज्जा ,उदारता ,और त्यागशीलता ,
ये पांच विधमान न हो ,ऐसी मनुष्य से दोस्ती नहीं करनी चाहिए ।

6)सेबा कार्य उपस्थित होने पर सबको की 
आपत्तिकाल में मित्रो की 
, दुःख में बान्धवो की , 
और धन से नष्ट हो जाने पर स्त्री की परीक्षा की जाती है ।

7) जो ब्यक्ति निश्चत बस्तु को छोड़कर , 
अनिश्चित बस्तु की ओर दोड़ता है ।
तो उसकी निश्चित बस्तु नष्ट हो जाती है , 
और अनिश्चित बस्तु बहले से नष्ट थी।

8) नदियो का ,
सस्त्रधारीको का ,
 सिंह वाले पशु का ,
राजकुल के लोगो का ,
विस्वास नही करना चाहिए ।

9) स्त्री में पुरषो की अपेक्षा दुना आहार , 
चौगुनी लज्जा , 
छः गुणी साहस ,
और आठगुनि वासना रहता है ।

10) झूठ बोलना ,
 एकाएक कोई काम कर बैठना ,
 नखरे करना ,
 मूर्खता करना , 
लालच करना ,
 वपवित्र रहना , 
और निर्दयता का बर्ताव करना ,
ये स्त्री के स्वाभाविक दोष है ।

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