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Thursday, 12 May 2016

चाणक्य निति 6

                
    सब औसधि में अमृत प्रधान है ,सब सुखो में भोजन प्रधान है ।
    सब इन्द्रियो में नेत्र प्रधान है ,और सब अंगो में मस्तिष्क प्रधान है
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    बिद्यार्थी ,नोकर , राही ,भयभीत आदमी ,भण्डारी और द्वारपाल ,
      इन सबो को सोते हुए भी जग देना चाहिए ।
      सांप ,राजा ,बर्रे ,बालक ,परया कुत्ता ,और मुर्ख मनुष्य
           इन्हें सोते हुए न जगाये ।
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   जिसके नाराज होने से कोई डर नही ,प्रसन्न होने से कुछ आमदनी नही ,।
       ना वह कुछ दे सकता है ,ना कुछ कर सकता है, 
        तो उनके रूस्त होने से क्या फर्क पड़ता है ।
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     धैर्य से दरिद्रता की ,सफाई से ख़राब बस्त्र की ,
       गर्मी से कुंदन की 
       और शील से कुरूपता भी सुन्दर लगते है ।
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 धनहीन मनुष्य हिन् नही कहा जा सकता ,वास्तब में वही धनि है ।
 किन्तु जो मनुष्य विद्या रुपी रत्न से हिन् है , वह सभी बस्तु से हिन् है ।
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  कबि क्या नही देख सकता है ,स्त्री क्या नही कर सकती है ,
    सराबी क्या नही बक सकता है
     और कौए क्या नही खा सकते है ।
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    लोभी का सत्रु है यायक ,मुर्ख का सत्रु है उपदेश देने वाला ,
    कुलटा स्त्री का सत्रु है उसका पति 
        और चोरो का सत्रु है चंद्रमा ।
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जिसके पास स्वांग बुद्धि नही है उसे क्या कोई सास्त्र सीखा देखा देगा ।
 जिसकी दोनों आँखे फुट गई है उसके सीसे क्या दिखा देगा ।
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 बड़े ,बूढ़े से द्वेष करने से मृत्यु होती है ,
   सत्रु से द्वेष करने पर धन का नाश होता है ।
 राजा से द्वेष करने से सर्वनाश होता है 
और ब्राह्मण से द्वेष करने पर कुल का नाश हो जाता है ।
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  दान शक्ति ,मीठी बात करना ,धर्य धारण करना ।
    समय पर उचित अनुचित का निणर्य करना ,
    ये गुण स्वाभाविक सिद्ध है ,सिखने से नही आते है ।
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      गृहहस्त के जंजाल में फसे ब्यक्ति को बिद्या नही आ सकती है ।
       मंशा भोजि के हिर्दय में दया नही आती ,
      लोभी के सच्चाई नही आती 
    और कामी पुरुष के पास पवित्रता नही आती ।
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  दुर्जन ब्यक्ति को चाहे कितने भी उपदेश क्यों नही दे दिया जाइ ,
    वह अच्छी दशा में नही पहुँच सकता है ,
   नीम के पेड़ को चाहे जड़ से सर तक घी और सहद से क्यों न सिच दिया जाये 
     फिर भी उसमे मीठा पन नही आ सकता है ।
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   जिसके हिर्दय में दया ,भाव , ये सब बातें नही है ,
   वह सैकड़े तीर्थ स्थान का क्यों न भरमन किया हो 
      उसे शांति और सुद्ध नही हो सकता है ।
    जैसे मदिरा का पात्र अग्नि में झुलसने के बाद भी पवित्र नही हो सकता ।
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 संतो के प्रबचन से दुष्ट आदमी सज्जन हो जाते है ।
  पर सज्जन उनके संग से दुष्ट नही होती है ।
   फूल के सुगंधि को मिट्टी अपनाती है 
  ,पर फूल मिट्टि की सुगंधि को नही अपनाते है ।
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  शरीर क्षण भंगुर है ,धन भी सदा नही रहने वाला है ,
    मृत्यु बिलकुल समीप विद्धमान है ,
     इसलिए धर्म का संग्रह करो ।
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  जो पुरुष पराई स्त्री को माता के सामान समझता है ,
परया धन मिट्टी के समान समझता है ,
 अपने तरह सब के सुख दुःख को समझता है ,
 वही पण्डित है ।
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 बिना सोचे समझे खर्च करने वाला ,
 अन्याय और झगड़ालू करने वाले 
  और सब तरह के स्त्री के लिए बैचेन रहने वाला मनुष्य
     देखते देखते चौपट हो जाते है ।
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                             धीरे धीरे एक एक बून्द से घरा भरता है । 
                          इसी तरह बिद्या ,धन और धर्म पर लागु होती है 
                        ,इस बस्तु के संग्रह में जल्दी न करे ,
                      धीरे धीरे कर के कभी ये पूरा हो जायेगा ।
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