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Thursday, 12 May 2016

जाने चाणक्य निति 4

                              ॐ ॐ ॐ चाणक्य निति  ४ ॐ ॐ ॐ
                                                     **
       परदेश में बिद्या मित्र है ,
        घर में स्त्री मित्र है, रोगी को दावा मित्र है ,
         मरे हुए मनुय का धर्म मित्र है।                                  

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      समुन्द्र में बर्षा ब्यर्थ है ,
        तृप्त को भोजन ब्यर्थ है ,
        धनवान को धन देना ब्यर्थ है ,
      और दिन के समय दीपक जलना ब्यर्थ है ।

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   मेघ के जल के सामान कोई जल नही है
   आत्मबल के सामान कोई बाल नही है ,
     नेत्र के सामान किसी में तेज नही ,
    और अन्न के सामान कोई प्रिय बस्तु नही है।

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        लक्ष्मी चंचल है ,
    प्राण भी चंचल है  ,
    काहा तक कहे तो सारा संसार चंचल है  ,
    बस केबल धर्म अचल और अटल है।

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  भ्रमण करने वाला राजा पूजा जाता है ।
    भ्रमण करता हुआ ब्राम्हण भी पूजा जाता है ,
 भ्रमण करने योगी पूजा जाता है
 किन्तु भ्रमण करने वाली स्त्री नष्ट हो जाती है ।

      ***
 जैसा होनहार होता है ,
  उसी तरह की बुद्धि हो जाती है ,
       उसी तरह के जैसा कार्य होता है ,
    सहायक भी उसी तरह के मिल जाते है ।

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     मनुष्य स्वांग कर्म करता है ,
    और स्वांग उसका शुभसुभ फल भोगता है
      , वह स्वांग संसार का चक्कर काटता है ,
       और  समय पाकर छुटकारा भी पा जाता है ।

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      राज्य के पाप को राजा ,
      राजा का पाप पुरोहित ,
      स्त्री का पाप उसके पति ,
   और शिष्य के द्वारा किये हुए पाप को गुरु भोगता है ।

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       लालची को धन से ,
      घमंडी को हाथ जोड़कर ,
    मुर्ख को उसके मनवाली करके ,
        और यथार्थ बात से पंडित को बस में करे ।

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      समझदार मनुष्य को चाहिए की ,
     वह बगुले की तरह चारो ओर से इन्द्रियों को समेटकर ,
       और देश काल के अनुशार ,
      अपना बाल देखकर तब अपना कार्य साधे ।

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  अधिक भूख रहते हुए भी कम भोजन में संतुष्ठ रहना ,
   सोते समय होस ठीक रखना ,हल्की नींद सोना ,
     स्वामी भक्ति और बहादुरी ये गुण कुत्ते से सीखना चाहिए ।

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      भरपूर थकावट रहने पर भी अपना काम करना ,
         सर्दी गर्मी का परवाह ना करना ,
      सदा संतोष रहकर जीबन यापन करना ,
       ये तिन गन गधे से सीखना चाहिए ।

         ---  :ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ :-----

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