यदि मनुष्य उज्जवल काम करके एक दिन भी जिन्दा रहे
तो उसका जीबन सफल है
,यदि वह इहलोक और परलोक क़े बिरुध्य कार्य करके एक पल भी जिए
तो वह जीना अच्छा नही है ।
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जो बात बीत गई उसके लिए सोच न करे ।
और न आगे होने वाली बात की चिंता करे ,
समझदार लोग सामने की बात को ही हल करने की चिंता करते है ।
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आयु ,कर्म ,संपत्ति ,विद्या और मरण ये बातें तभी तय हो जाती है ,
जब वह माँ के गर्भ में रहते है ।
जब वह माँ के गर्भ में रहते है ।
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जिसके हृदय में स्नेह है ,उसको भय है ,
जिसके पास स्नेह है ,उसको दुःख है
जिसके पास स्नेह है उसी के पास तरह तरह के दुःख रहते है ।
जिसके पास स्नेह है उसी के पास तरह तरह के दुःख रहते है ।
जो इसे त्याग दे वह सुख रहता है।
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जो मनुष्य भविष्य में आने वाली विपत्ति से होसियार है ,
और जिसकी बुद्धि समय समय पर काम कर जाती है ,
ये मनुष्य आनंद से आगे बढ़ते जाते है ,इसके बिपरीत ,
जो भाग्य में लिखा होगा वो होगा ,जो यह सोच कर बैठने वाला है,
ये मनुष्य आनंद से आगे बढ़ते जाते है ,इसके बिपरीत ,
जो भाग्य में लिखा होगा वो होगा ,जो यह सोच कर बैठने वाला है,
इनका नाश निस्चित है।
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नीच प्रबति के लोग औरों के यश रुपी अग्नि से जलते रहते है ,
उस पद तक पहुँचने की सामर्थ नही है ,
उस पद तक पहुँचने की सामर्थ नही है ,
इसलिए वे उनकी निंदा करने में लग जाते है।
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अपने मन के अनुशार सुख किसे मिलता है ।
क्योकि संसार का सुख काम देव के अधीन है ,
इसलिए जितना सुख मिले उतने में ही खुश् रहे ।
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जैसे हजारों गायों के बिच में बछड़ा ,
अपने माँ के पास पहुच जाता है ,
ठीक उसी तरह प्रत्येक मनुष्य का कर्म ,
अपने स्वामी के पास पहुच जाता है ।
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जैसे पृथ्बी को खोदने से जल निकल जाता है ,
उसी तरह गुरु के पास बिद्यमान बिद्या ,
उसकी सेबा करने से प्राप्त हो जाता है ।
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यद्दीपी प्रत्येक मनुष्य को कर्मानुसार फल प्राप्त होता है ,
और बुद्धि भी कर्मानुसार ही बनती है ।
फिर भी बुद्धिमान लोग अच्छी तरह सोच समझ कर कोई काम करता है।
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ऐसे माना जाये तो पृथ्बी पर तीन ही रत्न है ,
अन्न ,जल और मीठी बातें ।
पर बेबकुप लोग पत्थर को ही रत्न मानते है ।

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