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Thursday, 28 May 2015

क्या नास्त्रेदोमस की की गई साड़ी भयिष्यवाणी सही हो सकता है ,इसके द्वरा की गई इस युग की भविष्यवाणी

                -: क्या नास्त्रेदोमस की की गई साड़ी भयिष्यवाणी सही हो सकता है  ,इसके
               द्वरा की गई इस युग की भविष्यवाणी:-
Referenhindi.webdunia.com/sanatan-dharma-article/nostradamus-predicted-115012200021_3.html






संकलन : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' हिन्दू शास्त्रों के अनुसार अनिश्चित भविष्य के बीच एक निश्चित या तय भविष्य की रेखा चलती रहती है अर्थात भविष्य में कुछ घटनाओं का घटना तय है तो कुछ के बारे में कुछ भी नहीं कहा जाता सकता। भविष्य का निर्माण एक व्यक्ति, समूह या संगठन पर ही निर्भर नहीं है बल्कि इसमें प्राकृतिक तत्वों का भी योगदान रहता है। संभावनाएं अनंत हैं, लेकिन कुछ संभावनाओं के बारे में पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है। भारत में पैदा होगा दुनिया का 'मुक्तिदाता' आप नीचे खड़े हैं तो यह नहीं देख पा रहे हैं कि 10 मिनट बाद आपके क्षेत्र में बारिश होने वाली है, लेकिन यदि आप किसी ऊंचे स्थान पर खड़े हैं तो आप दूर कहीं हो रही बारिश को देखकर नीचे खड़े लोगों से कह सकते हैं कि 10 मिनट बाद बारिश होने वाली है, फिर वे चाहे आपकी बातों पर विश्वास करें या न करें। 10 मिनट बाद ही उन्हें इसकी सचाई का पता चलेगा।
इसी तरह भविष्य देखने वाले कहीं ओर खड़े हैं और हम सब नीचे... संभावनाएं अनंत हैं और उन्हीं अनंत संभावनाओं में से किसी एक संभावना को पकड़कर कोई भविष्यवाणी करता है। आपकी मौत किस तरह होगी इसकी संभावनाएं अनंत हैं लेकिन आपके अतीत और वर्तमान का अच्छे से निरीक्षण करके शायद यह बताया जा सकता है कि आप हार्टअटैक से मरेंगे। यह बात अलग है कि अटैक आने के बाद आप बच गए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भविष्यवाणी गलत थी। आओ जानते हैं कि
नास्त्रेदमस ने वे कौन-कौन-सी भविष्यवाणियां की हैं जिनके बारे में जानने के लिए आप जरूर उत्सुक होंगे। ऐसी ही कुछ 5 भविष्यवाणियों को हम छांटकर लाए हैं आपके लिए। अगले पन्ने पर पहली भविष्यवाणी...
तृतीय विश्वयुद्ध होगा या नहीं? आजकल सभी के मन में यह सवाल है कि तीसरा विश्वयुद्ध होगा या नहीं। बहुत से तो दावा करते हैं कि यह अवश्य होगा। सरकार दो तरह से बनती है एक हथियारों की ताकत से और दूसरी बहुमत की ताकत से। विश्व में ऐसे कितने लोग हैं, जो यह सोचते हैं कि तृतीय विश्वयुद्ध होगा और कितने सोचते हैं कि नहीं होगा। संभवत: आप भी यही कहेंगे कि अधिकतर लोग सोचते हैं कि होगा। सवाल है कि क्यों ऐसा सोचते हैं, तो जवाब है कि नास्त्रेदमस सहित कई भविष्यवक्ता कह गए हैं कि होगा, तो होगा।
भगवान बुद्ध कहते हैं कि विचार ही वस्तु और घटना का रूप ले लेता है। आज आप जो हैं वह आपके विचारों का परिणाम है। आप और हम अधिकतर लोगों की नकारात्मक सोच को बदल नहीं सकते। नकारात्मक सोच स्वत: आती है जबकि सकारात्मक सोच को लाना पड़ता है। हॉलीवुड में पहले न्यूयॉर्क पर हमले की फिल्में बनती थीं। सभी अमेरिकी इन फिल्मों को देखकर आशंकित रहने लगे थे और अंतत: एक दिन हमला हो गया। लॉ ऑफ एक्ट्रेशन (Law of Attraction) के नियम से सभी परिचित होंगे।
नास्त्रेदमस ने 1503 में अपनी किताब सेंचुरी में लिखा है, 'एक पनडुब्बी में तमाम हथियार और दस्तावेज लेकर वह व्यक्ति इटली के तट पर पहुंचेगा और युद्ध शुरू करेगा। उसका काफिला बहुत दूर से इतालवी तट तक आएगा।' आगे वे लिखते हैं- 'एक देश में जनक्रांति से नया नेता सत्ता संभालेगा (यह मिस्र में हो चुका है)। नया पोप दूसरे देश में बैठेगा (यह भी हो चुका है।)। मंगोल (चीन) चर्च के खिलाफ युद्ध छेड़ेगा। (चीन का अमेरिका के खिलाफ छद्मयुद्ध तो जारी है ही)। नया धर्म (इस्लाम) चर्च के खिलाफ भारी मारकाट करते हुए इटली और फ्रांस तक जा पहुंचेगा, तब तृतीय युद्ध शुरू होगा।' 'एशिया का महान व्यक्ति समुद्र और जमीन पर विशाल सेना लेकर नीले, हरे और सलीबों को वह मौत के घाट उतार देगा।' (सैंचुरी-6-80)। इसी सैंचुरी का 24 और 25वां छंद भी भयानक युद्ध का वर्णन करता है।

**धर्म लाएगा तबाही : नास्त्रेदमस ने की एक बहुत ही महत्वपूर्ण भविष्यवाणी : 'एक बुरा और कुख्यात व्यक्ति मोसोपोटामिया (इराक) का तानाशाह बनेगा और अनेक प्रबल मित्र भी पटाएगा। अनेक देशों को वह युद्ध की आग में झूलसा देगा।' (सैंचुरी- VII-70)। कई विद्वान इस भविष्यवाणी को सद्दाम हुसैन से जोड़कर देखते हैं, जो वर्तमान में यह अल बगदादी पर सटीक बैठती है। 'कुछ ही समय बाद धर्म बांटेगा लोगों को। काले और सफेद तथा दोनों बीच वाले, लाल और पीले अपने-अपने अधिकारों के लिए भिड़ेंगे। रक्तपात, भूकंप, बीमारियां, अकाल, युद्ध और भूख से मानवता बेहाल होगी।' (सैंचुरी- VII-10) देखा जाए तो वर्तमान के हालात ऐसे ही हैं। 'वे गलत नक्शे दिखाएंगे, स्मारकों के गड़े मुर्दे उखाड़े जाएंगे, संप्रदाय बढ़ते जाएंगे और महान दर्शन के बजाय सफेद को काला व समृद्धि को सोना समझने लगेंगे।' (सैंचुरी-7-14) 'सलीब की सेना के पड़ाव डालने से पहले इस्माइली चौकन्ने हो जाएंगे और चारों ओर से हमला कर देंगे, एक जहाज पर दस जहाजों का धावा होगा।' (सैंचुरी-9-43) 'लाल के विरुद्ध संप्रदाय इकट्ठा होंगे तथा आग, पानी, लोहा व रस्सी को शांति नष्ट कर देगी। षड्यंत्रकारी मौत के घाट उतार दिए जाएंगे, बचेगा फिर भी जो दुनिया में तबाही लाएगा।' (सैंचुरी-9-51)। इसी भविष्यवाणी के अगले छंद में कहा गया है कि एक ओर से शांति आएगी और दूसरी ओर से युद्ध। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। 'सागरों के नाम वाला धर्म चांद पर निर्भर रहने वालों के मुकाबले तेजी से पनपेगा और उसे भयभीत कर देंगे, 'ए' तथा 'ए' से घायल दो लोग।' (x-96)
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उल्कापिंड से धरती की तबाही? बहुत से वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक अब ज्यादातर लोगों को यह डर सताने लगा है कि आसमान से कोई विशालकाय उल्कापिंड गिरेगी और धरती पर तबाही का मंजर खड़ा कर देगी।
नास्त्रेदमस ने अपनी एक भविष्यवाणी में कहा है कि जब तृतीय युद्ध चल रहा होगा उस दौरान चीन के रासायनिक हमले से एशिया में तबाही और मौत का मंजर होगा, ऐसा जो आज तक कभी नहीं हुआ।
प्रलय की नई तारीख : उल्कापिंड करेगा धरती को तबाह
नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी के विश्लेषणों के अनुसार जब तृतीय विश्वयुद्ध चल रहा होगा उसी दौरान आकाश से आग का एक गोला पृथ्वी की ओर बढ़ेगा और हिन्द महासागर में आग का एक तूफान खड़ा कर देगा। इस घटना से दुनिया के कई राष्ट्र जलमग्न हो जाएंगे। इस उल्कापिंड से श्रीलंका, मालदीव, ब्रुनेई, इंडोनेशिया, न्यूगिनी, फिलीपींस, कम्बोडिया, थाईलैंड, बर्मा, बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, मिश्र, सऊदी अरब आदि देश
**महान राजनेता का उदय : नास्त्रेदमस मानते हैं कि संघर्ष, आपदा, युद्ध और तबाही को कुचलने वाला महान नेता जरूर आएगा जिसके कारण दुनिया में शांति की स्थापना होगी।
'तीन ओर घिरे समुद्र क्षेत्र में वह जन्म लेगा, जो बृहस्पतिवार को अपना अवकाश दिवस घोषित करेगा। उसकी प्रशंसा और प्रसिद्धि, सत्ता और शक्ति बढ़ती जाएगी और भूमि व समुद्र में उस जैसा शक्तिशाली कोई न होगा।' (सेंचुरी 1-50वां सूत्र) 'पांच नदियों के प्रख्यात द्वीप राष्ट्र में एक महान राजनेता का उदय होगा। इस राजनेता का नाम 'वरण' या 'शरण' होगा। वह एक शत्रु के उन्माद को हवा के ‍जरिए समाप्त करेगा और इस कार्रवाई में 6 लोग मारे जाएंगे।' (सेंचुरी v-27) 'शीघ्र ही पूरी दुनिया का मुखिया होगा महान 'शायरन' जिसे पहले सभी प्यार करेंगे और बाद में वह भयंकर व भयभीत करने वाला होगा। उसकी ख्याति आसमान चूमेगी और वह विजेता के रूप में सम्मान पाएगा।' (v-70) 'एशिया में वह होगा, जो यूरोप में नहीं हो सकता। एक विद्वान शांतिदूत सभी राष्ट्रों पर हावी होगा।' (x-75) इस दौरान 'एलस' नाम से एक और व्यक्ति होगा जिसकी बर्बरता के बारे में लिखा गया है। 'उसका हाथ अंतत: खूनी एलस (ALUS) तक पहुंच जाएगा। समुद्री रास्ते से भागने में भी नाकाम रहेगा। दो नदियों के बीच सेना उसे घेर लेगी। उसके किए की सजा क्रुद्ध काला उसे देगा।' -(6-33) 'पैगंबर के कुल नाम के अंतिम अक्षर से पहले के नाम वाले सोमवार को अपना अवकाश दिवस घोषित करेगा। अपनी सनक में वह अनुचित कार्य भी करेगा। जनता को करों से आजाद कराएगा।' (1-28) पैगंबर तो एक ही हैं मुहम्मद। उनके कुल का नाम हाशमी था। हाशमी के अंतिम अक्षर के पहले 'श' यानी जिस नेता के प्रादुर्भाव की बात कही जा रही है। उसका नाम 'श' से शुरू होना चाहिए। यदि हम कुल का नाम न मानें तो मुहम्मद के अंतिम अक्षर के नाम के पहले 'म' आता है।
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एक सोच का निर्माण होगा : नास्त्रेदमस ही नहीं, कई भविष्यवक्ता भी मानते हैं कि धर्म और संस्कृति संघर्ष के लंबे काल के बाद लोग एक-दूसरे के धर्म को समझने का प्रयास और सम्मान करेंगे। 'संघर्ष, सांप्रदायिकता और शत्रुता के एक लंबे दौर के बाद सभी धर्म तथा जातियां एक ही विचारधारा को मानने लगेंगी।' (सैंचुरी-6-10)
'सत्रह साल के भीतर पांच पोप बदले जाएंगे, तब एक नया धर्म आएगा।' -5-96 'महान सितारा सात दिन तक जलेगा और एक बादल से निकलेंगे दो सूरज, एक बड़ा कुत्ता रोएगा सारी रात और एक महान पोप अपना मुल्क छोड़ देगा।' 'अनीश्वरवादियों और ईश्वरवादियों के बीच संघर्ष होगा।' -(6-62)। ऐसे माहौल में मुक्तिदाता आएगा शांतिदूत बनकर। 'ईंट की दीवारें संगमरमर की हो जाएंगी, तब 750 साल तक शांति रहेगी। मानवता आनंदित होगी, जल स्वच्छ, स्वास्थ्य और फलों की भरमार से खुशी एवं मस्ती का दौर आएगा। संदर्भ : अमर भविष्यदृष्टा नास्त्रेदमस की संपूर्ण भविष्यवाणियां, अनुवादक और विश्लेषक अशोक कुमार शर्मा। अंत में
श्रीमद्मभागवत पुराण में बताएं गए कलियुग का वर्णन...
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*धर्म, सत्यवादिता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, जीवन की अवधि, शारीरिक शक्ति और स्मृति सभी दिन-ब-दिन घटती जाएगी।
*कलियुग में जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा वो उतना गुणी माना जाएगा और कानून, न्याय केवल एक शक्ति के आधार पर लागू किया जाएगा।
*इस युग में पुरुष और स्त्री साथ-साथ रहेंगे और व्यापार में सफलता छल पर निर्भर करेगी।
*पहले के समय में जो ब्राह्मण रहते थे वे अपने शरीर पर बहुत कुछ धारण करते थे, पर कलयुग में वे लोग सिर्फ एक धागा पहनकर अपने ब्राह्मण होने का दावा करेंगे।
*जो व्यक्ति बहुत चालाक और स्वार्थी होगा, वो इस युग में बहुत विद्वान माना जाएगा।
*इस युग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा वह अधर्मी, अपवित्र और बेकार माना जाएगा।
*विवाह बस एक समझौता होगा दो लोगों के बीच।
*लोग बस स्नान करके समझेंगे कि वे अंतरात्मा से भी साफ-सुथरे हो गए हैं।
*पेट भरना लोगों का लक्ष्य हो जाएगा।
*ऐसा माना जाएगा कि मनुष्य की सुंदरता उसके बालों से होगी।
*पृथ्वी भ्रष्ट लोगों से भर जाएगी और लोग सत्ता हासिल करने के लिए एक-दूसरे को मारेंगे।
*अकाल और अत्यधिक करों द्वारा परेशान लोग पत्ते, जड़, मांस, जंगली शहद, फल, फूल और बीज खाने को मजबूर हो जाएंगे। भयंकर सूखा पड़ेगा।
*ठंड, हवा, गर्मी, बारिश और बर्फ ये सब लोगों को बहुत परेशान करेंगे।

Tuesday, 26 May 2015

स्टीव जॉब्स :- जिसका मार्गदर्शन भारत में हुआ ,और वह एप्पल के सीईओ बने जो दुनिया को टेक्नोलॉजी के क्षेत्र मिसाल कायम किया , आईफोन , आईपैड ,आइमेक ये सब उसी का देन है ।

                        -:स्टीव जॉब्स :-
जिसका मार्गदर्शन भारत में हुआ ,और वह एप्पल के सीईओ बने जो दुनिया को टेक्नोलॉजी के क्षेत्र मिसाल कायम किया , आईफोन , आईपैड ,आइमेक ये सब उसी का देन है ।

कंप्यूटर , लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन बनाने वाली कंपनी ऐप्पल के भूतपूर्व सीईओ और जाने-माने अमेरिकी उद्योगपति स्टीव जॉब्स ने संघर्ष करके जीवन में यह मुकाम हासिल किया। कैलिफोर्निया के सेन फ्रांसिस्को में पैदा हुए स्टीव को पाउल और कालरा जॉब्स ने उनकी माँ से गोद लिया था। जॉब्स ने कैलिफोर्निया में ही पढ़ाई की। उस समय उनके पास ज़्यादा पैसे नहीं होते थे और वे अपनी इस आर्थिक परेशानी को दूर करने के लिए गर्मियों की छुट्टियों में काम किया करते थे।
१९७२ में जॉब्स ने पोर्टलैंड के रीड कॉलेज से ग्रेजुएशन की। पढ़ाई के दौरान उनको अपने दोस्त के कमरे में ज़मीन पर सोना पड़ा। वे कोक की बोतल बेचकर खाने के लिए पैसे जुटाते थे और पास ही के कृष्ण मंदिर से सप्ताह में एक बार मिलने वाला मुफ़्त भोजन भी करते थे। जॉब्स के पास क़रीब ५.१ अरब डॉलर की संपत्ति थी और वे अमेरिका के ४३वें सबसे धनी व्यक्ति थे।
जॉब्स ने आध्यात्मिक ज्ञान के लिए भारत की यात्रा की और बौद्ध धर्म को अपनाया। जॉब्स ने १९९१ में लोरेन पॉवेल से शादी की थी। उनका एक बेटा है।

प्रारंभिक जीवन

स्टीव जॉब्स का जन्म २४ फ़रवरी १९५५ को सैन फ्रांसिस्को , कैलिफ़ोर्निया में हुआ था। स्टीव के जन्म के समय उनके माता पिता की शादी नही हुए थी, इसी कारण उन्होने उसे गोद देने का फ़ैसला किया। इसी लिये स्टीव को
कैलिफोर्निया पॉल रेनहोल्ड जॉब्स और क्लारा जॉब्स ने गोद ले लिया था। क्लारा जॉब्स ने कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त नहीं की थी और पॉल जॉब्स ने केवल उच्च विद्यालय तक की ही शिक्षा प्राप्त की थी।
जब जॉब्स 5 साल के थे तो उनका परिवार सैन फ्रांसिस्को से माउंटेन व्यू,
कैलिफोर्निया की और चला गया। पॉल एक मैकेनिक और एक बढ़ई के रूप मे काम किया करते थे और अपने बेटे को अल्पविकसित इलेक्ट्रॉनिक्स और 'अपने हाथों से काम कैसे करना है' सिखाते थे, वहीं दूसरी और क्लॅरा एक अकाउंटेंट थी और स्टीव को पढ़ना सिखाती थी। [2] जॉब्स ने अपनी प्राथमिक शिक्षा मोंटा लोमा प्राथमिक विद्यालय मे की और उच्च शिक्षा कूपर्टीनो जूनियर हाइ और होम्स्टेड हाई स्कूल से प्राप्त की थी। सन् 1972 में उच्च विद्यालय के स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद जॉब्स ने ओरेगन के रीड कॉलेज में दाखिला लिया मगर रीड कॉलेज बहुत महँगा था और उनके माता पिता के पास उतने पैसे नही थे। इसी वज़ह से स्टीव ने कॉलेज छोड़े दिया और क्रिएटिव क्लासेस में दाखिला ले लिया, जिनमे से से एक कोर्स सुलेख पर था।

सन् 1973 मई जॉब्स अटारी मे तकनीशियन के रूप मे कार्य करते थे। वहाँ लोग उसे "मुश्किल है लेकिन मूल्यवान" कहते थे। मध्य १९७४, मे आध्यात्मिक ज्ञान की खोज मे जॉब्स अपने कुछ रीड कॉलेज के मित्रो के साथ कारोली बाबा से मिलने भारत आए। किंतु जब वे कारोली बाबा के आश्रम पहुँचे तो उन्हें पता चले की उनकी मृत्यु सितम्बर १९७३ को हो चुकी थी। उस के बाद उन्होने हैड़खन बाबाजी से मिलने का निर्णय किया। जिसके कारण भारत मे उन्होने काफ़ी समय दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश मे बिताया।
सात महीने भारत मे रहने के बाद वे वापस अमेरिका चले गऐ। उन्होने अपनी उपस्थिति बदल डाली, उन्होने अपना सिर मुंडा दिया और पारंपरिक भारतीय वस्त्र पहनने शुरू कर दिए, साथ ही वे जैन, बौद्ध धर्मों के गंभीर व्यवसायी भी बन गया
सन् 1976 मे जॉब्स और वोज़नियाक ने अपने स्वयं के व्यवसाय का गठन किया, जिसका नाम उन्होने "एप्पल कंप्यूटर कंपनी" रखा। पहले तो वे सर्किट बोर्ड बेचा करते थे।

सन् 1983 मे जॉब्स ने लालची जॉन स्कली को पेप्सी कोला को छोड़ कर एप्पल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में काम करने के लिए पूछा, " क्या आप आपनी बाकी ज़िंदगी शुगर पानी बेचने मे खर्च करना चाहते हैं, या आप दुनिया को बदलने का एक मौका चाहते हैं?"
तो उसने वह कुछ समय काम किया और फिर छोर दिया  और खुद का स्टीव ने १९८५ मे नेक्स्ट इंक की स्थापना की। पर इस कम्प्यूटर को महंगा होने के कारण बाज़ार मे स्वीकार नही किया गया। फिर उसी साल नेक्स्ट ने नया उन्नत 'इन्टर पर्सनल' कम्प्यूटर बनाया। सन् १९९६ मे एप्पल की बाजार में हालत बिगड़ गई तब स्टीव, नेक्स्ट कम्प्यूटर को एप्पल को बेचने के बाद वे एप्पल के चीफ एक्जिक्यूटिव आफिसर बन गये तब उसने आइमेक , आईपैड का निर्माण किया ।और 2009 में उसने  आईफोन बनाये जो की बाजार में सफल रहे । 2010 में आईपैड बनाये ,और 2011 में सीईओ इस्तीफा दे दिया ।
निधन:-
सन् २००३ मे उन्हे पैनक्रियाटिक कैन्सर की बीमारी हुई। उन्होने इस बीमारी का इलाज ठीक से नही करवाया। जॉब्स की ५ अक्टूबर २०११ को ३ बजे के आसपास
पालो अल्टो, कैलिफोर्निया के घर में निधन हो गया। उनका अन्तिम सन्स्कार अक्तूबर २०११ को हुआ। उनके निधन के मौके पर माइक्रोसाफ्ट और् डिज्नी जैसी बडी बडी कम्पनियों ने शोक मनाया।

Motivation poit :-
स्टीव जॉब्स बहुत बड़े अविष्कारक और प्रवर्तक थे | उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नही देखा | कहते हैं कि स्टीव जॉब्स जब तक जिए ,केवल काम ही करते रहे अपनी मृत्यु से 6 सप्ताह पूर्व तक वे एप्पल के लिए समर्पित रहे | उन्होंने अपने जीवन में कुछ अकाट्य बातें कही जो आज के युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत है |
स्टीव ने समय समय पर जो प्रेरणादायक बातें कही उनमे से कुछ यहाँ प्रस्तुत है -:

हमेशा लीक से हटकर चले -:

जॉब्स ने कहा की जब कोई सबके साथ नही चलता हमारे मन की बात नही करता तो हम तुरंत कह देते है “ यह तो पागल है | छोड़ो इसे अपना काम करो |लेकिन जॉब्स इसे साधारण नही मानते जिसे लोग पागल कहते है | विद्रोही कहते है |,संकट पैदा करने वाला मानते है |उसमे वास्तव में कुछ असाधारण है तभी तो वो आपसे अलग ढंग से बोल रहा है, सोच रहा है या कह रहा है |उसकी बात ध्यान से सुनो | कुछ न कुछ तो है | वह आपके लिए मूल्यवान हो सकता है| क्यूंकि ऐसे लोग नियमों की परवाह नही करते | उन्हें अपने सम्मान या अहंकार की भी परवाह नही होती | क्यूंकि वे चीजों को बदलने की क्षमता रखते है | वे दौड को आगे बढ़ाते है | आज वे अकेले है इसलिए पागल कहे जाते है | जब दुनिया उनके पीछे होगी, तब वे बुद्धिमान कहे जायेंगे |

निर्धारित करें की आप क्या करना चाहते है -:
              स्टीव ने कहा की सबसे महत्वपूर्ण अपने दिल और अंतर्ज्ञान पर अमल करने का साहस करें | किसी तरह उन्हें पहले से ही पता होता है की आप सही में क्या बनाना चाहते है | बाकी हर चीज गौण है | उन्होंने कहा की आप अपने दिल और अंतर्मन की आवाज क्यों नही सुन रहे हो आपके अन्दर लक्ष्य पहले से ही निश्चित होता है इसलिए वही करिए जो आप करना चाहते है और यदि वह कार्य आपको नही मिला है तो उसे ढूढ़ते रहिये और जिस दिन वो आपको मिल जाएगा तो आप स्वयं जान जायेंगे की आपको करना क्या है |

Think Different -:
 यह स्टीव का मूल मंत्र था | कितना छोटा सा शब्द लेकिन कितनी गहराई लये हुए इसी शब्द के भरोसे उन्होंने उधोगों को बदला, बिजनेस मोडल को नई परिभाषा दी और टेक्नोलॉजी को आर्ट से जोड़ा आज लोग उनकी तुलना थॉमस एडिसन,वाल्ट डिज्नी,लियानार्दो द विंची से कर रहे है लोग चिल्ला चिल्ला कर कह रहे है की स्टीव जैसा शख्स अब जल्द दुनिया को मिलने वाला नही है | इस सब के पीछे क्या था ? एक अलग तरह की सोच,एकला चलो की नीति और दूसरों के ढेर सारे निर्णयों को बदलते हुए अपनी आत्मा की आवाज के नक़्शे कदम पर चलना |

इंतज़ार बंद कीजिये अकेले चलिए -:

 स्टीव कहते थे की यदि जीतना है, सफल होना है तो अकेले ही चलना होगा . आज तक दुनिया में जितने भी सितारे चमके है सब अकेले ही चले है | वे लोगो को मोटीवेट करते थे और कहते थे की किसका इन्तेजार कर रहे हो ?आपको जिताने के लिए कोई नही आएगा | आपको खुद जीतना होगा | जिंदगी केवल समय काटने के लिए नही है बल्कि जिन्दादिली के साथ जीने के लिए है ज़िन्दगी घिसटने के लिए नही है वल्कि उड़ान भरने के लिए है जिंदगी को बोझ मत समझिये बल्कि मुस्कुरा कर जिए | इन्तेजार मत कीजिये लग जाइए अकेले चलिए और इतिहास रच दीजिये |
Don’t compromise – :

स्टीव जॉब्स अपने कर्मचारियों से हमेशा कहते थे की Design , material , technology , and craftsmanship में कभी भी समझोता मत करो समझोता एक इंजेक्शन की भाति है जो सहायक भी हो सकता है और तकलीफ़देह भी यदि हार मानकर समझोता कर लिया तो फिर आपकी क्या कीमत रह जायेगी ? आप किस लिए है? क्या समझोता करने के लिए| यह काम तो कोई भी कर सकता है अतः आपमें और औरों में क्या अंतर हुआ अतः मेरी सलाह है की अपनी अंतरात्मा की आवाज के विपरीत किसी भी अन्य बात पर समझोता मत करों और हमेशा बदलाव की सोच रखो |
समय अनमोल है -: स्टीव जॉब्स कहते है जिंदगी का बीतने वाला प्रत्येक क्षण आपकी ज़िन्दगी से कुछ न कुछ चुरा ले जाता है और आपको पता ही नही चलता और अंततः एक दिन वह आता है जब हमें पता चलता है की हमने ज़िन्दगी में कुछ किया ही नही पूरी ज़िन्दगी यूँ ही बीत गयी |जीवन में कुछ अर्थपूर्ण करना है तो समय के महत्त्व को समझना होगा।
मनुष्य अपने भाग्य का विधाता स्वयं है -:

 यह वाक्य बताता है कि यदि मनुष्य चाहे तो स्वयं असंभव को संभव कर सकता है आपका भाग्य,आपके कर्म सिद्धांत,दुसरो की सहायता यह सब अपनी जगह सही हो सकते है| लेकिन यह भी सत्य है की मनुष्य अपनी संकल्पशक्ति के सहारे भाग्य को भी बदल सकता है| बहुतों ने ऐसा कर दिखाया है और बहुत लोग आज कर रहे है,और आगे भी करेंगे सब कुछ तुम्हारे अन्दर है| अनंत शक्ति वाली सत्ता तुम्हारे अन्दर निवास करती है | फिर तुम्हे किसके सहारे की जरूरत है इसलिए उस कार्य में लग जाइए जिसे आप करना चाहते है |
मृत्यु एक सत्य है -: जॉब्स ने बताया इस अटल सत्य को ऐसे समझना चाहिए कि “आपके पास खोने के लिए कुछ नही है| ”सबसे अच्छा तरीका यह याद करना है की आप मरने जा रहे है. उन्होंने कहा ,जब मृत्यु उपयोगी लेकिन शुद्ध रूप से बौद्धिक अवधारणा थी ,उसके मुकाबले में अब पहले से ज्यादा निश्चय के साथ आपसे कह सकता हूँ की कोई मरना नही चाहता यहाँ तक की वह लोग जो स्वर्ग जाना चाहते है वे भी वह जाने के लिए मौत नही चाहते|

200 सालों के बाद इंसान बन सकेगा भगवन क्या यह संभव हो सकता है ?

200 सालों के बाद इंसान बन सकेगा भगवन
क्या यह संभव हो सकता है ?
नयी दिल्ली। अब तक आप और हम भगवान होने की कथाएं और कहानियां ही सुनते आ रहे हैं। हमने कईयों बार कथाओं ने इंसान के भगवान होने की  बातें सुनी है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ सालों के बाद इंसान में भगवान बनने की ताकत आ जाएगी।  जी हां ये दावा एक इतिहासकार ने किया है कि 200 सालों के बाद एक आम इंसान दैवीय शक्तियां जुटा लेगा। इतना ही नहीं पैसों की बदौलत इंसान अपने मन के मुताबिक खुद के शरीर की संरचना को बना भी सकता है या फिर बिगाड़ भी सकता है। इतना ही नहीं पैसों की ताकत का इस्तेमाल कर इंसान मौत पर भी काबू पा लेगा और जब तक चाहेगा, तब तक जिएगा। जी हां ये दावा किया है कि येरूसलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के इतिहासकार युवल नोह हरारी ने हरारी के मुताबिक अगले 200 साल बाद पैसे वाले लोग खुद को लंबे समय तक जिंदा रख सकेंगे
Reference :- http://hindi.oneindia.com

Monday, 25 May 2015

-:नास्त्रेदमस भविष्यवक्ता:-

                         -:नास्त्रेदमस भविष्यवक्ता:-




नास्त्रेदमस (Nostradamusफ्रांस के एक १६वीं (१५०३-१५६६) सदी के भविष्यवक्ता थे। नास्त्रेदमस केवल भविष्यवक्ता ही नही, डॉक्टर और शिक्षक भी थे। ये प्लेग जैसी बिमारियों का इलाज करते थे। इन्होने ने अपनी कविताओ के द्वारा भविष्य मे होने वाली घटनाओ का वर्णन किया था।
अधिकांश शैक्षणिक और वैज्ञानिक सूत्रों का कहना है कि दुनिया की घटनाओं और नास्त्रेदमस के शब्दों के बीच दिखाए गए संबंध काफी हद तक गलत व्याख्याओं या गलत अनुवाद का परिणाम है या फिर इतने कमजोर हैं कि उन्हें वास्तविक भविष्य बताने की शक्ति के साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करना बेकार है। कुछ गलत व्याख्याएँ या गलत अनुवाद तो जानबूझकर भी किए गए हैं।[1] इस के बावजूद है भी, बीसवीं शताब्दी में नास्त्रेदमस की कथित भविष्यवाणियाँ आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गईं और कई प्रमुख विश्व घटनाओं की भविष्यवाणी का श्रेय उन्हें दिया गया

    जीवनीसंपादित करें

    भविष्य की बातों को हजारों साल पहले घोषणा करने के लिए मशहूर नास्त्रेदमस का जन्म १४ दिसम्बर १५०३ को फ्रांस के एक छोटे से गांव सेंट रेमी मे हुआ। उनका नाम मिशेल दि नास्त्रेदमस था बचपन से ही उनकी अध्ययन मे खास दिलचस्पि रही और उन्होनें लैटिन, यूनानी और हीब्रू भाषाओं के अलावा गणित, शरीर विज्ञान एवं ज्योतिष शास्त्र जैसे गूढ विषयों पर विशेष महारत हासिल कर ली।
    नास्त्रेदमस ने किशोरावस्था से ही भविष्यवाणियां करना शुरू कर दी थी। ज्योतिष मे उनकी बढती दिलचस्पी ने माता-पिता को चिंता मे डाल दिया क्योंकि उस समय कट्टरपंथी ईसाई इस विद्या को अच्छी नजर से नही देखते थे। ज्योतिष से उनका ध्यान हटाने के लिए उन्हे चिकित्सा विज्ञान पढने मांट पेलियर भेज दिया गया जिसके बाद तीन वर्ष की पढाई पूरी कर नास्त्रेदमस चिकित्सक बन गए।
    २३ अक्टूबर १५२९ को उन्होने मांट पोलियर से ही डॉक्टरेट की उपाधि ली और उसी विश्वविद्यालय मे शिक्षक बन गए। पहली पत्नी के देहांत के बाद १५४७ मे यूरोप जाकर उन्होने ऐन से दूसरी शादी कर ली। इस दौरान उन्होनें भविष्यवक्ता के रूप मे खास नाम कमाया।
    एक किंवदंती के अनुसार एक बार नास्त्रेदमस अपने मित्र के साथ इटली की सडकों पर टहल रहे थे, उन्होनें भीड में एक युवक को देखा और जब वह युवक पास आया तो उसे आदर से सिर झुकाकर नमस्कार किया। मित्र ने आश्चर्यचकित होते हुए इसका कारण पुछा तो उन्होने कहा कि यह व्यक्ति आगे जाकर पोप का आसन ग्रहण करेगा। किंवदंती के अनुसार वास्तव मे वह व्यक्ति फेलिस पेरेती था जिसने १५८५ मे पोप चुना गया। नास्त्रेदमस के बारे में ऐसी कई कहानियाँ हैं, लेकिन इनमें से किसी के लिए कोई सबूत नहीं है।[2]
    नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियां की ख्याति सुन फ्रांस की महारानी कैथरीन ने अपने बच्चों का भविष्य जानने की इच्छा जाहिर की। नास्त्रेदमस अपनी इच्छा से यह जान चुके थे कि महारानी के दोनो बच्चे अल्पायु मे ही पुरे हो जाएंगे, लेकिन सच कहने की हिम्मत नही हो पायी और उन्होने अपनी बात को प्रतीकात्मक छंदो मे पेश किया। इसक प्रकार वह अपनी बात भी कह गए और महारानी के मन को कोई चोट भी नहीं पहुंची। तभी से नास्त्रेदमस ने यह तय कर लिया कि वे अपनी भविष्यवाणीयां को इसी तरह छंदो मे ही व्यक्त करेंगें।
    १५५० के बाद नास्त्रेदमस ने चिकित्सक के पेशे को छोड अपना पूरा ध्यान ज्योतिष विद्या की साधना पर लगा दिया। उसी साल से अन्होंने अपना वार्षिक पंचाग भी निकालना शुरू कर दिया। उसमें ग्रहों की स्थिति, मौसम और फसलों आदि के बारे मे पूर्वानुमान होते थे। कहा जाता है कि उनमें से ज्यादातर सत्य सावित हुई। नास्त्रेदमस ज्योतिष के साथ ही जादू से जुडी किताबों मे घंटो डूबे रहते थे।
    नास्त्रेदमस ने १५५५ में भविष्यवाणियों से संबंधित अपने पहले ग्रंथ सेंचुरी के प्रथम भाग का लेखन पूरा किया, जो सबसे पहले फ्रेंच और बाद मे अंग्रेजी, जर्मन, इतालवी, रोमन, ग्रीक भाषाओं मे प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक ने फ्रांस मे इतना तहलका मचाया कि यह उस समय महंगी होने के बाद भी हाथों-हाथ विक गई। उनके कुछ व्याख्याकारों क मानना है कि इस किताब के कई छंदो में प्रथम विश्व युद्ध, नेपोलियन, हिटलर और कैनेडी आदि से संबंद्ध घटनाएं स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। व्याख्याकारों ने नास्त्रेदमस के अनेक छंदो मे तीसरे विश्वयुद्ध का पूर्वानुमान और दुनिया के विनाश के संकेत को भी समझ लेने मे सफलता प्राप्त कर लेने का दावा किया है। अधिकांश शैक्षणिक और वैज्ञानिक सूत्रों का कहना है कि ये व्याख्याएँ गलत अनुवाद या गलतफ़हमी का परिणाम हैं और कुछ गलतियाँ तो जानबूझकर भी की गईं हैं।[1]
    नास्त्रेदमस के जीवन के अंतिम साल बहुत कष्ट से गुजरे। फ्रांस का न्याय विभाग उनके विरूद्ध यह जांच कर रहा था कि क्या वह वास्ताव में जादू-टोने का सहारा लेते थे। यदि यह आरोप सिद्ध हो जाता, तो वे दंड के अधिकारी हो जाते। लेकिन जांच का निष्कर्ष यह निकला कि वेकोई जादूगर नही बल्कि ज्योतिष विद्या में पारंगत है। उन्हीं दिनों जलोदर रोग से ग्रस्त हो गए। शरीर मे एक फोडा हो गया जो लाख उपाचार के बाद भी ठीक नही हो पाया। उन्हे अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था, इसलिए उन्होने १७ जून १५६६ को अपनी वसीयत तैयार करवाई। एक जुलाई को पादरी को बुलाकर अपने अंतिम संस्कार के निर्देश दिए। २ जूलाई १५६६ को इस मश्हूर भविष्यवक्ता का निधन हो गया। कहा जाता है कि अपनी मृत्यु की तिथि और समय की भविष्यवाणी वे पहले ही कर चूके थे।
    एक व्याख्या के अनुसार "नास्त्रेदमस ने अपने संबंध मे जो कुछ गिनी-चुनी भविष्यवाणियां की थी, उनमें से एक यह भी थी कि उनकी मौत के २२५ साल बाद कुद समाजविरोधी तत्व उनकी कब्र खोदेंगे और उनके अवशेषों को निकालने का प्रयास करेंगे लेकिन तुरंत ही उनकी मौत हो जाएगी। वास्तव मे ऐसी ही हुआ। फ्रांसिसी क्रांति के बाद १७९१ में तीन लोगों ने नास्त्रेदमस की कब्र को खोदा, जिनकी तुरंत मौत हो गयी।" यह केवल एक शहरी मिथक .

    भारतीय प्रधनमंत्री   मोदी जी की भबिष्यवाणी:-




    नास्‍त्रेदमस ने इस बात के बारे में 450 वर्ष पहले यह भविष्‍यवाणी 1555 में अपने एक अपनी एक किताब 'द प्रोफेसीज' में कर दी थी। फ्रेंच भाषा में लिखे अपने इस ग्रंथ में नास्‍त्रेदमस ने साफ लिखा है कि यह व्‍यक्ति भारत की दिशा और दशा बदलकर रख देगा। इस किताब को मराठी भाषा में महाराष्‍ट्र के मशहूर ज्‍योतिषी डॉक्‍टर श्री रामचंद्रजी जोशी ने अनुवाद किया है। नास्‍त्रेदमस के इस ग्रंथ के पेज नंबर 32-33 पर साफ-साफ लिखा है कि एक अधेड़ उम्र का व्‍यक्ति जो भारत का प्रतिनिधित्‍व करेगा वह भारत के साथ ही साथ पूरी दुनिया में एक नया अध्‍याय लिखेगा। उसकी अगुवाई में भारत दुनिया में महाशक्तिशाली बन जाएगा। फ्रेंकोइस ने अपने एक ब्लॉग में लिखा कि एक मशहूर फ्रेंच स्कॉलर बैम्पेरल डे ला रोशफोकॉल्ट को एक पुराने संदूक में कुछ पुराने दस्तावेज मिले थे, जिसे उन्होंने सन् 1876 में बोर्दो के एक दुकानदार को बेच दिया था। बैम्परेल के मुताबिक, ये दस्तावेज लैटिन भाषा में लिखे गए थे और ये नास्त्रेदमस के थे। इन दस्तावेजों के दो पन्नों में लैटिन भाषा में कविताएं लिखी हुई हैं। गौरतलब है कि नास्त्रेदमस ने अपनी किताब में 'द प्रोफेसीज' में फ्रेंच रिवॉल्यूशन, परमाणु हमलों, एडोल्फ हिटलर और 9/11 हमले की भविष्यवाणी की थी, जो सच साबित हुईं। 
    Reference :- hi.Wikipedia

    Sunday, 24 May 2015

    गैलीलियो गैलिली

                                     -:।   गैलीलियो गैलिली     :-



     धुनिक इटली के पीसा नामक शहर (पीसा की टेढ़ी मीनार के लिए प्रसिद्ध) में 15 फरवरी 1564 को गैलीलियो गैलिली का जन्म हुआ। अधिकांश लोग गैलीलियो को एक खगोलविज्ञानी के रूप में याद करते हैं जिसने दूरबीन में सुधार कर उसे अधिक शक्तिशाली तथा खगोलीय प्रेक्षणों के लिए उपयुक्त बनाया और साथ ही अपने प्रेक्षणों से ऐसे चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए जिसने खगोल विज्ञान को नई दिशा दी और आधुनिक खगोल विज्ञान की नींव रखी। पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि खगोलविज्ञानी होने के अलावा वे एक कुशल गणितज्ञ, भौतिकीविद् और दार्शनिक भी थे जिसने यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसीलिए गैलीलियो को ”आधुनिक खगोल विज्ञान के जनक”, ”आधुनिक भौतिकी का पिता” या ”विज्ञान का पिता” के रूप में संबोधित किया जाता है।
    बहुत कम लोग यह जानते हैं कि खगोलविज्ञानी होने के अलावा वे एक कुशल गणितज्ञ, भौतिकीविद् और दार्शनिक भी थे जिसने यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
    गैलीलियो को सूक्ष्म गणितीय विश्लेषण करने का कौशल संभवत: अपने पिता विन्सैन्जो गैलिली से विरासत में आनुवांशिक रूप में तथा कुछ उनकी कार्यशैली को करीब से देख कर मिला होगा। विन्सैन्जो एक जाने-माने संगीत विशेषज्ञ थे और ‘ल्यूट’ नामक वाद्य यंत्र बजाते थे जिसने बाद में गिटार और बैन्जो का रूप ले लिया। उन्होंने भौतिकी में पहली बार ऐसे प्रयोग किए जिनसे ”अरैखिक संबंध” का प्रतिपादन हुआ। तब यह ज्ञात था कि किसी वाद्य यंत्र की तनी हुई डोर (या तार) के तनाव और उससे निकलने वाली आवृत्ति में एक संबंध होता है, आवृत्ति तनाव के वर्ग के समानुपाती होती है। इस तरह संगीत के सिद्धांत में गणित की थोड़ी बहुत पैठ थी। प्रेरित हो गैलीलियो ने पिता के कार्य को आगे बढ़ाया और फिर उन्होंने बाद में पाया कि प्रकृति के नियम गणित के समीकरण होते हैं। गैलीलियो ने लिखा है – ”भगवान की भाषा गणित है”।
    गैलीलियो ने दर्शन शास्त्र का भी गहन अध्ययन किया था साथ ही वे धार्मिक प्रवृत्ति के भी थे। पर वे अपने प्रयोगों के परिणामों को कैसे नकार सकते थे जो पुरानी मान्यताओं के विरुद्ध जाते थे और वे इनकी पूरी ईमानदारी के साथ व्याख्या करते थे। उनकी चर्च के प्रति निष्ठा के बावजूद उनका ज्ञान और विवेक उन्हें किसी भी पुरानी अवधारणा को बिना प्रयोग और गणित के तराजू में तोले मानने से रोकता था। चर्च ने इसे अपनी अवज्ञा समझा। पर गैलीलियो की इस सोच ने मनुष्य की चिंतन प्रक्रिया में नया मोड़ ला दिया। स्वयं गैलीलियो अपने विचारों को बदलने को तैयार हो जाते यदि उनके प्रयोगों के परिणाम ऐसा इशारा करते। अपने प्रयोगों को करने के लिए गैलीलियो ने लंबाई और समय के मानक तैयार किए ताकि यही प्रयोग अन्यत्र जब दूसरी प्रयोगशालाओं में दुहराए जाएं तो परिणामों की पुनरावृत्ति द्वारा उनका सत्यापन किया जा सके।
    गैलीलियो ने प्रकाश की गति नापने का भी प्रयास किया और तत्संबंधी प्रयोग किए। गैलीलियो व उनका एक सहायक दो भिन्न पर्वत शिखरों पर कपाट लगी लालटेन लेकर रात में चढ़ गए। सहायक को निर्देश दिया गया था कि जैसे ही उसे गैलीलियो की लालटेन का प्रकाश दिखे उसे अपनी लालटेन का कपाट खोल देना था। गैलीलियो को अपने कपाट खोलने व सहायक की लालटेन का प्रकाश दिखने के बीच का समय अंतराल मापना था-पहाड़ों के बीच की दूरी उन्हें ज्ञात थी। इस तरह उन्होंने प्रकाश की गति ज्ञात की।
    पर गैलीलियो – गैलीलियो ठहरे – वे इतने से कहां संतुष्ट होने वाले थे। अपने प्रायोगिक निष्कर्ष को दुहराना जो था। इस बार उन्होंने ऐसी दो पहाड़ियों का चयन किया जिनके बीच की दूरी कहीं ज्यादा थी। पर आश्चर्य, इस बार भी समय अंतराल पहले जितना ही आया। गैलीलियो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रकाश को चलने में लग रहा समय उनके सहायक की प्रतिक्रिया के समय से बहुत कम होगा और इस प्रकार प्रकाश का वेग नापना उनकी युक्ति की संवेदनशीलता के परे था। पर गैलीलियो द्वारा बृहस्पति के चंद्रमाओं के बृहस्पति की छाया में आ जाने से उन पर पड़ने वाले ग्रहण के प्रेक्षण से ओल रोमर नामक हॉलैंड के खगोलविज्ञानी को एक विचार आया। उन्हें लगा कि इन प्रेक्षणों के द्वारा प्रकाश का वेग ज्ञात किया जा सकता है। सन् 1675 में उन्होंने यह प्रयोग किया जो इस तरह का प्रथम प्रयास था। इस प्रकार यांत्रिक बलों पर किए अपने मुख्य कार्य के अतिरिक्त गैलीलियो के इन अन्य कार्यों ने उनके प्रभाव क्षेत्र को कहीं अधिक विस्तृत कर दिया था जिससे लंबे काल तक प्रबुद्ध लोग प्रभावित होते रहे।
    IYA Special
    "ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की", कॉपरनिकस के इस सिद्धांत का गैलीलियो ने समर्थन किया। पर इस "भूल" के लिये चर्च ने उन्हें दिया कारावास। 1992 में वैटिकन ने यह स्वीकार किया कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी।
    गैलीलियो ने आज से बहुत पहले गणित, सैद्धांतिक भौतिकी और प्रायोगिक भौतिकी के परस्पर संबंध को समझ लिया था। परवलय या पैराबोला का अध्ययन करते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि एक समान त्वरण (uniform acceleration) की अवस्था में पृथ्वी पर फेंका कोई पिंड एक परवलयाकार मार्ग पर चल कर वापस पृथ्वी पर आ गिरेगा – बशर्ते हवा के घर्षण का बल उपेक्षणीय हो। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि उनका यह सिद्धांत जरूरी नहीं कि किसी ग्रह जैसे पिंड पर भी लागू हो। उन्हें इस बात का ध्यान था कि उनके मापन में घर्षण (friction) तथा अन्य बलों के कारण अवश्य त्रुटियां आई होंगी जो उनके सिद्धांत की सही गणितीय व्याख्या में बाधा उत्पन्न कर रहीं थीं। उनकी इसी अंतर्दृष्टि के लिए प्रसिद्ध भौतिकीविद् आइंस्टाइन ने उन्हें ”आधुनिक विज्ञान का पिता” की पदवी दे डाली। कथन में कितनी सचाई है पता नहीं – पर माना जाता है कि गैलीलियो ने पीसा की टेढ़ी मीनार से अलग-अलग संहति (mass) की गेंदें गिराने का प्रयोग किया और यह पाया उनके द्वारा गिरने में लगे समय का उनकी संहति से कोई सम्बन्ध नहीं था – सब समान समय ले रहीं थीं। ये बात तब तक छाई अरस्तू की विचारधारा के एकदम विपरीत थी – क्योंकि अरस्तू के अनुसार अधिक भारी वस्तुएं तेजी से गिरनी चाहिए। बाद में उन्होंने यही प्रयोग गेदों को अवनत तलों पर लुढ़का कर दुहराए तथा पुन: उसी निष्कर्ष पर पहुंचे।
    गैलीलियो ने त्वरण के लिए सही गणितीय समीकरण खोजा। उन्होंने कहा कि अगर कोई स्थिर पिंड समान त्वरण के कारण गतिशील होता है तो उसकी चलित दूरी समय अंतराल के वर्ग के समानुपाती होगी।
    S = ut + ½ft2, if u = 0 then S = ½ft2 or S ∝ t2
    गैलीलियो ने ही जड़त्व का सिद्धांत हमें दिया जिसके अनुसार ”किसी समतल पर चलायमान पिंड तब तक उसी दिशा व वेग से गति करेगा जब तक उसे छेड़ा न जाए”। बाद में यह जाकर न्यूटन के गति के सिद्धांतों का पहला सिद्धांत बना। पीसा के विशाल कैथेड्रल (चर्च) में झूलते झूमर को देख कर उन्हें ख्याल आया क्यों न इसका दोलन काल नापा जाए – उन्होंने अपनी नब्ज की धप-धप की मदद से यह कार्य किया – और इस प्रकार सरल लोलक का सिद्धांत बाहर आया – कि लोलक का आवर्त्तकाल उसके आयाम (amplitude) पर निर्भर नहीं करता (यह बात केवल छोटे आयाम पर लागू होती है – पर एक घड़ी का निर्माण करने के लिए इतनी परिशुद्धता काफी है)। सन् 1632 में उन्होंने ज्वार-भाटे की व्याख्या पृथ्वी की गति द्वारा की। इसमें उन्होंने समुद्र की तलहटी की बनावट, इसके ज्वार की तरंगों की ऊंचाई तथा आने के समय में संबंध की चर्चा की – हालांकि यह सिद्धांत सही नहीं पाया गया। बाद में केपलर व अन्य वैज्ञानिकों ने इसे सुधारा और सही कारण – चंद्रमा को बताया।
    जिसे आज हम आपेक्षिकता (Relativity) का सिद्धांत कहते हैं उसकी नींव भी गैलीलियो ने ही डाली थी। उन्होंने कहा है ”भौतिकी के नियम वही रहते हैं चाहे कोई पिंड स्थिर हो या समान वेग से एक सरल रेखा में गतिमान। कोई भी अवस्था न परम स्थिर या परम चल अवस्था हो सकती है”। इसी ने बाद में न्यूटन के नियमों का आधारगत ढांचा दिया। सन् 1609 में गैलीलियो को दूरबीन के बारे में पता चला जिसका हालैंड में आविष्कार हो चुका था। केवल उसका विवरण सुनकर उन्होंने उससे भी कहीं अधिक परिष्कृत और शक्तिशाली दूरबीन स्वयं बना ली। फिर शुरू हुआ खगोलीय खोजों का एक अद्भुत अध्याय। गैलीलियो ने चांद को देखा उसके ऊबड़-खाबड़ गङ्ढे देखे। फिर उन्होंने दूरबीन चमकीले शुक्र ग्रह पर साधी – एक और नई खोज – शुक्र ग्रह भी (चंद्रमा की तरह) कला (phases) का प्रदर्शन करता है। जब उन्होंने बृहस्पति ग्रह को अपनी दूरबीन से निहारा, फिर जो देखा और उससे उन्होंने जो निष्कर्ष निकाला उसने सौरमंडल को ठीक-ठीक समझने में बड़ी मदद की। गैलीलियो ने देखा की बृहस्पति ग्रह के पास तीन छोटे-छोटे ”तारे” जैसे दिखाई दे रहे हैं। कुछ घंटे बाद जब दुबारा उसे देखा तो वहां तीन नहीं बल्कि चार ”तारे” दिखाई दिए। गैलीलियो समझ गए कि बृहस्पति ग्रह का अपना एक अलग संसार है। उसके गिर्द घूम रहे ये पिंड अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए बाध्य नहीं हैं। (तब तक यह माना जाता था कि ग्रह और सूर्य सभी पिंड पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। हालांकि निकोलस कॉपरनिकस गैलीलियो से पहले ही यह कह चुके थे कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की – पर इसे मानने वाले बहुत कम थे। गैलीलियो की इस खोज से सौरमडंल के सूर्य केंद्रित सिद्धांत को बहुत बल मिला।)


    1609 में गैलीलियो को दूरबीन के बारे में पता चला जिसका हालैंड में आविष्कार हो चुका था। केवल उसका विवरण सुनकर उन्होंने कहीं अधिक परिष्कृत व शक्तिशाली दूरबीन स्वयं बना ली।
    इसके साथ ही गैलीलियो ने कॉपरनिकस के सिद्धांत को खुला समर्थन देना शुरू कर दिया। ये बात तत्कालीन वैज्ञानिक और धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध जाती थी। गैलीलियो के जीवनकाल में इसे उनकी भूल ही समझा गया। सन् 1633 में चर्च ने गैलीलियो को आदेश दिया कि वे सार्वजनिक रूप से कहें कि ये उनकी बड़ी भूल है। उन्होंने ऐसा किया भी। फिर भी गैलीलियो को कारावास भेज दिया गया। बाद में उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के मद्देनजर सजा को गृह-कैद में तब्दील कर दिया गया। अपने जीवन का अंतिम दिन भी उन्होंने इसी कैद में गुज़ारा। कहीं वर्ष 1992 में जाकर वैटिकन शहर स्थित ईसाई धर्म की सर्वोच्च संस्था ने यह स्वीकारा कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी। यानी उन्हें तीन सौ से अधिक साल लग गए असलियत को समझने और स्वीकारने में।
    जब गैलीलियो पीसा के विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान के प्राध्यापक थे तो उन्हें अपने शिष्यों को यह पढ़ाना पढ़ता था कि ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। बाद में जब वे पदुवा नामक विश्वविद्यालय में गए तब उन्हें जाकर निकोलस कॉपरनिकस के नए सिद्धांत का पता चला था। खुद अपनी दूरबीन द्वारा किए गए प्रेक्षणों से (विशेषकर बृहस्पति के चंद्रमा देख कर) वे अब पूरी तरह आश्वस्त हो चुके थे कि कॉपरनिकस का सूर्य-केंद्रित सिद्धांत ही सौरमंडल की सही व्याख्या करता है। बहत्तर साल की अवस्था को पहुंचते-पहुंचते गैलीलियो अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह खो चुके थे। बहुत से लोग यह मानते हैं कि उनका अंधापन अपनी दूरबीन द्वारा सन् 1613 में सूर्य को देखने (जिसके द्वारा उन्होंने सौर-कलंक या सनस्पॉट्स भी खोजे थे) के कारण उत्पन्न हुआ होगा। पर जांच करने पर पता चला कि ऐसा मोतियाबिंद के आ जाने और आंख की ग्लौकोमा नामक बीमारी के कारण हुआ होगा।
    सन् 1642 में गृह-कैद झेल रहे गैलीलियो की 8 जनवरी को मृत्यु हो गई। कुछ मास बाद उसी वर्ष न्यूटन का जन्म हुआ। इस तरह कह सकते हैं कि तब एक युग का अंत और एक और नए क्रांतिकारी युग का शुभारंभ हुई

    Reference :-
     https://www.google.co.in/url?sa=t&source=web&rct=j&ei=FIJiVbi_JpSTuASi5YDACg&url=http://www.samayiki.com/2009/02/galileo-father-of-applied-physics/&ved=0CD8QFjAD&usg=AFQjCNGbhNoPiDPWUJdADguUDhe-jcKv5Q&sig2=7EcOL2swAkQ2h2G6kNRNXg

    अच्यार्य चाणक्य

                                    -: अच्यार्य चाणक्य :-


    चाणक्य (अनुमानतः ईसापूर्व ३७५ - ईसापूर्व २२५) चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। वे 'कौटिल्य' नाम से भी विख्यात हैं। उन्होने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया। उनके द्वारा रचित अर्थशास्त्रराजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि का महान ग्रंन्थ है। अर्थशास्त्र मौर्यकालीन भारतीय समाज का दर्पण माना जाता है।
    मुद्राराक्षस के अनुसार इनका असली नाम 'विष्णुगुप्त' था। विष्णुपुराणभागवत आदि पुराणों तथाकथासरित्सागर आदि संस्कृत ग्रंथों में तो चाणक्य का नाम आया ही है, बौद्ध ग्रंथो में भी इसकी कथा बराबर मिलती है। बुद्धघोष की बनाई हुई विनयपिटक की टीका तथा महानाम स्थविर रचित महावंश की टीका में चाणक्य का वृत्तांत दिया हुआ है। चाणक्य तक्षशिला (एक नगर जो रावलापिंडी के पास था) के निवासी थे। इनके जीवन की घटनाओं का विशेष संबंध मौर्य चंद्रगुप्त की राज्यप्राप्ति से है। ये उस समय के एक प्रसिद्ध विद्वान थे, इसमें कोई संदेह नहीं। कहते हैं कि चाणक्य राजसी ठाट-बाट से दूर एक छोटी सी कुटिया में रहते थे।
    उनके नाम पर एक धारावाहिक भा बना था जो दूरदर्शन पर १९९० के दशक में दिखाया जाता था।


    परिचय

    चद्रगुप्त के साथ चाणक्य की मैत्री की कथा इस प्रकार है-
    पाटलिपुत्र के राजा नंद या महानंद के यहाँ कोई यज्ञ था। उसमें ये भी गए और भोजन के समय एक प्रधान आसन पर जा बैठे। महाराज नंद ने इनका काला रंग देख इन्हें आसन पर से उठवा दिया। इसपर क्रुद्ध होकर इन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि जबतक मैं नंदों का नाश न कर लूँगा तबतक अपनी शिखा न बाँधूँगा। उन्हीं दिनों राजकुमार चंद्रगुप्त राज्य से निकाले गए थे। चद्रगुप्त ने चाणक्य से मेल किया और दोनों आदमियों ने मिलकर म्लेच्छ राजा पर्वतक की सेना लेकर पटने पर चढ़ाई की और नंदों को युद्ध में परास्त करके मार डाला।
    नंदों के नाश के संबंध में कई प्रकार की कथाएँ हैं। कहीं लिखा है कि चाणक्य ने शकटार के यहाँ निर्माल्य भेजा जिसे छूते ही महानंद और उसके पुत्र मर गए। कहीं विषकन्या भेजने की कथा लिखी है। मुद्राराक्षस नाटक के देखेने से जाना जाता है कि नंदों का नाश करने पर भी महानंद के मंत्री राक्षस के कौशल और नीति के कारण चंद्रगुप्त को मगध का सिंहासन प्राप्त करने में बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ पडीं। अंत में चाणक्य ने अपने नीतिबल से राक्षस को प्रसन्न किया और चंद्रगुप्त को मंत्री बनाया। बौद्ध ग्रंथो में भी इसी प्रकार की कथा है, केवल 'महानंद' के स्थान पर 'धननंद' है।

    यद्यपि कौटिल्य के जीवन के संबंध में प्रामाणिक तथ्यों का अभाव है। उनके जन्मस्थान के संबंध में भी मतभेद पाया जाता है।
    कुछ विद्वानों के अनुसार कौटिल्य का जन्म पंजाब के 'चणक' क्षेत्र में हुआ था, जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि उसका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था। कई विद्वानों का यह मत है कि वह कांचीपुरम का रहने वाला द्रविण ब्राह्मण था। वह जीविकोपार्जन की खोज में उत्तर भारत आया था। कुछ विद्वानों के मतानुसारकेरल भी उसका जन्म स्थान बताया जाता है। इस संबंध में उसके द्वारा चरणी नदी का उल्लेख इस बात के प्रमाण के रूप में दिया जाता है। कुछ संदर्भों में यह उल्लेख मिलता है कि केरल निवासी विष्णुगुप्त तीर्थाटन के लिए वाराणसी आया था, जहाँ उसकी पुत्री खो गयी। वह फिर केरल वापस नहीं लौटा और मगध में आकर बस गया। इस प्रकार के विचार रखने वाले विद्वान उसे केरल के कुतुल्लूर नामपुत्री वंश का वंशज मानते हैं। कई विद्वानों ने उसे मगध का ही मूल निवासी माना है। कुछ बौद्ध साहित्यों ने उसे तक्षशिक्षा का निवासी बताया है। कौटिल्य के जन्मस्थान के संबंध में अत्यधिक मतभेद रहने के कारण निश्चित रूप से यह कहना कि उसका जन्म स्थान कहाँ था, कठिन है, परंतु कई संदर्भों के आधार पर तक्षशिला को उसका जन्म स्थान मानना ठीक होगा।
    वी. के. सुब्रमण्यम ने कहा है कि कई संदर्भों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सिकन्दर को अपने आक्रमण के अभियान में युवा कौटिल्य से भेंट हुई थी। चूँकि अलेक्जेंडर का आक्रमण अधिकतर तक्षशिला क्षेत्र में हुआ था, इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि कौटिल्य का जन्म स्थान तक्षशिला क्षेत्र में ही रहा होगा। कौटिल्य के पिता का नाम चणक था। वह एक गरीब ब्राह्मण था और किसी तरह अपना गुजर-बसर करता था। अतः स्पष्ट है कि कौटिल्य का बचपन गरीबी और दिक्कतों में गुजरा होगा। कौटिल्य की शिक्षा-दीक्षा के संबंध में कहीं कुछ विशेष जिक्र नहीं मिलता है, परन्तु उसकी बुद्धि का प्रखरता और उसकी विद्वता उसके विचारों से परिलक्षित होती है। वह कुरूप होते हुए भी शारीरिक रूप से बलिष्ठ था। उसकी पुस्तक 'अर्शशास्त्र' के अवलोकन से उसकी प्रतिभा, उसके बहुआयामी व्यक्तित्व और दूरदर्शिता का पूर्ण आभास होता है।

    कूटनीति तथा राज्यशिल्प

    कौटिल्य ने न केवल राज्य के आन्तरिक कार्य, बल्कि वाह्य कार्यों की भी विस्तार से चर्चा की है। इस सम्बन्ध में वह विदेश नीति, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों तथा युद्ध व शान्ति के नियमों का विवेचन करता है। कूटनीति के सम्बन्धों का विश्लेषण करने हेतु उसने मण्डल सिद्धांत प्रतिपादित किया है-
    Reference :-http://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF

    सुनीता विलियम्स

                                            -: सुनीता विलियम्स :-
    Astronaut Sunita Williams
    सुनीता विलियम्‍स

    19 सितम्‍बर, 1965 को जन्‍मीं भारतीय मूल की द्वितीय महिला अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्‍स ने अंतरिक्ष अन्‍वेषण के क्षेत्र में काफी नाम कमाया। उनकी सफलता के चर्चे सारे विश्‍व में व्‍याप्‍त हैं। उनके पिता डॉ. दीपक पान्‍ड्या अमरीका में एक न्‍यूरोसर्जन हैं, जो मैसाचूसेट के फैल्‍माउथ स्‍थान के रहने वाले हैं। डॉ. दीपक पान्‍ड्या भारत में गुजरात के रहने वाले हैं। सुनीता की मां स्‍लोवेनिया मूल की महिला हैं। सुनीता विलियम्‍स की शादी माइकल जे. विलियम्‍स से हुई।

    सुनीता विलियम्‍स ने नीधम (मैसायूसेट्स) के हाई स्‍कूल से 1983 में ग्रेजुएशन तथा 1987 में अमरीकी नेवल अकेडमी से भौतिक विज्ञान में बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री प्राप्‍त की। उन्‍होंने सन 1995 में फ्लोरिडा इंस्‍टीटयूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी से इंजीनियरिंग मैनेजमेंट में मास्‍टर ऑफ साइंस की डिग्री भी प्राप्‍त की है।

    सुनीता विलियम्‍स का मिलिटरी कैरियर:
    सुनीता विलियम्‍स का मिलि‍टरी कैरियर मई 1987 में अमरीकी नेवल अकेटमी से प्रारम्‍भ हुआ। 6 महीने की अस्‍थायी नियुक्‍ित (नेवल तटवर्ती कमांड में) के बाद उन्‍हें बेसिक गोताखोर आफिसर की नियुक्ति प्रदान की गयी। उसके बाद नेवल एयर ट्रेनिंग कमांड में रखा गया तथा जुलाई 1989 में उन्‍हें नेवल एवियेटर का पद दिया गया। बाद में उनकी नियुक्ति हेलीकॉप्‍टर काम्‍बैट सपोर्ट स्‍क्‍वाड्रन में की गयी। इस दौरान उन्‍हें कई जगह पोस्‍ट किया गया। सुनीता विलियम्‍स के पास 30 प्रकार के विभिन्‍न वायुयानों को उड़ानों का 3000 घंटे का अनुभव है।

    सुनीता विलियम्‍स का नासा कैरियर:
    सुनीता विलियम्‍स का जून 1998 में नासा के द्वारा चयन हुआ तथा अगस्‍त 1998 से नासा के जॉन्‍सन अंतरिक्ष केन्‍द्र में उनका प्रशिक्षण प्रारम्‍भ हो गया। उनके प्रशिक्षण में शामिल चीजें थीं, विभिन्‍न प्रकारकी तकनीकी जानकारी एवं टूर्स, अनेक वैज्ञानिक और तकनीकी तंत्रों की ब्रीफिंग, स्‍पेश शटल और अन्‍तर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन की जानकारी, मनोवैज्ञानिक ट्रनिंग और टी-38 वायुयान के द्वारा ट्रेनिंग।

    इसके अलावा उनकी पानी के अंदर और एकांतवास प‍रिस्थितियों में भी ट्रेनिंग हुई। अपने प्रशिक्षण के दौरान विलियम्‍स ने रूसी अंतरिक्ष संस्‍था में भी कार्य किया तथा इस प्रशिक्षण में उन्‍हें अंतर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन के रूसी भाग की जानकारी दी गयी। अंतरिक्ष स्‍टेशन के रोबोटिक तंत्र के ऊपर भी विलियम्‍स को प्रशिक्षित किया गया। प्रशिक्षण के दौरान वे मई 2002 में पानी के अंदर एक्‍वैरियस हैबिटेट में 9 दिन रहीं।


    सुनीता विलियम्‍स की अं‍तरिक्ष उड़ानें:
    सुनीता विलियम्‍स दो बार अंतरिक्ष में जा चुकी हैं तथा दोनों बार वे अंतर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन 'अल्‍फा' में गईं। पाठकों की जानकारी के लिए वर्ष 1998 से अंतरिक्ष में एक विशालकाय अंतरिक्ष स्‍टेशन का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसका नाम स्‍टेशन 'अल्‍फा' है, जो 16 देशों की संयुक्‍त परियोजना है। इस स्‍टेशन का निर्माण कार्य समाप्‍त होने वाला है तथा इसमें अनेक प्रयोगशालाएं, आवासीय सुविधाएं, रो‍बोटिक भुजा और उडनशील प्‍लेटफार्म एवं जुडने वालेनोड लगे हैं। पूरा स्‍टेशन लगभग एक फुटबाल मैदान क्षेत्र में फैला हुआ है। 

    सुनीता विलियम्‍स की प्रथम अंतरिक्ष यात्रा:
    सुनीता विलियम्‍स की प्रथम अंतरिक्ष उड़ान 9 दिसम्‍बर 2006 को स्‍पेश शटल डिस्‍कवरी के द्वारा प्रारंभ हुई तथा अंतर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन के स्‍थायी अंतरिक्ष यात्री दल की वे फ्लाइट इंजीनियर थीं। बाद मे वे स्‍थायी अंतरिक्ष यात्री दल-15 की भी फ्लाइट इंजीनियर बनीं।

    अपने द्वितीय अंतरिक्ष प्रवास के दौरान विलियम्‍स ने तीन स्‍पेस वॉक कीं। स्‍पेस वॉक का अर्थ है अंतरिक्ष में अंतरिक्षयान (जिसके अंदर का पर्यावरण मानव के लिए पृथ्‍वी जैसाहोता है) से बाहर निकलकर मुक्‍त अंतरिक्ष (जहां का पर्यावरण मानव के लिएखतरनाक होता है, वहां निर्वात होता है, विकिरणों से भरा होता है और उल्‍काओं का खतरा होता है) में आकर विभिन्‍न प्रकार के रिपेयर असेम्‍बली और डिप्‍लायमेंट के कार्यों को करने को स्‍पेसवॉक कहते हैं। 

    स्‍पेस वॉक पाने जाने के लिए अंतरिक्ष यात्री एक विशेष प्रकार का सूट पहलते हैं, जिसमें उ नका जीवन रक्षा तंत्र और अन्‍य सुविधाएं लगी रहती हैं। अपने अंतरिक्ष प्रवास के दौरान सुनीता विलियम्‍स ने अंतरिक्ष स्‍टेश्‍ ान के अंदर अनेक परीक्षण किये। वे वहां पर लगी ट्रेडमिल में नियमित व्‍यायाम करतीथीं। उसी प्रवास के दौरान 16 अप्रैल 2007 को विलियम्‍स ने अंतरिक्ष से बोस्‍टन मैराथन दौड़ में हिस्‍सा लिया तथा उन्‍होंने 4 घंटे 24 मिनट में पूरा ि‍कया। उसी मैराथन दौड़ में सुनीता की बहन डियना ने भी भाग लिया था। अपनी प्रथम उड़ान के सभी कार्य पूरा कर ने के बाद वे 22 जून 2007 को स्‍पेस शटल अटलांटिस के द्वारा पृथ्‍वी पर वापस आ गयीं।

    सुनीता विलियम्‍स की द्वितीय अंतरिक्ष यात्रा:
    21 जुलाई 2011 को अमरीकी स्‍पेस शटल रिटायर हो गयी थी, इसलिए सुनीता की दूस री अंतरिक्ष यात्रा 15 सुलाई, 2012 को रूस के बेकानूर कास्‍मोड्रोस से रूसी अंतरिक्ष 'सोयुज टीएमए-05' से प्रारम्‍भ हुई। इस मिशन में सुनीता अंतरिक्ष स्‍टेशन के स्‍थायी दल 32/33 के सदस्‍य के रूप में गयीं। 17 जुलाई, 2012 को सायुज अंतरिक्षयान अंतरिक्ष  स्‍टेशन 'अल्‍फा' से जुड़ गया। 

    17 सितम्‍बर 2012 को विलियम्‍स अंतर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन की दूसरी महिला कमांडर बनीं। स्‍टेशन की प्रथम महिला कमांडर पेग्‍गी हिट्सल थीं। विलियम्‍स के साथ उनकी अंतरिक्ष उड़ान में जापानी अंतरिक्ष संस्‍था के अंतरक्षि यात्री आकी होशिंदे तथा रूसी कास्‍मोनट यूरी मैलेनचेंको भी गये। अपनी दूसरी अंतरिक्ष यात्रा के दौरान विलियम्‍स ने 3 स्‍पेस वॉकें कीं तथा कुल मिलाकर उनकी 7 स्‍पेस वॉकें हो गयीं। अपनी दूसरी अंतरिक्ष उड़ान क के सभी कार्यों को पूरा करने के बाद 19 नवम्‍बर, 2012 को वे पृथ्‍वी पर वापस आ गयीं।

    अंतरिक्ष में भारतीय तिरंगा फहराना:
    सुनीता विलियम्‍स ने 15 अगस्‍त, 2012 को भारत के 66वें स्‍वतंत्रता दिवस के मौके प र तिरंगा झंडा अंतरिक्ष में फहराया था। अंतरिक्ष से (अल्‍फा स्‍टेशन के अंदर से) उन्‍होंने एक संदेश में उन्‍होंने कहा था- '15 अगस्‍त के लिए मैं भारत को स्‍वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं भेजती हूं। भारत एक आश्‍चर्यजनक राष्‍ट्र है और भारत का एक हिस्‍सा होने पर मुझे गर्व है।'


    सुनीता विलियम्‍स के द्वारा बनाये गये विश्‍व रिकार्ड:
    01. अपनी प्रथम अंतरिक्ष उड़ान के दौरान वे 195 दिन अंतरिक्ष में रहीं। इतना लम्‍बा अंतरिक्ष्‍ ा प्रवास(एक उड़ान के द्वारा) करने वाली वे विश्‍व की प्रथम महिला हैं।
    02. अंतरिक्ष में सबसे अधिक स्‍पेसवॉक(7) करने वाली वे प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री हैं। उनके द्वारा किये गये 7 स्‍पेसवॉक की कुल अवधि 50 घंटा 40 मिनट की थी।
    03. अंतर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन की कमांटर बनने वाली वे विश्‍व की द्वितीय महिला हैं।


    सुनीता विलियम्‍स की भारत यात्रा:
    अपनी प्रथम अंतरिक्ष उड़ान के बाद सितम्‍बर, 2007 में सुनीता विलियम्‍स भारत आईं और उन्‍होंने अहमदाबाद में स्थित महात्‍मा गांधी के साबरमती आश्रम तथा अपने पैतृक गांव (झुलासन, मेहसाणा के पास) गईं। विश्‍व गुजराती समाज के द्वारा उन्‍हें 'सरदार वल्‍लभ भाई पटेल विश्‍व प्रतिमा अवार्ड' से सम्‍मानित किया गया। यह अवा र्ड पाने वाली वे भारतीय मूल की प्रथम महिला हैं, जो भारत की नागरिक नहीं हैं। उन्‍होंने 04 अक्‍टूबर, 2007 को दिल्‍ली स्थित अमरीकी दूतावात के स्‍कूल में व्‍याख्‍यान दिया तथा उसके बाद भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात क

    reference :-http://blog.scientificworld.in/2014/01/sunita-williams.html