Reference:-
http://www.scientificworld.in/2014/09/god-and-science-in-hindi.html
ईश्वर की अवधारणा
-विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी
विज्ञान द्वारा प्रस्तुत भौतिक उपलब्धियों द्वारा विश्व चमत्कृत है। इन उपलब्धियों के आधार पर अनुसन्धान से जुड़े वैज्ञानिक भौतिक विज्ञान में सभी समस्याओं का समाधान देखने लगे हैं जबकि विज्ञान द्वारा जुटाए संसाधनों का समुचित उपयोग करने के बावजूद मानव, पूर्व के किसी काल की तुलना में, आज अधिक भयभीत है। अनिष्चतता व अविश्वास का निरन्तर प्रसार हो रहा है। मानव सभ्यता विनाश के कगार के जितनी समीप आज है उतनी पहले कभी नहीं रही। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि ईश्वर की उपेक्षा कर, विज्ञान की भौतिक उपलब्धियों में सुख खोजने के कारण ही, यह स्थिति बनी है। विश्व के कई महान वैज्ञानिकों ने अपने क्षेत्र में किए अनुसंधान के दौरान अनुभव किया है कि सृष्टि के संचालन को मात्र भौतिक नियमों के बल पर नहीं समझा जा सकता। ईश्वर जैसी अदृश्य शक्ति की भूमिका को स्वीकार करके ही सृष्टि के निर्माण एवं इसके संचालन को ठीक तरह समझा जा सकता है।
वैज्ञानिक विश्लेषणों से ज्ञात हुआ है कि सभी जीवों के शरीर का 96 प्रतिशत भाग हाइड्रोजन, आक्सीजन, कार्बन तथा नाइट्रोजन, चार तत्वों से बने अणुओं का बना होता है। शेष 04 प्रतिशत खनिज होते हैं। इस तथ्य की खोज के आधार पर कहा जाने लगा कि अब तो जीवन प्रयोगशाला में रचा जा सकेगा। ऐसा कहना वैज्ञानिको का बड़बोलापन ही साबित हुआ है। जीवन कोई सरल भौतिक पदार्थ नहीं जिसे प्रयोगशाला में रचा जासके। चार्ल्स डार्विन द्वारा विकास की प्रक्रिया के प्रमाण खोजने पर यह माने जाना लगा कि नई जातियों को बनाना अब मानव के वश की बात होगी। प्रकृति में उपस्थित जीवों की अनुवांशिकता को तोड़ जोड़ कर नए जीव उत्पन्न करने का भ्रम उत्पन्न करने का प्रयास किया गया। नई जातियां बनी नहीं मगर नैतिकता के कई प्रश्न उत्पन्न हो गए हैं।
ईश्वर ही नियन्ता
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| Prof Werner Arber |
स्पष्ट है कि जीवों के विकास को ईष्वरीय हस्तक्षेप के बिना नहीं समझाया जा सकता। बात को स्पष्ट करते हुए प्रोफेसर वर्नर अर्बर कहते हैं कि सरलतम कोशिका की रचना में कई सौ प्रकार के विशिष्ट सूक्ष्म जैविक-अणुओं का उपयोग होता है। ये जैविक-अणु अपने आप में भी जटिल संरचना वाले होते हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में इनके एक साथ मिलकर कार्य करने के पीछे का रहस्य समझ से परे है।
उनका मानना है सृजनकर्ता के रूप में ईश्वर की कल्पना करके ही इसे समझा जासकता है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटीन ने भी सृष्टि के सृजन में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया है। अल्बर्ट आइन्सटीन ने कहा है कि गम्भीरता से अनुसंधान करने वाला हर वैज्ञानिक यह समझता है कि विश्व सजृन के नियमों का प्रतिपादन मानव से बहुत अधिक उत्कृष्ट किसी आत्मा(ईश्वर) द्वारा किया गया है।
सैद्धान्तिक भौतिक शास्त्री स्टेफेन अनविन (Stephen D. Unwin) ने अपनी गणना के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व की प्रायिकता 67 प्रतिशत बताई है। प्रायिकता किसी घटना के घटित होने का वैज्ञानिक अनुमान होती है। स्टेफेन अनविन ने अपनी पुस्तक दी प्रोबेबिलिटी ऑफ गॉड : सिम्पल केल्कुलेशन दैट प्रूव्स द अल्टीमेट ट्रुथ (The Probability of God: A Simple CalculationThat Proves the Ultimate Truth) में यह बात कही है। अनविन ने ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष विपक्ष में आकड़े जुटा कर ईश्वर के होने की प्रायिकता 67 प्रतिशत बताई है। ईश्वर में विश्वास करने वाले वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सृष्टि लगभग 100 अत्यन्त नाजुक संतुलनों पर आधारित है। ईश्वर ने ही इन सुन्तलनों को स्थापित किया है व साधे रखा है। अतः ईश्वर के बिना सृष्टि का अस्तित्व सम्भव नहीं है।
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| The Probability of God |
अनविन ने प्रारम्भिक तौर पर ईश्वर के होने या नहीं होने की प्रायिकता 50-50 प्रतिशत मानी। उसके बाद पक्ष विपक्ष में आंकड़े जुटाता चला गया।
हम जानते हैं कि विद्युत चुम्बकीय बल गुरुत्वाकर्षण बल का 1039 गुणा होता है। यदि विद्युत चुम्बकीय बल का मान इससे थोड़ा सा कम यानि 1033 होता तो आकाश में चमकते सितारे अपने वर्तमान भार के अरबवें भाग के बराबर ही भारी होते। उनके जलने की गति वर्तमान की तुलना में लाखों गुणा तेज होती। इसका प्रभाव यह होता कि मानव के अस्तित्व में आने के बहुत पूर्व ही सब कुछ नष्ट हो चुका होता। ईश्वर ने ही विद्युत चुम्बकीय बल को गुरुत्वाकर्षण बल की तुलना में 1039 गुणा निर्धारित कर इस सृष्टि का सृजन किया। परमाणुविक कणों प्रोटॉन व न्यूट्रान का भार ठीक उतना नहीं होता जितना अभी है तो पदार्थ का अस्तित्व संभव नहीं होता। बिना पदार्थ के सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती।
हम जानते हैं कि विद्युत चुम्बकीय बल गुरुत्वाकर्षण बल का 1039 गुणा होता है। यदि विद्युत चुम्बकीय बल का मान इससे थोड़ा सा कम यानि 1033 होता तो आकाश में चमकते सितारे अपने वर्तमान भार के अरबवें भाग के बराबर ही भारी होते। उनके जलने की गति वर्तमान की तुलना में लाखों गुणा तेज होती। इसका प्रभाव यह होता कि मानव के अस्तित्व में आने के बहुत पूर्व ही सब कुछ नष्ट हो चुका होता। ईश्वर ने ही विद्युत चुम्बकीय बल को गुरुत्वाकर्षण बल की तुलना में 1039 गुणा निर्धारित कर इस सृष्टि का सृजन किया। परमाणुविक कणों प्रोटॉन व न्यूट्रान का भार ठीक उतना नहीं होता जितना अभी है तो पदार्थ का अस्तित्व संभव नहीं होता। बिना पदार्थ के सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती।
इससे भी एक सरल परन्तु महत्वपूर्ण उदाहरण जल के असंगत प्रसार का है। जल को 4 डिग्री सेन्टीग्रेड पर, गर्म करो या ठण्डा, जल फैलता है। जल के इस एक गुण के कारण पृथ्वी का सम्पूर्ण पर्यावरण बदल गया है। इसी के कारण पृथ्वी जीवन के योग्य बन पाई है। यदि अन्य द्रवों की तरह जल भी 4 डिग्री सेन्टीग्रेड पर संकुचित होता तो पृथ्वी के समुद्र वर्ष भर जमे ही रहते। पृथ्वी का वातावरण अत्यधिक ठण्डा होता तो पृथ्वी जीवन योग्य स्थान नहीं होती। पानी में ऐसी असाधारण क्षमता का विकास करने का श्रेय ईश्वर जैसी शक्ति को ही दिया जा सकता है।
इस तरह के अनेकानेक उदाहरण विज्ञान की विभिन्न शाखाओं भौतिकी, रसायन, खगोलशास्त्र, जीवविज्ञान आदि से जुटाए जा सकते हैं। इन सब घटनाओं को मात्र संयोग नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिक भी मानते है कि सृष्टि का प्रारम्भ अरबों वर्ष पूर्व महाविस्फोट के रूप में हुआ तथा धीरे धीरे सब कुछ सृजित होता चला गया। ईश्वर जैसी सत्ता के कारण ही सुव्यवस्था संभव हो पाई। ऐसे ही उदाहरणों को ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष में मानते हुए अनविन ने इसकी प्रायिकता 67 प्रतिशत बताई है। उनका कहना है कि 67 से 100 के बीच का अन्तर आस्था के स्तर पर निर्भर करता है।
ईश्वर की कार्य प्रणाली
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| Brian David Josephson |
विज्ञान प्रयोग द्वारा पुष्ट बात पर विश्वास करता है। ईश्वर की उपस्थिति को प्रयोग द्वारा अभी तक नहीं दिखाया जा सका है। जोसेफसन के अनुसार यह कमी विज्ञान की कार्य प्रणाली की है। वैज्ञानिक अपने अनुसंधान के क्षेत्र का चयन अपनी इच्छा से करता है। अभी तक वैज्ञानिक-अनुसंधान विज्ञान के मूलभूत सिद्वान्तों तक सीमित रहा है। कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें जटिलमान कर छोड़ दिया जाता है। कई समस्याओं के समाधान नहीं मिलने पर यह मान लिया जाता है कि भविष्य में इन समस्याओं को सुलझा लिया जाएगा। सृष्टि के सृजन एवं संचालन के कई प्रश्न हैं जिनका जवाब विज्ञान के ज्ञात नियमों के आधार पर नहीं दिया जा सकता। उदाहरण के लिए मनुष्य जैसे बुद्धिमान जीव की उत्पति को अभी तक ठीक से नहीं समझाया जा सका है।
सृष्टि का अध्ययन करने पर यह तथ्य स्पष्टता से सामने आता है कि सृष्टि बहुत ही बुद्धिमता से बनाई गई है तथा उसे उतनी ही बुद्धिमता से चलाया जा रहा है। उसके निर्माण व संचालन को आकस्मिक संयोग का परिणाम नहीं माना जासकता। सृष्टि को चलाने की बुद्धिमतापूर्ण योजना के निर्माता को विधाता के रूप में स्वीकारने पर सभी बातों को सम्पूर्णता में जाना जा सकता है। जोसेफसन कहते हैं कि वैज्ञानिकों को अपना दम्भ त्याग कर यह स्वीकार करना होगा कि विज्ञान के प्रचलित नियम ईश्वर के अस्तित्व की जाँच करने या उसके कार्यों की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। भौतिक पदार्थों पर लागू नियमों को मनुष्य के आध्यात्मिक अनुभवों पर लागू नहीं किया जा सकता।
वर्तमान विज्ञान की कार्यप्रणाली की कमी को स्पष्ट करते हुए जोसेफसन कहते हैं कि मानो पृथ्वी पर दीवार चुनते किसी व्यक्ति का अवलोकन मंगल ग्रह पर बैठा कोई व्यक्ति शक्तिशाली दूरदर्शक यन्त्र की सहायता से कर रहा है। वह जो देखता है उसे विज्ञान के नियमों के अनुरूप समझाने का प्रयास करे तो वह कहेगा कि मानव मस्तिष्क से प्राप्त संवेग के कारण मांसपेशी संकुचित होती है। मांसपेशी के संकुचन के कारण हाथ द्वारा ईंटे यथास्थान रखी जाती है। वह इस क्रिया में लगने वाले विभिन्न बलों के मान की गणना भी कर लेगा। ईंट से बनने वाली दीवार को देखेगा मगर दीवार बनाने वाले व्यक्ति की बुद्धि एवं अनुभव को नहीं जान पाएगा। आज का विज्ञान इसी प्रकार सृष्टि की कार्य प्रणाली की व्याख्या करता रहा है। सृष्टि के संचालन की विज्ञान द्वारा की गई यह व्याख्या अपूर्ण है इसी कारण ईश्वर की भूमिका नजर नहीं आती।
जोसेफसन का यह भी मानना है कि वैज्ञानिक मापन के प्रचलित उपकरण जैसे सूक्ष्मदर्शी धारामापी, कण-खोजी आदि ईश्वरीय संवेदनाओं को मापने में हमारी मदद नहीं कर सकते। इनका कार्य क्षेत्र भौतिक है। सृष्टि को रचने तथा उसके संचालन में ईश्वर की भूमिका बतलाते हुए जोसेफसन कहते हैं कि सृष्टि का विकास तो विज्ञान के मूलभूत नियमों के अनुसार ही हुआ मगर विकास के हर चरण में उपलब्ध कई विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव सृष्टि के बनने के पहले से उपस्थित ईश्वर द्वारा किया गया। इसी कारण सृष्टि का निर्माण सुव्यवस्थित ढंग से होता चला गया। जोसेफसन ध्यान के माध्यम से प्राप्त चमत्कारिक अनुभवों को आत्म विकास की कुंजी मानते है। इस कुंजी के माध्यम से ही बाह्य जगत में होने वाली घटनाओं को जाना जा सकता है। इसी माध्यम से धर्म व विज्ञान के संश्लेषण को ठोस आधार प्रदान किया जा सकता है।
जोसेफसन का कहना है कि ध्यान को वैज्ञानिक अवलोकन विधि के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। धार्मिक पुस्तकों तथा सिद्धी सम्पन्न व्यक्तियों के सहयोग से स्वयं के तन्त्रिका तंत्र के माध्यम से ही ईश्वर के विषय में जाना जासकता है। क्वाटंम सिद्धान्त सृष्टि के विरोधाभासों को समझा पाने में असफल रहा है।
वैज्ञानिक डेविड बोहम (David Bohm) ने क्वाटंम सिद्धान्त की कमी को एक अव्यक्त चर राशि के उपयोग द्वारा दूर करने का प्रयास किया है। जोसेफसन का मानना है कि बोहम की समीकरण में अव्यक्त चर राशि ही अत्यन्त बुद्धिपरक है। ‘‘कैसे हो विज्ञान व धर्म का संश्लेषण’’ नामक आलेख में जोसेफसन यह समझाते है कि भौतिकशास्त्र हमारे संवेदनात्मक अनुभवों की व्याख्या करने में समर्थ है। स्वर्गिक अनुभवों को क्वान्टम भौतिकी के आधार पर समझा जा सकता है। जबकि ध्यान से प्राप्त सर्वातिरिक्त अनूभवों की व्याख्या के लिए हमें अज्ञात शक्ति का सहारा लेना होगा। वेद जैसे ग्रन्थ हमें यह सीखाते है कि हमारे भीतर जो बुद्धि है वह पूर्णतः हमारी नहीं है। बाह्य जगत से मिलने वाली ईश्वरीय प्रेरणा का इसमें बहुत योगदान होता है।
जोसेफसन कहते है कि बोहम की समीकरण में अव्यक्त को ईश्वर के रूप में देखना जोसेफसन का अपना विचार है। बहुत संभव है कि बोहम उनके विचार से सहमत नहीं हो। जोसेफसन को विश्वास है कि कुछ ही वर्षों में कोई न कोई ऐसा गणितीय सूत्र खोज लिया जाएगा जिसके कारण ईश्वर व धर्म विज्ञान के केन्द्र में होंगे।
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| David Bohm |
जोसेफसन कहते है कि बोहम की समीकरण में अव्यक्त को ईश्वर के रूप में देखना जोसेफसन का अपना विचार है। बहुत संभव है कि बोहम उनके विचार से सहमत नहीं हो। जोसेफसन को विश्वास है कि कुछ ही वर्षों में कोई न कोई ऐसा गणितीय सूत्र खोज लिया जाएगा जिसके कारण ईश्वर व धर्म विज्ञान के केन्द्र में होंगे।
आस्था और विज्ञान
आस्था को नकारने वाला विज्ञान अब उसे स्वीकारने लगा है। वैज्ञानिक कहने लगे है कि आस्था के बिना कार्य नहीं चल सकता। किसी बस में बैठते हुए या किसी वैज्ञानिक योजना को प्रारम्भ करते हुए ड्राइवर या योजना की विधि में आस्था होती है। इलेक्ट्रान को किसी ने नहीं देखा मगर वैज्ञानिक अनुसंधान में आस्था के कारण ही सब उसके अस्तित्व को स्वीकारते हैं। विज्ञान के मूल नियमों की जाँच किए बिना ही हम यह स्वीकारते है कि वे सभी जगह कार्य करते होंगे। विज्ञान व्यक्ति के स्वयं के अवलोकन पर जोर देता है लेकिन अवलोकन में जो दिखाई देता है यह सदैव सत्य हो जरूरी नहीं है। रेल की समानान्तर पटरियों को दूर तक देखने पर वे एक दूसरे के समीप आती प्रतीत होती है। पानी में डूबी सीधी छड़ भी टेडी दिखाई पड़ती है। आँखों पर लाल चश्मा पहन लेने पर श्वेत वस्तु भी लाल दिखाई देने लगती है।
नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर टोवनेस कहते है कि वैज्ञानिक यह नहीं जानता कि उसके द्वारा दिया गया कोई तर्क सही ही है। वह ऐसा विश्वास करता है कि उसका तर्क सही है। दुनिया हमें जैसी दिखाई देती है यह विश्वास पर ही निर्भर है। हम किसी प्रकार सिद्ध नहीं कर सकते कि दुनिया वैसी ही है जैसी दिखाई देती है। अतः यह कहना उचित नहीं है कि धर्म आस्था पर तथा विज्ञान ज्ञान पर आधारित है। विज्ञान भी विश्वास के बिना नहीं चल सकता।
विज्ञान मस्तिष्क से भिन्न मन की सत्ता को नकारता रहा है मगर तन्त्रिका वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों के माध्यम से यह जाना है कि मस्तिष्क से अलग मन की सत्ता होती है। फिजियोलाजी व मेडीसिन में 1967 का नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वैज्ञानिक जोर्ज वाल्ड ने आँखों के द्वारा देखता कौन है? जैसे प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मस्तिष्क के अतिरिक्त कोई और (चेतना) है जो देखता है। देखने का कार्य मात्र यांत्रिक नहीं है। यान्त्रिक रूप से कार्य करने वाला कम्प्यूटर शतरंज में मनुष्य को हरा तो सकता है मगर अपनी जीत पर खुशी नहीं मना सकता। जीत पर खुशी चेतना द्वारा ही सम्भव है। चेतना ही सजीव को र्निजीव से अलग करती है।
भारतीय सोच
भारत की वैदिक परम्परा में ब्रह्य को समस्त ब्रह्याण्ड का रचयिता माना गया है। सबको रच कर भी ब्रह्य सबसे अलग बना रहता है। प्रत्येक प्राणीमात्र में जो चेतना है ब्रह्य के कारण ही है। गीता में कहा गया है कि -
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनाहम्।।
हे अर्जुन तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। जो सदा से हो तथा कभी नष्ट नहीं हो उसे सनातन कहा गया। भारत में सनातन धर्म को स्वीकार किया है। प्रकृति के सनातन नियमों का पालन करना ही प्रत्येक का धर्म है। पूजा, उपासना कर्मकाण्ड आदि को व्यक्तिगत आस्था मानते हुए उनको धर्म से अलग माना गया है। सभी में ब्रह्य का वास मानने पर सभी एक दूसरे से सम्बधिंत हो जाते है। ब्रह्याण्ड में उपस्थित प्रत्येक वस्तु से जुड़ाव अनुभव करना ही आध्यात्मिकता है। आज हमारा संकट आध्यात्मिकता से दूर एकाकीपन का है। एकाकी सोच के कारण ही समस्याएं पैदा हो रही है। प्रदूषण की समस्या हो या जलवायु परिवर्तन की, सभी एकाकी सोच का परिणाम है।
प्राचीन भारत में विज्ञान व धर्म में अन्तर नहीं था। ऋषिगण ही विज्ञान व धर्म दोनो को देखते थे। प्रयोग आधारित विज्ञान का प्रचलन भी भारत में था। गीता में ज्ञान व विज्ञान शब्दों का साथ साथ प्रयोग हुआ है। गीता में विज्ञान का शब्द प्रयोग द्वारा प्राप्त ज्ञान के सन्दर्भ में ही हुआ है। यह ब्रह्याण्ड किससे बना है कैसे कार्य करता है इन प्रश्नों का हल जानने का प्रयास प्राचीनकाल से ही किया जाता रहा है। चिन्तन द्वारा यह भी जान लिया की सृजन ही सृष्टि का दर्शन है। उन्होंने सृष्टि के उद्देश्य को स्पष्ट करने हेतु - सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः तथा कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन जैसे सूत्रों का आविष्कार किया।
भारतीय ऋषियों ने वैज्ञानिक चिन्तन द्वारा यह जान लिया था कि खुशी भौतिक साधनों के समानुपाती तथा इच्छाओं के विलोमानुपाती होती है। उन्होंने भौतिक साधन बढ़ाने की तुलना में इच्छाओं को कम कर खुशी बढ़ाने के मार्ग को चुना। आज की आवश्यकता यह है कि सभी वैज्ञानिक आध्यामित्क दर्शन को स्वीकार कर ऋषियों की तरह कार्य करें। ऐसा होने पर ही वे व्यापक दृष्टिकोण के साथ सम्पूर्ण सृष्टि के हित में कार्य सकेंगे।




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