C v raman indian scientists
प्रकाश विद्युत प्रभाव के बाद जिस खोज ने प्लांक की क्वांटम परिकल्पना (Quantum Hypothesis) की सर्वाधिक पुष्टि की, वह खोज रामन प्रभाव (Raman Effect) के नाम से जानी जाती है। इस खोज का श्रेय जाता है महान भारतीय भौतिक विज्ञानी सर सी-वी-रामन को। आश्चर्यजनक बात ये है कि इस खोज के लिए उन्होंने किसी मंहगे उपकरण का सहारा नहीं लिया। उनके पास था मात्र चन्द सिक्कों में तैयार एक मामूली सा स्पेक्ट्रोमीटर । क्या थी यह महत्वपूर्ण खोज ‘रामन प्रभाव’?
प्राय: इन्द्रधनुष (Rainbow) बनते हुए सभी ने देखा है। सूर्य से आने वाली सफेद प्रकाश किरणें जब वायुमंडल में मौजूद पानी के कणों से गुजरती हैं तो इस प्रकाश में मौजूद विभिन्न रंगों की किरणें अलग अलग हो जाती हैं। जिसे विज्ञान की भाषा में अपवर्तन (Refraction) कहते हैं। दरअसल सफेद प्रकाश कई रंग की किरणों का मिश्रण होता है। और यही किरणें इन्द्रधनुष में अलग होकर दिखने लगती हैं। इसी तरह सफेद प्रकाश को किसी प्रिज्म से गुजारने पर अलग अलग रंगों का अपवर्तन अलग अलग दिशाओं में होने के कारण वहां भी प्रकाश का स्पेक्ट्रम (Spectrum) यानि रंगों की अलग अलग पट्टियां दिखाई देने लगती हैं। अब एक सवाल पैदा होता है। अगर एक ही रंग की प्रकाश किरण प्रिज्म से गुजारी जाये तो क्या होगा? जवाब आसान है कि वही रंग अपवर्तन के बाद भी दिखेगा। यानि कोई स्पेक्टम नहीं दिखेगा।

लेकिन रामन प्रभाव इस मान्यता को गलत सिद्व करता है। सर सी- वी- रामन ने एकवर्णीय प्रकाश (Monochromatic Light) का अध्ययन करते हुए पाया कि जब इसे किसी गैसीय या पारदर्शी माध्यम से गुजारा जाता है तो बहुत कम तीव्रता की कुछ किरणें पैदा हो जाती हैं जिनकी तरंग दैर्ध्य (Wavelength) मूल प्रकाश से थोड़ी अलग होती है। यानि एक छोटा सा स्पेक्ट्रम प्राप्त हो जाता है। यही है रामन प्रभाव। प्रकाश के एक रंग का दूसरे कई रंगों में विभक्त हो जाना प्रकाश का प्रकीर्णन (Scattering) कहलाता है। इस तरह पहली बार रामन ने प्रकाश के प्रकीर्णन की व्याख्या की। आसमान या समुन्द्र का नीला दिखना इसी प्रकीर्णन का परिणाम होता है. इसी घटना की खोज के लिए सर सी-वी-रमन को वर्ष 1930 में भौतिकी के नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सर सी-वी- रामन का जन्म हुआ था 7 नवंबर 1888 को भारत के तमिलनाडू प्रदेश में। अपनी शिक्षा पूरी करने के पश्चात उन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी में भौतिकी के प्रोफेसर के पद पर कार्य करते हुए रमन इफेक्ट तथा अन्य महत्वपूर्ण खोजें कीं।
प्लांक ने प्रकाश के बारे में परिकल्पना की थी कि वह ऊर्जा के छोटे छोटे बंडलों के रूप में चलता है। लेकिन इस परिकल्पना का कोई प्रयोगात्मक आधार नहीं था। रामन प्रभाव से स्पष्ट हुआ कि प्रकाश न सिर्फ ऊर्जा के बंडलों यानि फोटानों (Photons) के रूप में चलता है बल्कि किसी पदार्थ से टकराने पर उसकी ऊर्जा आंशिक रूप से पदार्थ के अणु में ट्रान्सफर भी हो जाती है। कम ऊर्जा का बचा हुआ फोटॉन नई प्रकाश तरंग की पैदाइश करता है। शक्तिशाली प्रकाश विकिरण वाले लेजर की खोज के बाद रामन प्रभाव का महत्व अत्यधिक हो गया है।
तनी डोरियों के कंपन से पैदा होने वाली अनुप्रस्थ तरंगों (Transverse waves) का रामन ने अध्ययन किया और भारतीय वाद्ययन्त्रों तबला इत्यादि में पैदा होने वाली हारमोनिक तरंगों पर अनेक निष्कर्ष निकाले। मधुर ध्वनि निकालने में किस तरह की फ्रीक्वेंसी शामिल होती है और कब म्यूजिक शोर में बदल जाती है, इसपर रामन ने उल्लेखनीय रिसर्च की। इसके अलावा उन्होंने अल्ट्रासोनिक तरंगों और अनुनाद इत्यादि के सम्बन्ध में उल्लेखनीय खोजें कीं। पाच सौ के लगभग शोध पत्र उनके नाम विज्ञान के क्षेत्र में दर्ज हैं।
रामन स्कैटरिंग का उपयोग रामन लेसर किरणें बनाने में होता है। एकवर्णीय प्रकाश जब पदार्थ के परमाणुओं से टकराता है तो कम ऊर्जा की प्रकाश मिलती हैं। इन्हीं तरंगों की तीव्रता बढ़ाकर रामन लेसर किरणें मिलती हैं। इन किरणों को आधुनिक इलेक्ट्रोनिकी तथा ऑप्टिकल कम्प्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में अत्यन्त उपयोगी पाया गया है।
उन्होंने बंगलौर में रामन शोध संस्थान की स्थापना की और इसी संस्थान में शोधरत रहे। भारत सरकार उन्हें भारत रत्न से विभूषित कर चुकी है। इसके अलावा उन्हें लेनिन शान्ति पुरस्कार से भी नवाजा गया।
प्रकाश विद्युत प्रभाव के बाद जिस खोज ने प्लांक की क्वांटम परिकल्पना (Quantum Hypothesis) की सर्वाधिक पुष्टि की, वह खोज रामन प्रभाव (Raman Effect) के नाम से जानी जाती है। इस खोज का श्रेय जाता है महान भारतीय भौतिक विज्ञानी सर सी-वी-रामन को। आश्चर्यजनक बात ये है कि इस खोज के लिए उन्होंने किसी मंहगे उपकरण का सहारा नहीं लिया। उनके पास था मात्र चन्द सिक्कों में तैयार एक मामूली सा स्पेक्ट्रोमीटर । क्या थी यह महत्वपूर्ण खोज ‘रामन प्रभाव’?
प्राय: इन्द्रधनुष (Rainbow) बनते हुए सभी ने देखा है। सूर्य से आने वाली सफेद प्रकाश किरणें जब वायुमंडल में मौजूद पानी के कणों से गुजरती हैं तो इस प्रकाश में मौजूद विभिन्न रंगों की किरणें अलग अलग हो जाती हैं। जिसे विज्ञान की भाषा में अपवर्तन (Refraction) कहते हैं। दरअसल सफेद प्रकाश कई रंग की किरणों का मिश्रण होता है। और यही किरणें इन्द्रधनुष में अलग होकर दिखने लगती हैं। इसी तरह सफेद प्रकाश को किसी प्रिज्म से गुजारने पर अलग अलग रंगों का अपवर्तन अलग अलग दिशाओं में होने के कारण वहां भी प्रकाश का स्पेक्ट्रम (Spectrum) यानि रंगों की अलग अलग पट्टियां दिखाई देने लगती हैं। अब एक सवाल पैदा होता है। अगर एक ही रंग की प्रकाश किरण प्रिज्म से गुजारी जाये तो क्या होगा? जवाब आसान है कि वही रंग अपवर्तन के बाद भी दिखेगा। यानि कोई स्पेक्टम नहीं दिखेगा।

लेकिन रामन प्रभाव इस मान्यता को गलत सिद्व करता है। सर सी- वी- रामन ने एकवर्णीय प्रकाश (Monochromatic Light) का अध्ययन करते हुए पाया कि जब इसे किसी गैसीय या पारदर्शी माध्यम से गुजारा जाता है तो बहुत कम तीव्रता की कुछ किरणें पैदा हो जाती हैं जिनकी तरंग दैर्ध्य (Wavelength) मूल प्रकाश से थोड़ी अलग होती है। यानि एक छोटा सा स्पेक्ट्रम प्राप्त हो जाता है। यही है रामन प्रभाव। प्रकाश के एक रंग का दूसरे कई रंगों में विभक्त हो जाना प्रकाश का प्रकीर्णन (Scattering) कहलाता है। इस तरह पहली बार रामन ने प्रकाश के प्रकीर्णन की व्याख्या की। आसमान या समुन्द्र का नीला दिखना इसी प्रकीर्णन का परिणाम होता है. इसी घटना की खोज के लिए सर सी-वी-रमन को वर्ष 1930 में भौतिकी के नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सर सी-वी- रामन का जन्म हुआ था 7 नवंबर 1888 को भारत के तमिलनाडू प्रदेश में। अपनी शिक्षा पूरी करने के पश्चात उन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी में भौतिकी के प्रोफेसर के पद पर कार्य करते हुए रमन इफेक्ट तथा अन्य महत्वपूर्ण खोजें कीं।
प्लांक ने प्रकाश के बारे में परिकल्पना की थी कि वह ऊर्जा के छोटे छोटे बंडलों के रूप में चलता है। लेकिन इस परिकल्पना का कोई प्रयोगात्मक आधार नहीं था। रामन प्रभाव से स्पष्ट हुआ कि प्रकाश न सिर्फ ऊर्जा के बंडलों यानि फोटानों (Photons) के रूप में चलता है बल्कि किसी पदार्थ से टकराने पर उसकी ऊर्जा आंशिक रूप से पदार्थ के अणु में ट्रान्सफर भी हो जाती है। कम ऊर्जा का बचा हुआ फोटॉन नई प्रकाश तरंग की पैदाइश करता है। शक्तिशाली प्रकाश विकिरण वाले लेजर की खोज के बाद रामन प्रभाव का महत्व अत्यधिक हो गया है।
तनी डोरियों के कंपन से पैदा होने वाली अनुप्रस्थ तरंगों (Transverse waves) का रामन ने अध्ययन किया और भारतीय वाद्ययन्त्रों तबला इत्यादि में पैदा होने वाली हारमोनिक तरंगों पर अनेक निष्कर्ष निकाले। मधुर ध्वनि निकालने में किस तरह की फ्रीक्वेंसी शामिल होती है और कब म्यूजिक शोर में बदल जाती है, इसपर रामन ने उल्लेखनीय रिसर्च की। इसके अलावा उन्होंने अल्ट्रासोनिक तरंगों और अनुनाद इत्यादि के सम्बन्ध में उल्लेखनीय खोजें कीं। पाच सौ के लगभग शोध पत्र उनके नाम विज्ञान के क्षेत्र में दर्ज हैं।
रामन स्कैटरिंग का उपयोग रामन लेसर किरणें बनाने में होता है। एकवर्णीय प्रकाश जब पदार्थ के परमाणुओं से टकराता है तो कम ऊर्जा की प्रकाश मिलती हैं। इन्हीं तरंगों की तीव्रता बढ़ाकर रामन लेसर किरणें मिलती हैं। इन किरणों को आधुनिक इलेक्ट्रोनिकी तथा ऑप्टिकल कम्प्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में अत्यन्त उपयोगी पाया गया है।
उन्होंने बंगलौर में रामन शोध संस्थान की स्थापना की और इसी संस्थान में शोधरत रहे। भारत सरकार उन्हें भारत रत्न से विभूषित कर चुकी है। इसके अलावा उन्हें लेनिन शान्ति पुरस्कार से भी नवाजा गया।
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