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Saturday, 23 May 2015

homi jehangir bhabha

                                        homi jehangir bhabha
                                 Bhabha atomic Research center ,Mumbai
The Bhabha Atomic Research Centre (BARC) (Hindiभाभा परमाणु अनुसन्धान केंद्रBhābhā Paramānu Anusandhān Kendra) is India's premier nuclear researchfacility based in Trombay, Mumbai. BARC is a multi-disciplinary research centre with extensive infrastructure for advanced research and development covering the entire spectrum of nuclear scienceengineering and related areas.
आज भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है। देश को इस राह पर लाने का श्रेय होमी जहाँगीर भाभा को जाता है। उनका जन्म30 अक्टुबर 1909 को मुम्बई में हुआ था। उनके पिता जहाँगीर भाभा ने ऑक्सफोर्ड से शिक्षा पाई थी। वे जानेमाने वकील थे। पारसी कुल के जहाँगीर भाभा टाटा इंटरप्राइजेज के लिए भी काम किये थे। होमी की माता भी उच्च घराने की थीं और पितामह (दादा जी) मैसूर राज्य के उच्च शिक्षा अधिकारी थे। बालक होमी को नींद बहुत कम आती थी, डॉ. के अनुसार कम नींद आना कोई बिमारी न थी बल्की तीव्र बुद्धी के कारण विचारों के प्रवाह की वजह से कम नींद आती थी। होमी के लिए पुस्तकालय की व्यवस्था घर पर ही कर दी गई थी। जहाँ वे विज्ञान तथा अन्य विषयों से संबन्धित पुस्तकों का अध्ययन करते थे।

भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक होमी की प्रारंभिक शिक्षा कैथरैडल स्कूल में हुई और आगे की शिक्षा के लिए जॉन केनन में पढने गये। विलक्षण बुद्धी के धनी होमी जहाँगीर भाभा ने मात्र 15 वर्ष की आयु में आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धान्त पढ लिया था। भौतिक शास्त्र में उनकी अत्यधिक रुची थी। गणित भी उनका प्रिय विषय था। एलफिस्टन कॉलेज से 12वीं पास करने के बाद कैम्ब्रिज में पढने गये और 1930 में मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री हासिल किये। अध्ययन के दौरान तेज बुद्धी के कारण उन्हे लगातार छात्रवृत्ती मिलती रही। 1934 में उन्होने पीएचडी की डिग्री हासिल की, इसी दौरान होमी भाभा को आइजेक न्यूटन फेलोशिप मिली। होमी भाभा को प्रसिद्ध वैज्ञानिक रुदरफोर्ड, डेराक, तथा नील्सबेग के साथ काम करने का अवसर मिला था।

होमी भाभा ने कॉस्केटथ्योरी ऑफ इलेक्ट्रान का प्रतिपादन करने साथ ही कॉस्मिक किरणों पर भी काम किया जो पृथ्वी की ओर आते हुए वायुमंडल में प्रवेश करती है। उन्होने कॉस्मिक किरणों की जटिलता को सरल किया। दूसरे विश्वयुद्ध के प्रारंभ में होमी भारत वापस आ गये। उस समय तक होमी भाभा विश्व ख्याती प्राप्त कर चुके थे, यदि चाहते तो किसी भी देश में उच्च पद पर कार्य करके अच्छा वेतन पा सकते थे। परन्तु उन्होने मातृभूमी के लिए कार्य करने का निश्चय किया। 1940 में भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलौर में सैद्धान्तिक रीडर पद पर नियुक्त हुए। उन्होने कॉस्मिक किरणों की खोज के लिए एक अलग विभाग की स्थापना की। 1941 में मात्र 31 वर्ष की आयु में आपको रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुना गया था। नोबल पुरस्कार विजेता प्रो. सी.वी. रमन भी होमी भाभा से प्रभावित थे।

शास्त्रिय संगीत, मूर्तीकला तथा नित्य आदि क्षेत्रों के विषयों पर भी आपकी अच्छी पकङ थी। वे आधुनिक चित्रकारों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके चित्रों को खरीद कर टॉम्ब्रे स्थित संस्थान में सजाते थे। संगीत कार्यक्रमों में सदैव हिस्सा लेते थे और कला के दूसरे पक्ष पर भी पूरे अधिकार से बोलते थे, जितना कि विज्ञान पर। उनका मानना था कि सिर्फ विज्ञान ही देश को उन्नती के पथ पर ले जा सकता हैं।

होमी भाभा ने टाटा को एक संस्थान खोलने के लिए प्रेरित किया। टाटा के सहयोग से होमी भाभा का परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का सपना साकार हुआ। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने की महात्वाकांक्षा मूर्तरूप लेने लगी, जिसमें भारत सरकार तथा तत्कालीन मुम्बई सरकार का पूरा सहयोग मिला। नव गठित टाटा इन्सट्यूट ऑफ फण्डामेंटल रिसर्च के वे महानिदेशक बने। उस समय विश्व में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने वाले कम ही देश थे। जब हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा तब सारी दुनिया को परमाणु शक्ति का पता चला। होमी भाभा औरजे.आर.डी. टाटा दोनो ही दूरदर्शी थे, उन्होने केन्द्र को आगे बढाया। इस केन्द्र में पाँच विभाग शुरू किया गया भौतिकी, अभियांत्रिक, धात्विक, इलेक्ट्रॉनिक और जीवविज्ञान। भाभा परमाणु शक्ति के खतरे से भी वाकिफ थे अतः उन्होने वहाँ एक चिकित्सा विभाग तथा विकिरण सुरक्षा विभाग भी खोला। प्रकृति प्रेमी होमी भाभा के प्रयासों से टाम्ब्रे संस्थान निरस वैज्ञानिक संस्थान नही था वहाँ चारो ओर हरे भरे पेङ-पौधे तथा फलदार वृक्ष संस्था को मनोरमता प्रदान करते हैं।

होमी भाभा का उद्देश्य था कि भारत को बिना बाहरी सहायता से परमाणु शक्ति संपन्न बनाना। मेहनती और सक्रिय लोगों को पसंद करने वाले होमी भाभा अंर्तराष्ट्रीय मंचो पर अणुशक्ति की शान्ती पर बल देते थे। वे मित्र बनाने में भी उदार थे। निजी प्रतिष्ठा की लालसा उनके मन में बिलकुल न थी, एक बार केन्द्रिय मंत्रीमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव मिला किन्तु उन्होने नम्रतापूर्ण प्रस्ताव को अस्विकार कर दिया। मंत्री पद के वैभव से ज्यादा प्यार उन्हे विज्ञान से था।

1955 में होमी भाभ जिनेवा में आयोजित एक सम्मेलन में भाग लेने गये थे, वहां कनाडा ने भारत को परमाणु रिएक्टर बनाने में सहयोग देने का प्रस्ताव दिया। जिसको उचित समझते
Reference :-google ,Wikipedia , acchikhabar .com

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