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Sunday, 17 May 2015

आर्यभट्ट का जीवन

आर्यभट्ट का जीवन

आर्यभट्ट के जन्मकाल को लेकर जानकारी उनके ग्रंथ आर्यभट्टीयम से मिलती है.  इसी ग्रंथ में उन्होंने कहा है कि “कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके हैं और मेरी आयु 23 साल की है, जबकि मैं यह ग्रंथ लिख रहा हूं.” भारतीय ज्योतिष की परंपरा के अनुसार कलियुग का आरंभ ईसा पूर्व 3101 में हुआ था. इस हिसाब से 499 ईस्वी में आर्यभट्टीयम की रचना हुई. इस लिहाज से आर्यभट्ट का जन्म 476 ईस्वी में हुआ माना जाता है. लेकिन उनके जन्मस्थान के बारे में मतभेद है. कुछ विद्वानों का कहना है कि इनका जन्म नर्मदा और गोदावरी के बीच के किसी स्थान पर हुआ था, जिसे संस्कृत साहित्य में अश्मक देश के नाम से लिखा गया है। अश्मक की पहचान एक ओर जहाँ कौटिल्य के “अर्थशास्त्र” के विवेचक आधुनिक महाराष्ट्र के रूप मे करते हैं, वहीं प्राचीन बौद्ध स्रोतों के अनुसार अश्मक अथवा अस्सक दक्षिणापथ (Daccan) में स्थित था. कुछ अन्य स्रोतों से इस देश को सुदूर उत्तर में माना जाता है, क्योंकि अश्मक ने ग्रीक आक्रमणकारी सिकन्दर (Alexander, 4 BC) से युद्ध किया था
आर्यभट्ट की शिक्षा

माना जाता है कि आर्यभट्ट की उच्च शिक्षा कुसुमपुर में हुई और कुछ समय के लिए वह वहां रहे भी थे. हिंदू तथा बौद्ध परंपरा के साथ-साथ भास्कर ने कुसुमपुर को पाटलीपुत्र बताया जो वर्तमान पटना के रूप में जाना जाता है. यहाँ पर अध्ययन का एक महान केन्द्र, नालन्दा विश्वविद्यालय स्थापित था और संभव है कि आर्यभट्ट इसके खगोल वेधशाला के कुलपति रहे हों. ऐसे प्रमाण हैं कि आर्यभट्ट-सिद्धान्त में उन्होंने ढेरों खगोलीय उपकरणों का वर्णन किया है.


नालंदा विश्विद्यालय
यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। वर्तमानबिहार राज्य में पटना से ८८.५ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से ११.५ किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शताब्दी में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। यहाँ १०,००० छात्रों को पढ़ाने के लिए २,००० शिक्षक थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ७ वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।


स्थापना व संरक्षणसंपादित करें

इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७० को प्राप्त है।[4][5] इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धनऔर पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानीय शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।

स्वरूपसंपादित करें

यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २००० थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसाङ आया था उस समय १०,००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरियाजापानचीनतिब्बतइंडोनेशियाफारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थी।

आर्यभट्ट के कार्य

आर्यभट्ट गणित और खगोल विज्ञान पर अनेक ग्रंथों के लेखक हैं, जिनमें से कुछ खो गए हैं. उनकी प्रमुख कृति, आर्यभट्टीयम, गणित और खगोल विज्ञान का एक संग्रह है, जिसे भारतीय गणितीय साहित्य में बड़े पैमाने पर उद्धृत किया गया है, और जो आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है. आर्यभट्टीयम के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति शामिल हैं. इसमें निरंतर भिन्न (कॅंटीन्यूड फ़्रेक्शन्स), द्विघात समीकरण(क्वड्रेटिक इक्वेशंस), घात श्रृंखला के योग(सम्स ऑफ पावर सीरीज़) और जीवाओं की एक तालिका(टेबल ऑफ साइंस) शामिल हैं.


आर्यभट की रचना

आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है. दशगीतिका, आर्यभट्टीयम और तंत्र लेकिन जानकारों की मानें तो उन्होंने और एक ग्रंथ लिखा था- ‘आर्यभट्ट सिद्धांत‘. इस समय उसके केवल 34 श्लोक ही मौजूद हैं. उनके इस ग्रंथ का सातवें दशक में व्यापक उपयोग होता था. लेकिन इतना उपयोगी ग्रंथ लुप्त कैसे हो गया इस विषय में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती.


आर्यभट्ट ने गणित और खगोलशास्त्र में और भी बहुत से कार्य किए. अपने द्वारा किए गए कार्यों से इन्होंने कई बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को नए रास्ते दिए. भारत में इनके नाम पर कई संस्थान खोले गए हैं जिसमें कई तरह के शोध कार्य किए जाते हैं.

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