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यह अंतरिक्ष शोध के क्षेत्र में हमारी कामयाबी का ही परिणाम है कि आज धरती और आसमान की दूरी सिमट सी गई है और मानव चंद्रमा पर घर बनाने के सपने को मूर्त रूप देने की तैयारी कर रहा है।
हमारे वैज्ञानिकों के अनुसंधानों के परिणामस्वरूप कई अंतरिक्षयान अंतरिक्ष के अनसुलझे रहस्यों का पर्दाफाश कर रहे हैं। इसी श्रृंखला में हाल ही में 'चंद्रयान' ने चंद्रमा की ओर उड़ान भरी।
वर्ष 2003 में अंतरिक्ष की शोध के इसी प्रकार के 'नासा' के एक अनूठे मिशन का हिस्सा बनी थी भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री 'कल्पना चावला'। जिसने दुनियाभर के लोगों की उम्मीदों को पूरा करने के लिए छह अंतरिक्षयात्रियों के साथ 'कोलंबिया' अंतरिक्षयान में उड़ान भरी थी।
अपने कार्य को सफलतापूर्वक करने के बाद जब कल्पना धरती पर पुन: कदम रखने ही वाली थीं कि वायुमंडल में 'कोलंबिया'के टुकड़े-टुकड़े हो गए और धूल और धुएँ के गुबार के साथ कल्पना भी कहीं गुम हो गई।
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| कल्पना चावला |
भारत की कल्पना चावला का जन्म करनाल, हरियाणा, में एक पंजाबी हिंदू भारतीय परिवार में पैदा हुआ था कल्पना का संस्कृत में मतलब है कल्पना करना इमेजिनेशन उड़ान में उसकी रुचि जेआरडी टाटा (JRD Tata), जो एक अग्रणी भारतीय पायलट और उद्योगपति थे उनसे प्रेरित हो कर हुई थी.
कल्पना ने टैगोर पब्लिक स्कूल, करनाल से स्कूली शिक्षा ली और वह 1982 में चंडीगढ़, भारत, में पंजाब इंजीनियरिंग से आगे की पढाई की और 1984 में टेक्सास विश्वविध्यालय (Texas University) से एरोस्पेस इंजनियरिंग (Aerospace Engineering) में मास्टर ऑफ़ साइंस की डिग्री ली.
1988 में कल्पना ने नासा (NASA) के एम्स रिसर्च सेंटर (Ames Research Center) में काम करना शुरू किया. 1994१ में कल्पना चावला का नासा के द्वारा चयन किया गया और मार्च 1995 में अन्तरिक्ष यात्रियों के 15वें ग्रुप में कल्पना चावला का अन्तरिक्ष यात्री के रूप में चयन हुआ.
जानसन स्पेस सेंटर (Johnson Space Center) में एक साल के प्रशिक्षण के बाद कल्पना चावला की अन्तरिक्ष यात्री के प्रतिनिधि के रूप में तकनीकी क्षेत्रों के नियुक्ति की गयी. यहाँ पर उनके दो प्रमुख काम थे रोबोटिक उपकरणों (Robotic Equipments) का विकास और स्पेस शटल (Space Shuttle) को नियंत्रित करने वाले साफ्टवेयर की शटल एवियोनिक्स प्रयोगशाला (Shuttle Avionics Integration Laboratory) में टेस्टिंग करना.
कल्पना चावाला की प्रथम उड़ान एस टी एस 87 कोलम्बिया (STS 87 Columbia) शटल से सम्पन्न हुई.इसकी अवधि 19 नवम्बर 1997 से 5 दिसम्बर 1997 थी. इसमें उन परीक्षणों पर जोर दिया गया किअन्तरिक्ष में भारहीनता किस तरह से भौतिक क्रियाओं को प्रभावित करती है. यह मिशन अन्तरिक्ष में 376 घंटे और 34 मिनट रहा और इस दौरान स्पेस शटल ने धरती की 252 परिक्रमायें कीं.
कल्पना की दूसरी और आखिरी उड़ान 16 जनवरी 2003 को स्पेस शटल कोलम्बिया से शुरू हुई. यह 16 दिन का अन्तरिक्ष मिशन था, जो पूरी तरह से विज्ञान और अनुसन्धान पर आधारित था. इस मिशन में अन्तरिक्ष यात्रियों ने 2 दिन काम किया था और 80 परिक्षण और प्रयोग सम्पन्न किये थे. लेकिन 01 फरवरी 2003 को कोल्म्बियाँ स्पेस शटल लेंडिंग से पहले ही दुर्घटना ग्रस्त हो गया और कल्पना के साथ बाकी सभी 6 अन्तरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गयी ...
उनकी दूसरी उड़ान को देखने उनके माता पिता और उनकी दोनों बहने भी भारत से अमेरिका गए थे और वहां पर उसकी वापसी का इन्तजार कर रहे थे पर वक़्त को कुछ और मंजूर था कल्पना वापस नहीं आई वह कल्पनाओं में ही खो गयी
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पुरस्कार
कल्पना चावला को मरणोपरांत: निम्न पुरस्कार मिले-
- काँग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान
- नासा अंतरिक्ष उड़ान पदक
- नासा विशिष्ट सेवा पदक
- प्रतिरक्षा विशिष्ट सेवा पदक
Kalpana Chawla: इन्होंने 21वीं सदी में महिलाओं की सोच को बदला
21वीं सदी में भारत की महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कई सालों चली सामाजिक जकड़न से बाहर निकलना. कुछ महिलाएं तो समाज की बेड़ियों को तोड़कर आजाद हो गईं लेकिन कुछ महिलाएं अभी भी ऐसा करने से डर रही थीं. फिर दौर आया कल्पना चावला का जिसने हर तरह की सीमाओं से आगे निकलते हुए अंतरिक्ष पर पहुंचकर न केवल देश का नाम रौशन किया बल्कि लाखों करोड़ों महिलाओं की प्रेरणा बनीं. आज भारतीयों खासकर महिलाओं को कल्पना चावला (Kalpana Chawala) पर फ़क्र है और वे उनकी सफलता के किस्से सुनाते नहीं थकतीं.


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