""गुस्सा कम करने का उपाय 'story' """
आजकल यह देखा गया है की सभी अपने काम में इतने बिजी रहते की उसे किसी और का ख्याल ही नही रहता ,उसके ऊपर काम के बोझ से हमेसा ऊबे हुए रहता है। जल्दी जल्दी काम को खत्म करने में कुछ तो मिस्टेक हो ही जाती है , जिससे उसके ऊपर अपने बॉस का गुस्सा या अगर अपना काम हो तो कुछ गलत हो जाये तो खुद पर गुस्सा आता है , और जब ऑफिस से घर जाता है तो वह अपना गुस्सा अपनी बीबी या बच्चे पर उतार देते है । काम आदमी को खुसी से करना चाहिए न की टेंशन ले कर आप तो खुद काम के तले बोझ से दब जाते है , काम उतना ही करे की आप को गुस्सा खुद पर न हो , कल पर छोर दे काम , जिअन्दगी प्यार से जीने का है न की टेंशन ले कर ।अगर आप सोचते है की आज काम जल्दी जल्दी ख़त्म कल ले तो कल काम नही करने को मिलेगा ऐसा कवि नही होगा , काम किसी का कभी समाप्त नही होती , अगर आज एक काम खत्म करते है आज तो कल खुद कोई दूसरा काम लग जायेगा । जिंदगी में काम का कोई end नही है , आप कोई काम जल्दी जल्दी के फेर में मत रहिये । काम को प्यार से करिये ,और आप खुस रहिये और अपने बीबी बच्चे को खुस रखिये ।क्योकि आप खुस रहैंगे तब हि आप के फैमली वाले खुस रहैंगे ।हमलोग भारतीय है ,हमलोग एक दूसरे का हाथ से हाथ मिलाकर खुसी से जीते है , तथा जो दुखी में होते है या परेसान होते है उसे उसकी परेसानी का हल निकल कल साथ में खुसी बाटते है , खुसी बाटने की चीज़ है और यह हमे एक दूसरे को समझ कर ही खुसी पा सकते है ।
"""'''एक लड़का था। उम्र यही कोई 12-13 साल। उसे क्रोध बहुत आता था। बात-बात
में उसे क्रोध आ जाता। और ऐसे समय में उसका खुद पर नियंत्रण नहीं रहता। कभी
वह घर के सामान तोड़-फोड़ देता, कभी किसी को पीट देता और कभी इस चक्कर
में बुरी तरह से पिट भी जाता।
एक बार ऐसे ही खेलते समय उसे किसी बात पर
क्रोध आ गया। वह बिना बात के साथी
लड़कों से झगड़ पड़ा। लड़के उसकी आदत से बुरी
तरह से परेशान थे। इसलिए सभी ने मिलकर
उसकी कस कर धुनाई कर दी।
मार खा कर जब वह अपने घर पहुंचा तो स्वयं
को बड़ा अपमानित महसूस कर रहा था। यह
देखकर उसके पिता बोले- 'तुम चाहो, तो अपने
इस क्रोध पर नियंत्रण कर सकते हो।' लड़के ने झट
से पूछा- 'कैसे?'
पिता ने उसे ढेर सारी कीलें दीं और कहा, 'जब भी तुम्हें क्रोध आए, घर के सामने
लगे पेड़ में ढ़ेर सारी कीलें ठोंक देना।' यह सुनकर लडके ने पूछा- 'पर कीलों से क्रोध
के नियंत्रण कैसे होगा?' पिता ने उसे समझाते हुए कहा- 'तुम करके तो देखो, शायद
कोई फायदा हो ही जाए।' लड़के को बात समझ में आ गयी। उसने पिता की बात
मान ली और कीलों को अपने पास रख लिया।
अगले दिन सुबह-सुबह लडके की अपने छोटे भाई से झड़प हो गयी। उसे बहुत क्रोध
आया। वह अपने भाई को मारने ही जा रहा था कि उसे पिता की कही बात
याद आ गयी। लड़के ने कीलें उठाईं और पेड़ में ठोंकनी शुरू कर दीं। हालांकि यह
काम काफी कष्टप्रद था, पर फिरभी वह तब तक कीलें ठोंकता रहा, जब तक
उसका गुस्सा शांत नहीं हो गया। शांत होने के बाद उसने कीलों को गिनना शुरू
किया, कुल 30 कीलें थीं।
अगले दिन लड़के को फिर गुस्सा आया। उसने उस दिन 25 कीलें ठोकीं। उसके अगले
दिन उसने गुस्सा आने पर सिर्फ 15 कीलें ही ठोकीं। धीरे-धीरे दिन बीतते रहे और
उसक द्वारा ठोंकी जाने वाली कीलों की संख्या कम होती गयी। और एक दिन
ऐसा भी आया, जब क्रोध आने पर उसे कील ठोंकने की इच्छा न रही। क्योंकि उसे
यह समझ में आ गया था कि पेड़ में कीलें ठोंकने के बजाय क्रोध पर नियंत्रण करना
आसान है।
यह देखकर उसके पिता मुस्कराए और उन सारी कीलों को निकालने का निर्देश
दिया। यह सुनकर पहले तो लड़के को खीझ आई, लेकिन फिर उसने जैसे-तैसे उन
कीलों को निकाल दिया। जब उसने अपने पिता को काम पूरा हो जाने के बारे
में बताया तो पिता बेटे का हाथ थामकर उसे पेड़ के पास लेकर गया। पिता ने पेड़
को देखते हुए बेटे से कहा– 'बेटे, पेड़ के तने पर बने इन सैकडों कीलों के निशानों को
देखो। इनकी वजह से पेड़ कितना बदसूरत हो गया है। इसी तरह जब भी तुम किसी
पर क्रोध करते हो, तो ऐसे ही घाव के गहरे निशान सामने वाले के मन पर बन जाते
हैं।'
'आप ठीक कहते हैं पिताजी, मैं इन कीलाें के घाव को महसूस कर सकता हूं।' कहते
हुए लड्के ने कीलों का डिब्बा पिता को वापस कर दिया। क्योंकि अब उसे
क्रोध को नियंत्रित करने के लिए कीलों को ठोंकने की जरूरत नहीं रह गयी थी।
कीलों के निहितार्थ और क्रोध के दुष्परिणाम, दोनों को वह भलीभांति समझ
चुका था।"""'"""


No comments:
Post a Comment