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Monday, 18 May 2015

c v Raman



जन्म- 7 नवंबर 1888
मृत्यु- 21 नवंबर 1970


प्रकाश के प्रकीर्णन और रमन प्रभाव की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई और अश्वेत भौतिक वैज्ञानिक सर सीवी रमन आधुनिक भारत के महान वैज्ञानिक माने जाते हैं।

सीवी रमन का जन्म : दक्षिण भारत के त्रिचुनापल्ली में पिता चंद्रशेखर अय्यर व माता पार्वती अम्मा के घर में 7 नवंबर 1888 को जन्मे भौतिक शास्त्री चंद्रशेखर वेंकट रमन उनके माता पिता के दूसरे नंबर की संतान थे। उनके पिता चंद्रशेखर अय्यर महाविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता थे।

रमन की पढ़ाई और नौकरी : बेहतर शैक्षिक वातावरण में पले बढ़े सीवी रमन ने अनुसंधान के क्षेत्र में कई कीर्तिमान स्थापित किए। भारत में विज्ञान को नई ऊंचाइयां प्रदान करने में उनका काफी बड़ा योगदान रहा है।

प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से भौतिक विज्ञान से स्नातकोत्तर की डिग्री लेने वाले श्री रमन को गोल्ड मैडल प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने भी विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के उन्हें भारत रत्न सम्मान से नवाजा। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दिए जाने वाले प्रतिष्ठित लेनिन शांति पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया।

वैज्ञानिक के तौर पर दुनियाभर में जाने गए रमन की गणित में जबर्दस्त रूचि थी और उनकी पहली नौकरी कोलकाता में भारत सरकार के वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार की थी। देश को आजादी मिलने के बाद 1947 में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय प्रोफेसर नियुक्त किया था।

सर चंद्रशेखर वेंकट रमन के पिता गणित एवं भौतिकी के अध्यापक थे इसलिए उनका लालन-पालन बिल्कुल उसी माहौल में हुआ। उनकी मां पार्वती अम्मल घरेलू महिला थीं। रमन बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने महज 11 वर्ष की आयु में उच्चतर माध्यमिक की पढ़ाई पूरी कर ली लेकिन विदेश जाना शायद उनकी किस्मत में नहीं था और स्वास्थ्य खराब होने के कारण वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश नहीं जा सके। उन्होंने 1902 में मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया और 1904 में बीएससी (भौतिकी) की डिग्री हासिल की।

वर्ष 1907 में उन्होंने एमएससी की डिग्री हासिल की। फिर कोलकाता में भारत सरकार के वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार के तौर पर सेवारत हुए। दफ्तर के काम से फुरसत मिलने के बाद वह इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन साइंस की प्रयोगशाला में प्रयोग करते थे। इसी परिश्रम के पारितोषिक के तौर पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।

रमन ने 1917 में सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया और कोलकाता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर बन गए। इस दौरान उन्होंने आईएसीएस में अपना अनुसंधान जारी रखा। उन्होंने वर्ष 1929 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 16 वें सत्र की अध्यक्षता भी की। रमन को वर्ष 1930 में प्रकाश के प्रकीर्णन और रमण प्रभाव की खोज के लिए भौतिकी के क्षेत्र में प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इसी पर रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी आधारित है और उनके सिद्धांत का इस्तेमाल कर दुनिया के कई अन्य वैज्ञानिकों ने नए सिद्धांत प्रतिपादित किए। रमन प्रभाव पर आज भी काम हो रहा है।

वह वर्ष 1934 में बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के निदेशक बने। रमन ने स्टिल की स्पेक्ट्रम प्रकृति पर भी काम किया। उन्होंने नए सिरे से स्टिल डाइनेमिक्स के बुनियादी मुद्दों पर काम किया। उन्होंने हीरे की संरचना और गुणों पर भी काम किया। अनेक रंगदीप्त पदार्थो के प्रकाशीय आचरण पर भी शोध किया। वह वर्ष 1948 में आईआईएस से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने बेंगलुरू में रमन रिसर्च इंस्टीटयूट की स्थापना की। उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में योगदान के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

सीवी रमन की उपलब्धि : भौतिकी विशेषज्ञ सर सीव. रमन द्वारा 'रमन इफैक्ट' की खोज के उपलक्ष्य में 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने ही पहली बार तबले और मृदंगम के संनादी (हार्मोनिक) की प्रकृति का पता लगाया था।

विज्ञान के क्षेत्र में योगदान के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें वर्ष 1929 में नाइटहुड, वर्ष 1954 में भारत रत्न तथा वर्ष 1957 में लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले सीवी रमन पहले भारतीय वैज्ञानिक बने।


'रमन प्रभाव' की खोज भारतीय भौतिक शास्त्री सर सीवी रमन द्वारा दुनिया को दिया गया विशिष्ट उपहार है। इस खोज के लिए उन्हें विश्व प्रतिष्ठित पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और भारत में इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

'रमन प्रभाव' विश्व को दिए गए इस अनूठी खोज के बाद ही उन्हें वर्ष 1930 में प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

सरकारी नौकरी

रामन कोलकाता में सहायक महालेखापाल के पद पर नियुक्त थे, किंतु रामन का मन बहुत ही अशांत था क्योंकि वह विज्ञान में अनुसंधान कार्य करना चाहते थे। एक दिन दफ़्तर से घर लौटते समय उन्हें 'इण्डियन एसोसिएशन फॉर कल्टिवेशन ऑफ साइंस' का बोर्ड दिखा और अगले ही पल वो परिषद के अंदर जा पहुँचे। उस समय वहाँ परिषद की बैठक चल रही थी। बैठक में आशुतोष मुखर्जी जैसे विद्वान उपस्थित थे। यह परिषद विज्ञान की अग्रगामी संस्था थी। इसके संस्थापक थे डॉक्टर महेन्द्रलाल सरकार। उन्होंने सन् 1876 में देश में वैज्ञानिक खोजों के विकास के लिए इसकी स्थापना की थी। कई कारणों से इस इमारत का वास्तविक उपयोग केवल वैज्ञानिकों के मिलने या विज्ञान पर भाषण आदि के लिए होता था। संस्था की प्रयोगशाला और उपकरणों पर पड़े-पड़े धूल जमा हो रही थी। जब रामन ने प्रयोगशाला में प्रयोग करने चाहे तो सारी सामग्री और उपकरण उनके सुपुर्द कर दिये गये। इस तरह परिषद में उनके वैज्ञानिक प्रयोग शुरू हुए और उन्होंने वह खोज की जिससे उन्हें 'नोबेल पुरस्कार' मिला।
रामन सुबह साढ़े पाँच बजे परिषद की प्रयोगशाला में पहुँच जाते और पौने दस बजे आकर ऑफिस के लिए तैयार हो जाते। ऑफिस के बाद शाम पाँच बजे फिर प्रयोगशाला पहुँच जाते और रात दस बजे तक वहाँ काम करते। यहाँ तक की रविवार को भी सारा दिन वह प्रयोगशाला में अपने प्रयोगों में ही व्यस्त रहते। वर्षों तक उनकी यही दिनचर्या बनी रही। उस समय रामन का अनुसंधान संगीत-वाद्यों तक ही सीमित था। उनकी खोज का विषय था कि वीणा, वॉयलिन, मृदंग और तबले जैसे वाद्यों में से मधुर स्वर क्यों निकलता है। अपने अनुसंधान में रामन ने परिषद के एक साधारण सदस्य आशुतोष डे की भी सहायता ली। उन्होंने डे को वैज्ञानिक अनुसंधान के तरीकों में इतना पारंगत कर दिया था कि डे अपनी खोजों का परिणाम स्वयं लिखने लगे जो बाद में प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। रामन का उन व्यक्तियों में विश्वास था जो सीखना चाहते थे बजाय उन के जो केवल प्रशिक्षित या शिक्षित थे। वास्तव में जल्दी ही उन्होंने युवा वैज्ञानिकों का एक ऐसा दल तैयार कर लिया जो उनके प्रयोगों में सहायता करता था। वह परिषद के हॉल में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए भाषण भी देने लगे, जिससे युवा लोगों को विज्ञान में हुए नये विकासों से परिचित करा सकें। वह देश में विज्ञान के प्रवक्ता बन गये। रामन की विज्ञान में लगन और कार्य को देखकर कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपतिआशुतोष मुखर्जी जो 'बगाल के बाघ' कहलाते थे, बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से अनुरोध किया कि रामन को दो वर्षों के लिए उनके काम से छुट्टी दे दी जाए जिससे वह पूरी तन्मयता और ध्यान से अपना वैज्ञानिक कार्य कर सकें। लेकिन सरकार ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसी दौरान परिषद में भौतिक शास्त्र में 'तारकनाथ पालित चेयर' की स्थापना हुई। चेयर एक ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक को मिलने वाली थी, मगर मुखर्जी उत्सुक थे कि चेयर रामन को मिले। चेयर के लिए लगाई गई शर्तों में रामन एक शर्त पूरी नहीं करते थे कि उन्होंने विदेश में काम नहीं किया था। मुखर्जी ने रामन को बाहर जाने के लिए कहा मगर उन्होंने साफ़ इन्कार कर दिया। उन्होंने मुखर्जी से विनती की कि यदि उनकी सेवा की आवश्यकता है तो इस शर्त को हटा दिया जाये। अन्ततः मुखर्जी साहब ने ऐसा ही किया। रामन ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और सन् 1917 में एसोसिएशन के अंतर्गत भौतिक शास्त्र में पालित चेयर स्वीकार कर ली। इसका परिणाम- धन और शक्ति की कमी, लेकिन रामन विज्ञान के लिए सब कुछ बलिदान करने को तैयार थे। मुखर्जी साहब ने रामन के बलिदान की प्रशंसा करते हुए कहा,-
"इस उदाहरण से मेरा उत्साह बढ़ता है और आशा दृढ़ होती है कि 'ज्ञान के मन्दिर' जिसे बनाने की हमारी अभिलाषा है, में सत्य की खोज करने वालों की कमी नहीं होगी।" इसके पश्चात रामन अपना पूरा समय विज्ञान को देने लगे।
कुछ दिनों के पश्चात रामन का तबादला बर्मा (अब म्यांमार) के रंगून (अब यांगून) शहर में हो गया। रंगून में श्री रामन मन नहीं लगता था क्योंकि ‌वहां प्रयोग और अनुसंधान करने की सुविधा नहीं थी। इसी समय रामन के पिता की मृत्यु हो गई। रामन छह महीनों की छुट्टी लेकर मद्रास आ गए। छुट्टियाँ पूरी हुईं तो रामन का तबादला नागपुर हो गया।

विदेश में श्री रामन

वेंकटरामन ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की 'एम. आर. सी. लेबोरेट्रीज़ ऑफ़ म्यलूकुलर बायोलोजी' के स्ट्रकचरल स्टडीज़ विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक थे। सन 1921 में ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड में हो रही यूनिवर्सटीज कांग्रेस के लिए रामन को निमन्त्रण मिला। उनके जीवन में इससे एक नया मोड़ आया। सामान्यतः समुद्री यात्रा उकता देने वाली होती है क्योंकि नीचे समुद्र और ऊपर आकाश के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता है। लेकिन रामन के लिए आकाश और सागर वैज्ञानिक दिलचस्पी की चीज़ें थीं। भूमध्य सागर के नीलेपन ने रामन को बहुत आकर्षित किया। वह सोचने लगे कि सागर और आकाश का रंग ऐसा नीला क्यों है। नीलेपन का क्या कारण है।

रामन शोध संस्थान,बंगलौर
Raman Research Institute, Bangalore
रामन जानते थे लॉर्ड रेले ने आकाश के नीलेपन का कारण हवा में पाये जाने वाले नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं द्वारा सूर्य के प्रकाश की किरणों का छितराना माना है। लॉर्ड रेले ने यह कहा था कि सागर का नीलापन मात्र आकाश का प्रतिबिम्ब है। लेकिन भूमध्य सागर के नीलेपन को देखकर उन्हें लॉर्ड रेले के स्पष्टीकरण से संतोष नहीं हुआ। जहाज़ के डेक पर खड़े-खड़े ही उन्होंने इस नीलेपन के कारण की खोज का निश्चय किया। वह लपक कर नीचे गये और एक उपकरण लेकर डेक पर आये, जिससे वह यह परीक्षण कर सकें कि समुद्र का नीलापन प्रतिबिम्ब प्रकाश है या कुछ और। उन्होंने पाया कि समुद्र का नीलापन उसके भीतर से ही था। प्रसन्न होकर उन्होंने इस विषय पर कलकत्ते की प्रयोगशाला में खोज करने का निश्चय किया।
जब भी रामन कोई प्राकृतिक घटना देखते तो वह सदा सवाल करते—ऐसा क्यों है। यही एक सच्चा वैज्ञानिक होने की विशेषता और प्रमाण है। लन्दन में स्थान और चीज़ों को देखते हुए रामन ने विस्परिंग गैलरी में छोटे-छोटे प्रयोग किये।
कलकत्ता लौटने पर उन्होंने समुद्री पानी के अणुओं द्वारा प्रकाश छितराने के कारण का और फिर तरह-तरह के लेंस, द्रव और गैसों का अध्ययन किया। प्रयोगों के दौरान उन्हें पता चला कि समुद्र के नीलेपन का कारण सूर्य की रोशनी पड़ने पर समुद्री पानी के अणुओं द्वारा नीले प्रकाश का छितराना है। सूर्य के प्रकाश के बाकी रंग मिल जाते हैं।
इस खोज के कारण सारे विश्व में उनकी प्रशंसा हुई। उन्होंने वैज्ञानिकों का एक दल तैयार किया, जो ऐसी चीज़ों का अध्ययन करता था। 'ऑप्टिकस' नाम के विज्ञान के क्षेत्र में अपने योगदान के लिये सन् 1924 में रामन को लन्दन की 'रॉयल सोसाइटी' का सदस्य बना लिया गया। यह किसी भी वैज्ञानिक के लिये बहुत सम्मान की बात थी। रामन के सम्मान में दिये गये भोज में आशुतोष मुखर्जी ने उनसे पूछा,-
अब आगे क्या?
तुरन्त उत्तर आया- अब नोबेल पुरस्कार
उस भोज में उपस्थित लोगों को उस समय यह शेखचिल्ली की शेख़ी ही लगी होगी क्योंकि उस समय ब्रिटिश शासित भारत में विज्ञान आरम्भिक अवस्था में ही था। उस समय कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि विज्ञान में एक भारतीय इतनी जल्दी नोबेल पुरस्कार जीतेगा। लेकिन रामन ने यह बात पूरी गम्भीरता से कही थी। महत्त्वाकांक्षा, साहस और परिश्रम उनका आदर्श थे। वह नोबेल पुरस्कार जीतने के महत्त्वाकांक्षी थे और इसलिये अपने शोध में तन-मन-धन लगाने को तैयार थे। दुर्भाग्य से रामन के नोबेल पुरस्कार जीतने से पहले ही मुखर्जी साहब चल बसे थे।
एक बार जब रामन अपने छात्रों के साथ द्रव के अणुओं द्वारा प्रकाश को छितराने का अध्ययन कर रहे थे कि उन्हें 'रामन इफेक्ट' का संकेत मिला। सूर्य के प्रकाश की एक किरण को एक छोटे से छेद से निकाला गया और फिर बेन्जीन जैसे द्रव में से गुज़रने दिया गया। दूसरे छोर से डायरेक्ट विज़न स्पेक्ट्रोस्कोप द्वारा छितरे प्रकाश—स्पेक्ट्रम को देखा गया। सूर्य का प्रकाश एक छोटे से छेद में से आ रहा था जो छितरी हुई किरण रेखा या रेखाओं की तरह दिखाई दे रहा था। इन रेखाओं के अतिरिक्त रामन और उनके छात्रों ने स्पेक्ट्रम में कुछ असाधारण रेखाएँ भी देखीं। उनका विचार था कि ये रेखाएँ द्रव की अशुद्धता के कारण थीं। इसलिए उन्होंने द्रव को शुद्ध किया और फिर से देखा, मगर रेखाएँ फिर भी बनी रहीं। उन्होंने यह प्रयोग अन्य द्रवों के साथ भी किया तो भी रेखाएँ दिखाई देती रहीं।
इन रेखाओं का अन्वेषण कुछ वर्षों तक चलता रहा, इससे कुछ विशेष परिणाम नहीं निकला। रामन सोचते रहे कि ये रेखाएँ क्या हैं। एक बार उन्होंने सोचा कि इन रेखाओं का कारण प्रकाश की कणीय प्रकृति है। ये आधुनिक भौतिकी के आरम्भिक दिन थे। तब यह एक नया सिद्धांत था कि प्रकाश एक लहर की तरह भी और कण की तरह भी व्यवहार करता है।

रिसर्च इंस्टीट्यूट

सन 1948 में रामन का बंगलौर में अपना इंस्टीट्यूट बनाने का सपना साकार हो गया। इसे रामन रिसर्च इंस्टीट्यूट कहते हैं। उन्होंने अपनी बचत का धन इकट्ठा किया, दान माँगा, कुछ उद्योग आरम्भ किए जिससे इंस्टीट्यूट को चलाने के लिए नियमित रूप से धन मिलता रहे।
इंस्टीट्यूट की रचना में रामन की सुरुचि झलकती है। संस्था के चारों ओर बुगनबिला, जाकरन्दाज और गुलाब के फूलों के अतिरिक्त यूक्लिपटस से लेकर महोगनी के पेड़ों की भरमार है। वातावरण एक उद्यान जैसा है।
यहाँ पर रामन अपनी पसन्द के विषयों पर शोध और खोजबीन करते थे। कुछ भी जो चमकता है उनके अनुसंधान का विषय बन जाता था। उन्होंने 300 हीरे ख़रीदे। हीरे को ठोस का राजा कहते हैं। उन्होंने उनकी आंतरिक संरचना और भौतिक गुणों का अध्ययन किया। पक्षी के पंख, तितलियाँ, बीटल और फूलों की पत्तियों तक ने उन्हें आकर्षित किया। उन्होंने यह अन्वेषण किया कि ये सब इतने रंग-बिरंगे क्यों हैं। इस अध्ययन के परिणामों से उन्होंने विज़न और कलर का सिद्धांत प्रतिपादन किया जो उन्होंने अपनी पुस्तक 'द फिज़ियोलॉजी आफ विज़न' में लिखा है। इस विषय ने अभी-अभी वैज्ञानिकों का ध्यान फिर अपनी ओर आकर्षित किया। रामन ये जानते थे कि पश्चिमी देशों में हो रहे अध्ययन से भिन्न विषय, अध्ययन और शोध के लिये कैसे खोजें जायें।
सन 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात रामन को बड़ी निराशा हुई क्योंकि उन्हें लगा कि देश में विज्ञान को विकसित करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया जा रहा, जिसके लिए वे इतना प्रयत्न कर रहे थे। इसके विपरीत वैज्ञानिकों को बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा जाने लगा। यद्यपि वैज्ञानिक अध्ययन के लिए अपने देश में काफ़ी अवसर और बहुत ही विस्तृत क्षेत्र था। यह हमारा कर्तव्य था कि हम विज्ञान का मूल आधार तैयार करें। इसके लिए हमें भीतर देखने की ही ज़रूरत थी।
अपने युवा वैज्ञानिकों के सामने यह आदर्श रखने के लिए कि विदेशी डिग्रियों और सम्मानों के पीछे नहीं भागना चाहिए, रामन ने स्वयं लन्दन की 'रॉयल सोसाइटी' की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। उन्हें इस बात से बहुत घृणा थी कि लोग राजनीति के द्वारा विज्ञान का शोषण करें। उन्होंने महसूस किया कि विज्ञान और राजनीति का कोई मेल नहीं है। विज्ञान सदा राजनीति से मात खा जायेगा। जब उनके सामने 'भारत के उपराष्ट्रपति' के पद का प्रस्ताव रखा गया तो उन्होंने बिना एक क्षण भी गंवाये उसे अस्वीकार कर दिया। सन् 1954 में उन्हें 'भारत रत्न' की उपाधि से सम्मानित किया गया। अब तक वह पहले और आख़िरी वैज्ञानिक हैं जिन्हें यह उपाधि मिली है।

स्वप्नद्रष्टा रामन

रामन ने कई वर्षों तक एकान्तवास किया। लेकिन वह सदा सक्रिय रहे। उन्हें बच्चों का साथ बहुत भाता था। वह अक्सर अपने इंस्टीट्यूट में स्कूल के बच्चों का आमंत्रित करते और घंटों उन्हें इंस्टीट्यूट और वहाँ की चीज़ें दिखाते रहते। वह बड़ी दिलचस्पी से उन्हें अपने प्रयोग और उपकरणों के बारे में समझाते। वह स्वयं स्कूलों में जाकर विज्ञान पर भाषण देते। वह बच्चों को बताते कि विज्ञान हमारे चारों ओर है और हमें उसका पता लगाना है। विज्ञान केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। वह बच्चों को कहते थे कि तारों, फूलों और आसपास घटती घटनाओं को देखों और उनके बारे में सवाल पूछो। अपनी बुद्धि और विज्ञान की सहायता से उत्तरों की खोज करो।
आज के कई ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों ने रामन की बातें और भाषण सुनकर ही विज्ञान को अपना विषय चुना था। वह आनेवाली नई सुबह के अग्रदूत थे। चंद्रशेखर वेंकट रामन ने अपने जीवन काल में ही रामन इफेक्ट के लिए फिर से आधुनिक प्रयोगशालाओं में रुचि उत्पन्न होती देखी। इसका श्रेय सन् 1960 में लेजर की खोज को जाता है—एक संसक्त और शक्तिशाली प्रकाश। पहले रामन इफेक्ट की स्पष्ट तसवीर के लिए कई दिन लग जाते थे। लेजर से वही परिणाम कुछ ही देर में मिल जाता है। अब ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्रों में जैसे रसायन उद्योग,प्रदूषण की समस्या, दवाई उद्योग, प्राणी शास्त्र के अध्ययन में छोटी मात्रा में पाये जाने वाले रसायनों का पता लगाने के लिए रामन इफेक्ट इस्तेमाल हो रहा है। रामन इफेक्ट आज उन चीज़ों के बारे में सूचना दे रहा है जिसके बारे में रामन ने इसकी खोज के समय कभी सोचा भी नहीं था।
Reference :-http://mobi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%B0_%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%9F_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%A8

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